राहुल गांधी को संसद में मोदी सरकार ने बोलने नहीं दिया, क्योंकि वो जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित किताब - Four Stars of Destiny का एक हिस्सा पढ़ना चाहते थे.
अब आप खुद वो हिस्सा पढ़ लिजिए- फिर जो उचित लगे, वो कीजिए. मैं चला झोला उठाकर😉
31 अगस्त 2020 को शाम 8:15 बजे, भारतीय सेना के उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को एक फोन कॉल आया.
सामने से जो जानकरी मिली वो बेहद चिंतित करने वाली थी. चार चीनी टैंक, पैदल सैनिकों के साथ, पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर चढ़ना शुरू कर चुके थे.
जोशी ने इस गतिविधि की सूचना सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी, जिन्होंने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझ लिया।
ये टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय मोर्चों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे.भारतीय सैनिकों ने एक चेतावनी के तौर पर आसमान में ऐसे गोले दागे जो सिर्फ लाइट करते हैं. इसका कोई असर नहीं हुआ. चीनी आगे बढ़ते रहे.
इसके बाद नरवणे ने भारत के राजनीतिक और सैन्य लीडरशिप के प्रमुख लोगों को लगातार फोन करना शुरू कर दिया - रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, रक्षा प्रमुख जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस जयशंकर.
नरवणे लिखते हैं: “मैंने हर एक से यही सवाल पूछा - मेरे लिए क्या आदेश हैं? स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और स्पष्टता की जरूरत थी. एक मौजूदा प्रोटोकॉल था. नरवणे को स्पष्ट आदेश थे कि “शीर्ष स्तर से अनुमति मिलने तक” गोली नहीं चलाई जाएगी. ऊपर से कोई साफ आदेश नहीं दिया गया. समय बीतता गया...
रात 9:10 बजे जोशी ने नरवणे को फिर फोन किया. चीनी टैंक अब एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे.
9:25 बजे नरवणे ने राजनाथ को फिर फोन किया और “स्पष्ट दिशा-निर्देश” मांगे, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। इसी बीच, चीनी सेना के कमांडर मेजर जनरल लियू लिन का एक संदेश आया, कहा गया कि - सुबह मीटिंग करेंगे.
लेकिन चीन की सेना रुक नहीं रही थी, वो आगे बढ़ रही थी.
नरवणे याद करते हैं कि जोशी ने कहा था - इन्हें रोकने का एकमात्र तरीका हमारी मीडियम आर्टिलरी से फायर करना है, जो तैयार खड़ी है।
पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा पर आर्टिलरी द्वंद्व आम बात थी, जहाँ डिवीजनल और कोर कमांडरों को सैकड़ों राउंड रोजाना बिना ऊपरी स्तर से पूछे चलाने का अधिकार होता था... लेकिन यह चीन था. यह अलग था.
चीन के साथ आर्टिलरी द्वंद्व बहुत बड़ी चीज में बदल सकता था.
नरवन लिखते हैं: “मेरी स्थिति बेहद नाजुक थी.” वे एक तरफ कमान के बीच फंसे थे जो “सभी संभव साधनों से गोली चलाना चाहती थी”, और दूसरी तरफ मोदी सरकार के लोग जो “अभी तक मुझे स्पष्ट कार्यकारी आदेश नहीं दे पा रहे थे”.
आर्मी मुख्यालय के ऑपरेशंस रूम में विकल्पों पर विचार हो रहे थे और खारिज किए जा रहे थे. पूरा उत्तरी मोर्चा हाई अलर्ट पर था. संभावित टकराव वाले इलाकों पर नजर रखी जा रही थी.
नरवणे ने रक्षा मंत्री को फिर फोन किया, जिन्होंने वापस कॉल करने का वादा किया. समय खिंचता गया. हर मिनट चीनी टैंक और करीब आ रहे थे. राजनाथ ने 10:30 बजे वापस फोन किया. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी. मोदी के निर्देश सिर्फ एक वाक्य में थे: “जो उचित समझो, वो करो”.
