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कौन है अनिल सिंह जिन्हें लोग भगत सिंह कह रहे थे..! 🌀
जंतर-मंतर पर कई चेहरे दिखे... लेकिन उन्हीं में एक चेहरा ऐसा था, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
इनका पूरा नाम है अनिल सिंह बघेल..!
वही अनिल सिंह... जिनका वीडियो सोशल मीडिया पर लाखों लोगों ने देखा काफी वायरल हुई थी उनकी फोटो जिसमें उनके सिर से लगातार खून बह रहा था... पुलिस का लाठीचार्ज हो चुका था... लेकिन चेहरे पर डर नहीं था।
उसी हालत में उन्होंने कैमरे की ओर देखकर कहा-
"अगर शहीद हुआ... तो दोबारा जन्म लेकर आऊंगा। फिर आऊंगा... और देश के नौजवानों की लड़ाई लड़ूंगा। क्या सोचते हो... हम मर जाएंगे? हम तो शहीद हैं, हर युग में जन्म लेंगे... तुम हमारे नौकर हो।"
बस... यही वो शब्द थे जो अनिल सिंह को पूरे देश में प्रसिद्धि दिलाते है।
आंदोलन की तस्वीरों में अनिल सिंह का चेहरा संघर्ष की पहचान बन गया। सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने उन्हें "आज का भगत सिंह" कहना शुरू कर दिया।
अनिल सिंह मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले के मझिगवां गांव के रहने वाले 38 वर्षीय किसान और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वे किसी बड़े राजनीतिक परिवार से नहीं आते। एक साधारण किसान परिवार में जन्मे अनिल सिंह दसवीं तक पढ़े हैं और आज भी अपने गांव में खेती-किसानी करके परिवार का पालन-पोषण करते हैं।
17 जुलाई 2026 को वे छात्रों के मुद्दों के समर्थन में अपने गांव से दिल्ली पहुंचे थे। जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में वे घायल हो गए।
उनके पिता भोला सिंह, माता शिवेंद्री सिंह और पूरा परिवार खेती पर निर्भर है। न कोई बड़ा कारोबार... न कोई सरकारी नौकरी... सिर्फ मेहनत और खेती।
मीडिया से बातचीत के दौरान उनके पिता ने कहा कि उन्हें अपने बेटे पर गर्व है कि बेटा देश के काम आ रहा है।
ये आंदोलन ऐसे ही लोगों से खड़ा हुआ था ऐसे लोग ही इसकी असली ताकत थे।
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह उनसे मिलने पहुंचे और उन्हें "आज का भगत सिंह" बताया। इसके बाद भी सोशल मीडिया पर यह चर्चा और तेज हो गई।
अनिल सिंह को उस समय देख के लग रहा था,आखिर ये है कौन और सर फटने के बाद भी इतने जोश के साथ डटे थे।
अनिल सिंह आंदोलन के पोस्टर बॉय कहे जाने लगे थे।
क्या अनिल सिंह वास्तव में आज के समय के भगत सिंह है।
अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
जंतर-मंतर पर कई लोग दिखे और कई लोगों की कहानियाँ भी। उन्हीं में से एक कहानी है - इरफ़ान की..! 🌀
क्या आप इरफ़ान को जानते हैं?
वही इरफ़ान, जिनका एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वे कवि नीरज कुमार की एक कविता कह रहे हैं।
उनकी एक-एक लाइन सुनिए... आपको लगेगा कि "यार, क्या लड़का है!"
