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रात भर की जंग में, पसीना और र�� मिलकर बहता है,
पतिव्रता की आहें, तेरी हाँक में बदल जाती हैं।
जवान देह काँप उठे, जब तू पीछे से आक्रमण करे,
"हाँ... और तेज़... फाड़ दो मुझे!" — यही अब मेरा मंत्र है।
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गदराए स्तन थपथपाएँ, तेरी छाती से टकराएँ,
कूल्हे उठाकर माँगूँ, और गहराई में ले जा मुझे।
संस्कारी औरत का भेस, तेरी हवस ने नंगा कर दिया,
अब सिर्फ़ तेरी रानी हूँ, तेरी कामुक गुलाम बन गई हूँ।
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माँग सिंदूर की, लेकिन तेरे निशान बन जाएँ बदन पे,
पतिव्रता की मूरत अब, तेरी हवस में घुल जाएँ।
जाँघों के बीच की आग, तेरी जीभ से बुझती नहीं,
हर धक्के पे चिल्लाऊँ — "मेरा ज़ालिम पति बन जा तू!"
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जवानी का ये गदराया बदन, तेरी क्रूरता माँगता है,
पसीने से तर, लिपटकर, तेरे नीचे बिखर जाता है।
पति का नाम लेते-लेते, तेरे होंठों में खो जाती हूँ,
संस्कार की दीवार गिरे, जब तू मुझे चोद के रुलाता है।
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पतिव्रता की कसमें तोड़, तेरी उँगलियाँ जब सरकें,
स्तनों की चोटी फ���ल उठे, चोली की हुकें टूट पड़ें।
हवस की आग में जलकर, परमानंद की भूख मिटाए,
ज़ालिम मर्द की थाप पर, चीखूँ "और ज़ोर से... हाय!"