मतलब यह “पूरी तरह सैन्य फैसला” होना था. मोदी से सलाह ली गई थी. उन्हें पूरी जानकारी दी गई थी. लेकिन उन्होंने खुद फैसला लेने से इनकार कर दिया. नरवणे याद करते हैं: “मुझे एक गरम आलू थमा दिया गया था. इस पूर्ण छूट के साथ अब सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई थी.”
𝗦𝗶𝗹𝗲𝗻𝗰𝗲 𝗴𝗶𝘃𝗲𝘀 𝘁𝗵𝗲 𝗺𝗶𝗻𝗱 𝘀𝗽𝗮𝗰𝗲 𝘁𝗼 𝗯𝗿𝗲𝗮𝘁𝗵𝗲, 𝗿𝗲𝘀𝗲𝘁, 𝗮𝗻𝗱 𝗿𝗲𝘀𝗽𝗼𝗻𝗱 𝘄𝗶𝘁𝗵 𝗮𝘄𝗮𝗿𝗲𝗻𝗲𝘀𝘀.
But with packed routines and endless distractions, finding silence can be a challenge.
How do you make room for it in your daily life?
ये कविता किसी हद तक मेरा जीवन दर्शन परिभाषित करती है। मेरी सौरभ द्विवेदी को लेकर पहली स्मृतियों में से ये पहली वीडियो है। ठेठ गांव में रहने वाले लड़के के लिए ये एक नया अनुभव था। यहां से चस्का लगा कि ऐसे भी बोला जा सकता है।
एक और वीडियो थी जिसमें ऑनर किलिंग का एक मसला था। उसपर सौरभ द्विवेदी ने एकदम चढ़कर वीडियो बनाया था। वो वीडियो नहीं मिल रहा अब। लेकिन उसने सौरभ की आंख और आवाज को जहन में हमेशा के लिए कैद कर दिया था।
आज वो लल्लनटॉप छोड़ रहे हैं। अब कुछ नया करेंगे, शायद फिल्में बनाएंगे। मां सरस्वती उन्हें आशीर्वाद दें।
वैसे कई बार सामने से देखा, पास से गुजरा, बगल की टेबल पर बैठा लेकिन किसी अनकही झिझक ने मिलने नहीं दिया। मुझे लगता है कुछ चीजें जहां से जैसी अच्छी लगती हैं उन्हें वहीं तक सीमित रखना चाहिए।
इस वक्त के सबसे अच्छे वक्ता की इस पारी को सलाम।
मोदी जी शिवलिंग पर बैठे बिच्छू की तरह हैं..!!
आप उन्हें अपने हाथ से हटा नहीं सकते हैं और चप्पल से मार नहीं सकते हैं।
~ शशि थरूर (लोकसभा सदस्य)
आप थरूर जी की इन बातों से कितनी सहमति रखते हैं??
वे द्विज थे
कहते हैं वे विराट पुरुष के मुख से निस्सृत हुए
देवता उन्हें भूदेव कहते थे
प्रियदर्शी अशोक ने कहा
वे ब्राह्मण थे
वे हर पवित्र और अपवित्र के बीच
लकीर खींचना चाहते थे
उन्होंने अराजकता को वर्ण के अनुशासन में कसा
अग्नि में अपनी समिधाएं सौंपी
और नाद किया अहम् ब्रह्मास्मि! अहम् ब्रह्मास्मि!!