"जब नौजवानों के सवाल बिन उत्तर रह जाएंगे,
पहाड़ों में दबे लावे जैसे कभी तो उबल जाएंगे।"
क्या प्यारा अंदाज़ है बोलने का! ऐसा लगता है जैसे कोई खूबसूरत मोतियों को उठाकर एक माला में पिरो रहा हो।
एक न्यूज़ रिपोर्ट में जब मैंने इरफ़ान का घर देखा, तो और भी दुख हुआ। घर की हालत बिल्कुल ही खराब है। सिर्फ ईंटों की जुड़ाई है, कुछ भी ठीक से व्यवस्थित नहीं। लेकिन हाँ... लड़का एकदम खरा सोना है।
पेशे से एक मजदूर हैं,सड़क किनारे बर्फ की दुकान पर काम करते हैं।
कसम से... अगर यह लड़का किसी विधायक, सांसद या फिर किसी अमीर परिवार से होता, तो शायद आज खुद विधायक या सांसद होता और अगर इस लड़के को शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला होता, तो शायद यह देश की तकदीर बदलने वालों में होता।
कितना प्रतिभावान लड़का... लेकिन काम कहाँ कर रहा है? एक बर्फ की दुकान पर मजदूरी।
हमारे देश की कितनी प्रतिभाएँ बर्फ की दुकानों और मजदूरी में जाया हो रही हैं।
इसकी जगह कहीं और थी... किस्मत का मारा है ये लड़का।
जंतर-मंतर के आंदोलन ने हमें एक हीरा दिया है- इरफ़ान।
इरफ़ान, यार... तुम खूब आगे बढ़ो।
कितनी अच्छी और कितनी सच्ची बातें करते हो!
इस देश के अनमोल रत्न हो। तुम्हारे जैसे लोग इस देश को चाहिए।
इरफ़ान ने पढ़ाई नहीं की है।
उन्होंने किसी स्कूल या कॉलेज से औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की। बचपन में सिर्फ आंगनवाड़ी में थोड़ी-बहुत बुनियादी शिक्षा मिली।
लेकिन उन्होंने सीखना कभी नहीं छोड़ा।
गूगल, यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ॉर्म और अपने मोबाइल फोन के माध्यम से उन्होंने इतना सब कुछ अर्जित किया है। वे लगातार खबरें पढ़ते हैं, देश-दुनिया को समझते हैं, भगत सिंह के विचारों को जानते हैं और दुष्यंत कुमार व अदम गोंडवी जैसे कवियों को पढ़ते-सुनते हैं।
यही उनका ज्ञान का माध्यम बना।
उनका परिवार बेहद गरीब है। वे दिल्ली की एक तंग झुग्गी बस्ती में रहते हैं।
पूरा परिवार महज़ 12 वर्ग गज के एक छोटे से कमरे में रहता है, जिसकी पक्की छत भी नहीं है। ऊपर सिर्फ तिरपाल डली हुई है।
35 वर्षीय अविवाहित इरफ़ान अपने माता-पिता और दो बहनों के साथ रहते हैं।
परिवार का गुज़ारा चलाने के लिए वे सड़क किनारे बर्फ बेचने और मजदूरी का काम करते हैं, जिससे उन्हें रोज़ाना करीब ₹500 की दिहाड़ी मिलती है।
अगर आपने अभी तक इरफ़ान को नहीं देखा है, तो एक बार ज़रूर देखिए।
इतनी स्पष्टता... इतनी साफ-सुथरी भाषा... कई बार तो कोई पत्रकार भी इतनी सादगी और प्रभाव के साथ नहीं बोल पाता।
इरफ़ान जैसे युवाओं को सलाम।
आपके हिसाब से इरफ़ान जैसे युवाओं के लिए सरकार, समाज या हम सबको क्या करना चाहिए?
रिजर्वेशन हटाओ का मुद्दा इस समय देश में शुरू हो गया है।
किसी का भी पक्ष लेने से पहले आप इस विषय पर पहले से पढ़ लीजिए।
अभिनव सर ने क्या कहा है इस विषय पर क्या आपको पता है अगर नहीं पता है एक इनको जरूर सुनिए।
आप बस एक बार इनको सुन लीजिए..!
ये है Z अल्फा वाली जेनरेशन..! 😃
इसने मोदी जी के इंस्टा पर वाले विडियो को कॉपी करके पोस्ट किया।
आवाज मोदी जी की थी और एक्टिंग इस छोटे Z अल्फा की।
इसके उस वीडियो 1 करोड़ से ज्यादा व्यू आए।
सच में आने वाले जेनरेशन तो बवाल है भाई
इरफान..!
ये नाम याद कर लीजिए, अगर इनको बोलते हुए नहीं सुना तो सुन के आइए!
