सुपर आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंडे कह रहे हैं सभी को डॉ बाबा साहेब अंबेडकर की किताब Annihilation of Caste और महात्मा ज्योतिबा फुले की Gulamgiri पढ़नी चाहिए.
1936 में पहली बार Annihilation of Caste की 1500 प्रतियां छपी और एक महीने के भीतर सब बिक गयी.
तब से लेकर आज तक Annihilation of Caste की 10 Million से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. यह आंकड़ा 2 करोड़ से ज्यादा भी हो सकता है.
Annihilation of Caste और Gulamgiri से सामाजिक विशेष अधिकार प्राप्त जातियों को डर लगता है. इन दोनों किताबें से आरएसएस को भी काफी डर लगता है.
इस किताब को हर Gen Z को पढ़ना चाहिए. एक बात ध्यान रखना डॉ बाबा साहेब आंबेडकर ने कभी अपनी आत्मकथा नही लिखी है. उनके नाम पर बिकने वाली उनकी आत्मकथा फर्जी है.
Tukaram Mundhe urged everyone to read Dr. Babasaheb Ambedkar’s Annihilation of Caste and Emphasized the importance of education, just as Mahatma Jyotirao Phule and Savitribai Phule envisioned education as a powerful means of social transformation.
आपको पता है, नीम करौली बाबा भगत सिंह से छह-सात साल बड़े थे और शक्तिशाली भी थे। कहा जाता है कि उनके पास चमत्कारिक शक्तियाँ थीं। लोग उन्हें हनुमान जी का अवतार तक कहते हैं।
वे ट्रेन को चलने से रोक सकते थे, अपनी जीभ में पौधे उगा सकते थे। इतनी शक्तियाँ थीं उनके पास।फिर भी हमारे देश की आज़ादी में उनका क्या योगदान था? शून्य।
अगर उनके पास सच में इतनी शक्तियाँ थीं और वे उसी दौर में थे, जब भगत सिंह जैसे लोग देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, तो हमारे देश को आज़ादी दिलाना उनके लिए कितनी बड़ी बात थी? चुटकी बजाकर वे अंग्रेज़ों को यहाँ से भगा सकते थे।
तो उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? क्यों वे पहाड़ों में जाकर बस गए और आराम से अपनी ज़िंदगी पूरी कर ली।
और आज उन्हीं की पूजा की जा रही है, प्रसाद चढ़ाया जा रहा है, फ़िल्में बनाई जा रही हैं, गाने चलाए जा रहे हैं।
वहीं, जिन इंसानों ने वास्तव में हमारे देश की आज़ादी के लिए संघर्ष किया, अपना जीवन लगाया और हमें उस स्थिति तक पहुँचाया, जहाँ हम आज हैं, उन्हीं को हमारे देश के बहुत से लोग गालियाँ देते हैं।
ये चमत्कार को मानने से देश को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला न बेरोज़गारी मिटेगी न ग़रीबी। ये सब अंधविश्वास है
अंग्रेजों ने मुग़लों ने ग़ुलाम बनाया तब तुम्हारे ये चमत्कार कहा चले गए थे।
किस दिशा में जा रहे हैं हम, क्या ऐसी मानसिकता रखकर हम विश्वगुरु बनेंगे?
आईआईटी मंडी में 4 सितंबर को आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम में प्रदर्शित पोस्टर उस जातिवादी मानसिकता का प्रमाण है, जिसे देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में भी जगह मिल रही है। शूद्रों (SC, ST और OBC) को “उच्च वर्गों की सेवा करने” वाला बताने वाला यह पोस्टर न केवल आपत्तिजनक, बल्कि बेहद गंभीर और चिंताजनक है।
यह भाषा सामाजिक बराबरी और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। किसी भी धर्मग्रंथ की व्याख्या के नाम पर जन्म के आधार पर किसी समुदाय को ऊंचा या नीचा बताना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2014 से 2021 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव के कारण 72 छात्रों की मृत्यु हुई, लेकिन इसी अवधि में जातिगत भेदभाव के कथित “फर्जी आरोप” से किसी छात्र का भविष्य बर्बाद होने का कोई प्रमाणित मामला सामने नहीं आया।
माननीय उच्चतम न्यायालय से हमारा निवेदन है कि UGC (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 पर लगी रोक को शीघ्र हटाया जाए और इसे प्रभावी रूप से लागू करने का मार्ग प्रशस्त किया जाए। साथ ही, @mygovindia इसे कानून का रूप देकर प्रभावी एवं बाध्यकारी बनाए, ताकि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव पर ठोस रोक लग सके और छात्रों को सुरक्षित, सम्मानजनक एवं भेदभाव-मुक्त शैक्षणिक वातावरण सुनिश्चित किया जा सके।
परम पूज्य बाबा साहेब के बराबरी के भारत में जन्म के आधार पर कोई “उच्च” या “सेवा करने वाला” नहीं हो सकता।
शिक्षा के मंदिरों में जाति की दीवारें नहीं, बराबरी के दरवाजे खुलने चाहिए।
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#ASP_K_Support_UGC_Act
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