सागर जिले के बंडा में मेरिटधारी डॉक्टर के कारनामे सुनकर दंग रह जाएंगे,
डॉक्टर ने बच्चे को आई ड्रॉप की जगह कफ़ सीरप डाल दिया जिससे उसकी आंखों की रोशनी चली गई,
मीडिया ख़बर नहीं दिखाएगा क्योंकि आरोपी सजातीय और पीड़ित दलित पिछड़ा है।
कथावाचक बनने के लिए ज्यादा ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती, न ही इस बिजनेस को खड़ा करने के लिए ज़्यादा पैसा चाहिए,
इस बिज़नेस में बस आपको बंदर भालू वाली मनोहर कहानियां सुनाना आना चाहिए और लोगों को यह विश्वास दिला दो कि धरती शेषनाग पर टिकी है और मोर के आँसुओं से बच्चे पैदा होते हैं,
कथावाचक बनने की एक मात्र शर्त यह है कि आप ब्राह्मण कुल में जन्मे हो, अगर कोई गैर ब्राह्मण कथावाचक बनता है तो उसे अपमान सहना पड़ेगा जैसे मुकुटमनी यादव के साथ इटावा में हुआ था,
पंडित देवकीनन्दन शर्मा ने भी अपने बेटे को कथावाचक बना दिया है, स्वागत नहीं करोगे 🔥🔥🔥
सभी लोग पुलिस को टैग कीजिए... बाबा साहेब के सम्मान में आईये खुलकर मैदान में!
ये यूपी के गोंडा का रहने वाला "शुभम शुक्ला" है को बाबा साहेब अंबेडकर के ऊपर अभद्र गाली दे रहा है !
@Uppolice@dgpup@gondapolice इस गाली देने वाले शुभम् शुक्ला की गिरफ्तारी कीजिए!
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NCERT बुक में मनुस्मृति श्लोक डाला जा रहा है ऐसे में यह जरूरी है की ब्राह्मणवादी धूर्त मानसिकता को अच्छे से समझा जाय।
आज चैप्टर 1 से शुरुवात करते है।
मनुस्मृति की शुरुआत ही वर्ण-व्यवस्था को “धर्म” बनाकर पेश करती है
श्लोक 1
मनुमेकाग्रमासीनमभिगम्य महर्षयः।
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन्॥ १॥
अर्थ: महर्षि, एकाग्र होकर बैठे मनु के पास गए, उनका पूजन किया और उनसे प्रश्न किया।
आलोचना:
यहां शुरुआत ही “मनु” को सर्वोच्च ज्ञाता बनाकर की गई है। यानी समाज का कानून, नैतिकता और व्यवस्था किसी लोकतांत्रिक विचार-विमर्श से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति/ऋषि-परंपरा की कथित दिव्य सत्ता से तय होनी है। यही मनुस्मृति की सबसे बड़ी समस्या है—यह मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि नहीं, बल्कि अंध-श्रद्धा और अधिकारवादी ज्ञान-व्यवस्था को आधार बनाती है।
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श्लोक 2
भगवन्सर्ववर्णानामन्तरप्रभवाणां च।
धर्मान्नो वक्तुमर्हसि॥ २॥
अर्थ: हे भगवन! सभी वर्णों और संकीर्ण जातियों के धर्म हमें बताइए।
आलोचना:
यहीं से मनुस्मृति का असली एजेंडा सामने आ जाता है। प्रश्न मानवता, समानता या न्याय का नहीं है; प्रश्न है—किस वर्ण और किस जाति का धर्म क्या होगा। यानी जन्म के आधार पर मनुष्य का कर्तव्य पहले से तय कर देना। यही विचार आगे चलकर जाति-व्यवस्था, ऊंच-नीच, अस्पृश्यता और सामाजिक गुलामी का वैचारिक हथियार बनता है।
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श्लोक 3
त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयम्भुवः।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित्प्रभो॥ ३॥
अर्थ: हे प्रभो! इस स्वयं उत्पन्न, अचिन्त्य, अप्रमेय ब्रह्म के विधान का तत्त्वार्थ आप ही जानते हैं।
आलोचना:
यहां मनु को लगभग “अंतिम प्राधिकारी” घोषित किया गया है। जब किसी व्यवस्था को “अचिन्त्य” और “अप्रमेय” बता दिया जाता है, तो उसका मतलब होता है—उस पर सवाल मत करो। यही ब्राह्मणवादी ग्रंथों की चाल है: पहले व्यवस्था को ईश्वरीय बताओ, फिर उसे प्रश्नों से ऊपर रख दो। लेकिन जो व्यवस्था मनुष्य को जन्म से ऊंचा-नीचा बनाती है, वह “धर्म” नहीं, अन्याय का शास्त्रीकरण है।