ये ऐसा बोलते है कि आपको बार बार सुनने का दिल करेगा।
इरफान जैसे लोगों से देश बनाता है।
लो भाई अब इसी की कमी थी..!
काकरोच पार्टी किसी जाति या धर्म विशेष की राजनीति नहीं करती है वो देश के भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाया इसलिए उसे हर किसी का साथ मिला।
आरक्षण हटाओ जैसे पेज बना कर अगर कोई सोच रहा है कि आरक्षण हटा दिया जाएगा तो ये बहुत बड़ी भूल है।।
ये आंदोलन बस पेज तक ही रहने वाला है।
जंतर-मंतर पर जिनके इस्तीफ़े की गूंज उठी... आखिर कौन हैं केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान? 🌀
देशभर में शिक्षा व्यवस्था को लेकर चल रही बहस के बीच एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है-धर्मेंद्र प्रधान।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर धर्मेंद्र प्रधान कौन हैं? उनकी राजनीतिक यात्रा कैसी रही? और क्यों आज उनका इस्तीफा राष्ट्रीय बहस का विषय ?
आइए शुरुआत से समझते हैं...
26 जून 1969 को ओडिशा के तलचर में जन्मे धर्मेंद्र प्रधान एक ऐसे राजनीतिक परिवार से आते हैं, जिसकी पहचान लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी रही है।
उनके पिता डॉ. देवेंद्र प्रधान भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और ओडिशा में पार्टी की मजबूत नींव रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं।
धर्मेंद्र प्रधान ने मानव विज्ञान (Anthropology) में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की और छात्र जीवन में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से राजनीति की शुरुआत की।
1985 में वे तालचेर कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष बने, बाद में ABVP के राष्ट्रीय सचिव और फिर भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।
साल 2004 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने संगठन और सरकार - दोनों स्तरों पर अपनी अलग पहचान बनाई।
मोदी सरकार में उन्हें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, इस्पात, कौशल विकास एवं उद्यमिता और अंततः शिक्षा मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं।
उज्ज्वला योजना के सफल क्रियान्वयन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) को लागू कराने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है।
भाजपा के भीतर धर्मेंद्र प्रधान को केवल मंत्री नहीं, बल्कि एक कुशल चुनाव रणनीतिकार के रूप में भी देखा जाता है।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और कई अन्य राज्यों के चुनावों में संगठनात्मक भूमिका निभाने के कारण उन्हें पार्टी नेतृत्व का भरोसेमंद चेहरा माना गया।
हालांकि, शिक्षा मंत्रालय संभालने के दौरान कई बड़े विवाद भी सामने आए। प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को लेकर विपक्ष तथा छात्र संगठनों ने लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय करने की मांग उठाई।
इसी वजह से आज सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक एक बड़ा वर्ग "धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो" की मांग कर रहा था।
वहीं दूसरी ओर,उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधारों की शुरुआत की, भारतीय इतिहास और संस्कृति को पाठ्यक्रम में अधिक स्थान दिलाने का प्रयास किया तथा नई शिक्षा नीति के माध्यम से दीर्घकालिक बदलाव की दिशा में काम किया।
यही कारण है कि धर्मेंद्र प्रधान आज भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और सबसे अधिक बहस वाले नेताओं में शामिल हैं।
अब फैसला आपका है...
क्या मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी सीधे शिक्षा मंत्री की है?
या फिर यह एक ऐसी व्यवस्था की समस्या है, जिसे वर्षों से सुधारने की जरूरत थी?
अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
इतने दिन कोई अता पता नहीं था..!
कई दिनों से शांत दिख रहे तेजस्वी यादव आज खुलकर सरकार के खिलाफ मैदान में उतर गए है।
कारण है कि उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव समेत कई छात्रों को हिरासत में लिया गया।
तेजस्वी यादव ने सरकार से सवाल किया—
"जब मुकदमा नहीं होना था, तो गिरफ्तारी क्यों हुई?"
और साफ चेतावनी दी—
"अगर कल तक सभी छात्रों को रिहा नहीं किया गया, तो इससे भी बड़ा आंदोलन होगा।"
इस पर आपकी क्या राय है..इतने दिन आंदोलन से दूर रहने का क्या कारण है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने आज लगातार तीसरी Instagram Reel शेयर की।
इसका सबसे बड़ा संदेश क्या है?
Gen Z अब राजनीति और सरकार से संवाद का तरीका बदल चुकी है। 🔥
सरकार को भी एहसास है कि देश का युवा अब टीवी डिबेट से ज़्यादा सोशल मीडिया पर सक्रिय है। इसलिए संवाद का माध्यम भी बदल रहा है।
इसी बीच सरकार ने टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट Nandan Nilekani के नेतृत्व में एक हाई-पावर टास्क फोर्स बनाने का फैसला किया है, ताकि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और भरोसा बढ़ाया जा सके।
अगर युवाओं की आवाज़ नीतियों तक पहुँच रही है, तो यह लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
#GenZ #NarendraModi #Reels #Education #ExamReforms #India
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने आज लगातार तीसरी Instagram Reel शेयर की। 🌀
इसका सबसे बड़ा संदेश क्या है?
Gen Z अब राजनीति और सरकार से संवाद का तरीका बदल चुकी है। 🔥
सरकार को भी एहसास है कि देश का युवा अब टीवी डिबेट से ज़्यादा सोशल मीडिया पर सक्रिय है। इसलिए संवाद का माध्यम भी बदल रहा है।
इसी बीच सरकार ने टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट Nandan Nilekani के नेतृत्व में एक हाई-पावर टास्क फोर्स बनाने का फैसला किया है, ताकि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और भरोसा बढ़ाया जा सके।
अगर युवाओं की आवाज़ नीतियों तक पहुँच रही है, तो यह लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है।
#GenZ #NarendraModi #Reels #Education #ExamReforms #India
प्रोटेस्ट के दौरान कई मैच बीत गए पता ही नहीं चला..!
इस बीच वैभव सूर्यवंशी ने
शानदार, जानदार, धमाकेदार, पारी खेली है
Vaibhav Sooryavanshi ने आज 49 बाल 81 रन की शानदार पारी खेली है।
खिलाड़ी अच्छा है मौके मिलेंगे तो जरूर अच्छा करेगा।
#VaibhavSuryvanshi
न्यूज पिंच के अभिनव इंटरव्यू कर रहे थे धरना स्थल पर
मैने एक व्यक्ति देखा जिसका एक पैर टूटा हुआ था ,इसी प्रोटेस्ट में पुलिस की लाठीचार्ज में फिर भी वो अपने एक साथी के सहारे जंतर मंतर पर पहुंचा था..!
न्यूज पिंच के पत्रकार ने जब उनसे कुछ सवाल पूछा..
उन्होंने अपना नाम अभिषेक सिंह बताया ,उन्होंने बताया कि वो यूपीएससी की तैयारी करते है।
जब उससे न्यूज वाले ने पूछा कि आपको इतना चोट लगी है फिर आप यहां क्यों आ गए तो उनका जवाब था कि नीट की तैयारी करने वाले 21 छात्रों ने आत्महत्या कर लिया उसके आगे मेरी चोट चोट कुछ भी नहीं है।
बताते है कि मंच से उठा उठा के फेंका गया फुटबॉल की तरह..
एक पैर तोड़ देंगे तो हजारों पैर सहारे के लिए खड़े हो जाएंगे।
मेरा बस इतना ही कहना है..सरकार किसी की भी हो।
गलत गलत कहने का साहस होना चाहिए,किसी को भगवान मत बनाइए।।
सत्ता आती जाती रहेगी..।
अगर आज आपने सवाल किया तो कल आने वाली सरकार को लगेगा कि लोग सवाल पूछेंगे, एक डर होगा।
कभी माता पिता करते थे मजदूरी आज बेटा है पूरी दुनिया में फेमस..!🌀
यहां बात हो रही है अंकित प्रजापति (बैयानपुरिया) की..
कुछ समय पहले इंस्टाग्राम पर एक वीडियो वायरल हुई थी।
राम राम भाई सारयां नै..