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श्लोक 4
स तैः पृष्टस्तथा सम्यगमितौजा महात्मभिः।
प्रत्युवाचार्च्य तान्सर्वान्महर्षीञ्छ्रूयतामिति॥ ४॥
अर्थ: महर्षियों द्वारा पूछे जाने पर तेजस्वी मनु ने कहा—सुनो।
आलोचना:
यहां पूरा दृश्य ऐसा रचा गया है कि मनु बोलेंगे और बाकी सब सुनेंगे। कोई बहस नहीं, कोई प्रतिप्रश्न नहीं, कोई सामाजिक अनुभव नहीं। यानी सत्ता एकतरफा है। मनुस्मृति ज्ञान नहीं, तानाशाही थोपती है।
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श्लोक 5
आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥ ५॥
अर्थ: आरंभ में यह जगत अंधकारमय, अज्ञात, लक्षणहीन, तर्क से परे और सोया हुआ था।
आलोचना:
यहां सृष्टि की शुरुआत को तर्क और प्रमाण से नहीं, गपोड़ से समझाया गया है। “अप्रतर्क्यम्” यानी जिसे तर्क से न जाना जा सके। यही समस्या है—जहां तर्क खत्म होता है, वहां अंधविश्वास शुरू होता है। अगर समाज की व्यवस्था भी इसी “अप्रतर्क्य” आधार पर बनाई जाएगी, तो फिर न्याय, समानता और मानवाधिकार की कोई जगह नहीं बचेगी।
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श्लोक 6
ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्।
महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः॥ ६॥
अर्थ: फिर स्वयंभू भगवान प्रकट हुए और अंधकार को दूर किया।
आलोचना:
यहां सत्ता का स्रोत फिर “स्वयंभू भगवान” बना दिया गया। आगे चलकर इसी ईश्वरीय आधार पर वर्ण-व्यवस्था को प्राकृतिक और धार्मिक बताया जाता है। सवाल यह है—अगर सबका निर्माता एक है, तो मनुष्य जन्म से ऊंचा-नीचा कैसे हो गया? अगर ईश्वर सबका है, तो किसी को ब्राह्मण, किसी को शूद्र, किसी को सेवक और किसी को शासक बनाने का अधिकार किसने दिया?
निष्कर्ष
मनुस्मृति की शुरुआत ही साफ कर देती है कि यह ग्रंथ मानव-समानता का ग्रंथ नहीं है, बल्कि वर्ण और जाति आधारित समाज को धार्मिक वैधता देने वाला ग्रंथ है। इसमें मनुष्य को मनुष्य नहीं, बल्कि जन्म-आधारित श्रेणियों में बांटने की भूमिका तैयार की जाती है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि अन्याय को सीधे अन्याय नहीं कहा गया, बल्कि उसे “धर्म” कह दिया गया। यही मनुस्मृति की वैचारिक चाल है—
जन्म से बंटवारा करो, उसे ईश्वर की इच्छा बताओ, फिर सवाल करने वालों को अधर्मी घोषित करो।
एक न्यायपूर्ण समाज में धर्म वह होना चाहिए जो मनुष्य को आज़ाद करे, बराबर बनाए और सम्मान दे। लेकिन मनुस्मृति की शुरुआत ही यह संकेत देती है कि उसका लक्ष्य बराबरी नहीं, बल्कि वर्ण-व्यवस्था को स्थायी बनाना है।
सवाल सीधा है:
जो ग्रंथ मनुष्य के जन्म से उसका धर्म तय करता है, क्या वह मानवता का ग्रंथ हो सकता है?
जो व्यवस्था तर्क से ऊपर बताई जाती है, क्या वह न्यायसंगत हो सकती है?
#Manusmriti
PROPAGANDA 🚨 : Akhilesh Yadav is inactive politician, he is giving free passes to BJP in Uttar Pradesh"
REALITY 🔥 : He is exposing BJP on state level exam paper leak in special press conference held in PGR
@sudhirchaudhary@NetflixIndia@YouTubeIndia This Tihari's show is not news. It is poison. Seems this person will never improve. Very sad to see @DDNational and Modi giving platform to such poor propaganda and hate.
Society and Govt must ACT…NOW before it’s too late.