ये बोलने वाले कोई और नहीं बल्कि यही अंकित थे।
अंकित जब एक आम इंसान थे इन्हें अपने जीवन में कई परेशानियों का समाना करना पड़ा माता पिता बेहद गरीब थे।
अंकित का मुख्य सपना एक पेशेवर पहलवान बनने का था। वह हरियाणा के स्थानीय मिट्टी के दंगलों में पारंपरिक कुश्ती लड़ा करते थे।
अपनी डाइट और कुश्ती की ट्रेनिंग का खर्च उठाने के लिए उन्होंने शुरुआत में फैक्ट्रियों और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर मजदूरी का काम भी किया।
आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने कुछ समय तक Zomato में डिलीवरी बॉय की नौकरी की, ताकि वह अपने परिवार की मदद कर सकें।
साल 2023 में अंकित ने इंटरनेट पर अमेरिकी उद्यमी एंडी फ्रिसेला के '75 Hard Challenge' के बारे में जाना।
उन्होंने इसे पूरी तरह से देसी और सनातनी अंदाज में ढालकर शुरू किया।
रोज दो बार 45 मिनट वर्कआउट करना।
रोजाना श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ना।पूरी तरह से साफ,शाकाहारी और बिना चीट मील वाली डाइट लेना।
रोज 4 लीटर पानी पीना।
अपनी प्रगति देखने के लिए रोज एक सेल्फी लेना।
उनके वीडियो की शुरुआत में बोले जाने वाले इस ठेठ हरियाणवी लोगो को पसंद आने लगी।
उनके कड़े अनुशासन को देखकर पूरा देश उनका फैन हो गया।
उनकी इसी सादगी और मेहनत को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उनके साथ स्वच्छता अभियान के तहत श्रमदान किया, जिसने अंकित को देश के कोने-कोने से लोग पहचानने लगे।
मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया अर्निंग्स के अनुसार, अंकित बैयानपुरिया की कुल संपत्ति लगभग ₹4 से ₹5 करोड़ है।
उनकी मुख्य कमाई यूट्यूब मॉनेटाइजेशन, इंस्टाग्राम पर 7.9 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स के साथ ब्रांड एंडोर्समेंट और पेड कोलैबोरेशन से होती है।
यह उनके कलेक्शन की सबसे महंगी गाड़ी है। उन्होंने हाल ही में एक शानदार डिफेंडर खरीदी है।
अभी हो प्रोटेस्ट में इन्होंने स्टूडेंट के समर्थन में एक पोस्ट किया तो ये फिर से चर्चा में आ गए।
वैसे आज समय में सरकार के विरोध में खड़े सबके बस की बात नहीं..!
आपको क्या कहना है इनकी जर्नी और इनके द्वारा स्टूडेंट्स के लिए किए गए समर्थन पर।
जंतर-मंतर पर लाखों युवाओं को एकजुट करने वाला अभिजीत दिपके आखिर है कौन? 🌀
आप अभिजीत दीपके का समर्थन करे या फिर विरोध पर आपको इनके बारे में जरूर जानना चाहिए।
आज पूरा देश जिस युवा चेहरे की चर्चा कर रहा है, वह कोई बड़े राजनीतिक परिवार से नहीं आता। न उसके पास विरासत में सत्ता थी, न करोड़ों की संपत्ति। वह महाराष्ट्र के एक साधारण मध्यमवर्गीय दलित परिवार का बेटा है - अभिजीत दिपके।
29 सितंबर 1995 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में जन्मे अभिजीत का बचपन बिल्कुल आम भारतीय परिवारों की तरह बीता।
उनके पिता भगवानराव दिपके महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम में इंजीनियर थे और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनकी माता अनीता दिपके एक गृहिणी हैं। परिवार आज भी छत्रपति संभाजीनगर के वालुज इलाके में सादगी से जीवन बिताता है।
उनके आसपास का माहौल ऐसा नहीं था। उनका सपना भी लाखों भारतीय युवाओं जैसा था-किसी तरह पढ़-लिखकर एक अच्छी नौकरी मिल जाए और परिवार का सहारा बन सकें।
पिता ने भविष्य बेहतर बनाने की उम्मीद में मैनेजमेंट कोटे से उनका इंजीनियरिंग में दाखिला कराया लेकिन अभिजीत का मन वहां नहीं लगा। उन्होंने पहले साल की परीक्षा तक नहीं दी। यह उनके जीवन का सबसे कठिन मोड़ था। इसके बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी, बल्कि अपनी रुचि को पहचाना और पुणे जाकर पत्रकारिता और मास मीडिया की पढ़ाई शुरू की। यहीं से उनकी सोच, संघर्ष और राजनीतिक संचार की यात्रा शुरू हुई।
स्नातक के बाद उन्होंने अमेरिका की प्रतिष्ठित Boston University से Public Relations में मास्टर ऑफ साइंस (https://t.co/ndcFMbuvAg.) की डिग्री प्राप्त की।
अभिजीत ने खुद एक इंटरव्यू में बताया कि बचपन में उन्होंने कभी अमेरिका जाने का सपना भी नहीं देखा था।
एक साधारण परिवार के बेटे का यह सफर उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।
साल 2020 से 2023 के बीच अभिजीत आम आदमी पार्टी की केंद्रीय सोशल मीडिया टीम में राजनीतिक संचार रणनीतिकार के रूप में जुड़े रहे।
इसी दौरान उन्होंने दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग में Communication Consultant के रूप में भी काम किया और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया तथा आतिशी के साथ काम करने का अवसर मिला।
लेकिन उनकी असली पहचान तब बनी, जब मई 2026 में उन्होंने युवाओं के मुद्दों-विशेषकर NEET पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में सुधार और बेरोजगारी-को लेकर 'कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)' नाम से एक डिजिटल और जन आंदोलन की शुरुआत की।
देखते ही देखते यह अभियान सोशल मीडिया से निकलकर जंतर-मंतर तक पहुंच गया और हजारों युवाओं की आवाज बन गया।
अभिजीत दिपके की कहानी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है।
यह उस भारत की कहानी है, जहां एक साधारण मध्यमवर्गीय दलित परिवार का बेटा अपनी मेहनत, शिक्षा और विचारों के दम पर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है।
यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।
आप दीपके द्वारा चलाए जा रहे रहे आंदोलन को सपोर्ट करते है या नहीं..नहीं करते तो क्यों और करते है तो क्यों।
अपनी राय जरूर दे।
@SanjayAzadSln@RahulGandhi ये साले एक नंबर के मतलबी लोग है.. हमारे मन में तुम्हारे लिए जो सम्मान था वो खत्म हो गया।
जब पूरा देश एकजुट है तब इसको अपनी और अपनी पार्टी की पड़ी है।
5. उन्हें दुनिया का पहला 'बोंगो गिटार' और 54 तारों वाला गिटार 'बेंटार' डिज़ाइन करने के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने 2004 के ओलंपिक और 2006 के फीफा विश्व कप में उत्तर कोरिया जैसे देशों में भी अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं।
आपने इनका नाम पहले सुना था या नहीं..!
जिसे डॉक्टर ने कहा 6 माह से ज्यादा जीवित नहीं रहेंगे, उसने सबसे तेज गति से 245 देशों की यात्रा करके रिकॉर्ड बना दिया..! 🌀
मै यहां बात का रहा हूँ एक ऐसे शख्स का जिसकी कहानी बड़ी निराली है।
जिसका बचपन कई बीमारियों से घिरा रहा हो और उस स्थिति से निकल कर देश विदेश की यात्रा करना.
4 . किशोरावस्था में गंभीर रूप से बीमार रहने और अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने संगीत की दुनिया में कदम रखा और बाद में यात्रा को ही अपने जीवन का मिशन बना लिया।
3 दिखाते हुए उनका एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है।
उन्होंने 245 देशों का दौरा महज 6 साल, 6 महीने और 22 दिनों में पूरा किया है।
उन्हें हर देश की यात्रा के लिए अलग-अलग वीज़ा लेने की आवश्यकता होती थी, इसलिए उनके पास मोहरों (स्टाम्प) और वीज़ा से भरे हुए 16 भारतीय पासपोर्ट हैं।