वे ब्राह्मण थे
यदि तर्क का सहारा लिया जाए तो
वह भी इंसानों की तरह पैदा होते थे
उनके पास बड़ी-बड़ी गाथाएँ थीं
शाप देने की
संतान देने की
वरदान देने की
भिक्षा माँगने की
और मोक्ष की
वे व्यवस्था के शीर्ष पर घुटनों तक
और अपने दंभ में कंधों तक
वे डूबे होते थे
हाथ संकल्प का जल
और मुट्ठियों में कुश लिए
वे सम्राटों का भाग्य निर्धारण करते रहे
न! युद्ध के लिए नहीं
वे राज्य करने के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे
वे सम्राटों को बनाते और मिटाते थे
वे चाणक्य और विद्यारण्य थे
वे ब्राह्मण थे
वे मध्य-एशिया के पठारों से आए
या यहीं की माटी से उपजे
यह बहस का विषय था, उनके अस्तित्व का नहीं
वे विलुप्त सरस्वती के किनारों पे उगे
वे हिमालय की धवल गुफाओं से उतरे
वे हिमयुग की परतों को चीरकर आए
या फिर भी वे इसी समाज के हिस्सों से आए
वे आए
क्योंकि वे आ सकते थे
वे ब्राह्मण थे
वे महत्त्वपूर्ण तो थे
लेकिन उनके पास दरिद्रता की स्मृतियाँ थीं
वे सुदामा की तरह जीते थे
और तंदुल चबाकर संतोष कर लेते थे
ज्ञान के लिए वे बेचैन थे
वे ब्राह्मण थे
यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए
कि वे शास्त्र और शस्त्र के बीच ऐसे आवाजाही करते थे
कि भेद मिट जाता था
कि वे अग्नि को समिधा सौंपते पुरोहित थे
या फरसा लिए योद्धा
वे ब्राह्मण थे
वे न होते तो चाणक्य का अर्थशास्त्र न होता
शुंग न होते , गुप्त न होते , पेशवे ना होते
शून्य न होता, आर्यभट्ट न होता
त्रिपिटक न होते, उपनिषद न होते
संस्कृत का व्याकरण न होता
निराला की वह तोड़ती पत्थर न होती
मुक्तिबोध का ब्रह्मराक्षस ना होता
वे न होते तो तुलसी की चौपाई को गाने वाला कंठ न होता
वे न होते तो शंकर का अद्वैत न होता ,नागार्जुन का शून्यवाद ना होता
ब्राह्मण न होते तो 1857 का विद्रोह न होता
आजादी का संग्राम न होता
वे थे तो आज़ाद थे, वे थे तो तिलक थे
वे थे तो नेहरू थे , वे थे तो सावरकर थे
वे थे तो MN रॉय थे , वे थे तो बाजपेयी थे
वे ब्राह्मण थे
वे घाटों में थे , मंदिरों में थे , गुरुकुलों में थे
वे शालाओं में थे, वे नगरों में थे
वे गाँवों में थे
वे ब्राह्मण थे।
मगर उनके बच्चे अब शहर के फ्लैटो में हैं
वे सोचते हैं कि काश वे सरहद पार कर जाए
पश्चिम की किसी अनाम गली में
सुकून से बस जाएँ
वे सोचते हैं और सोचकर डरते हैं
आरक्षण की सूचियों को देखकर वे चुप होते है
वे चुप होते हैं और चुप होकर डरते हैं
वे जितना कलयुग के आने से डरते है
उतना ही समाज उच्छृखंल हो जाने से डरते हैं
अपने प्रभुसत्ता के जाने से डरते हैं
वे दलितों के उत्थान से नहीं डरते हैं
वे अपनी संतानों के पिछड़ने से डरते हैं
वे मंडल से डरते हैं , वे अपने ही थामे कमंडल से भी डरते हैं
वे अकड़ते हैं, लेकिन अंदर से डरते है,
कोट के अंदर दबा जनेऊ बाहर ना दिख जाए
वे अपने ब्राह्मण पहचान से डरते हैं
वे शोषक नहीं थे,
लेकिन इतिहास की अदालतों में
व्यवस्था की बहसों में
वे बलि का बकरा बनाए जाने से डरते हैं
सबके पापों का बोझ
अपने बच्चों के माथे पर मढ़े जाने से डरते हैं।
वे ब्राह्मण हैं।
वे ब्राह्मण थे
वे कथा कहते थे , वे कुंडली मिलाते थे
मगर
उनके मंत्रोच्चार की आवाज़ें
अब कम गूँजती हैं,
अब काशी उनका घर नहीं है
दान-पुण्य पर उनका हक़ नहीं है
गंगा का आचमन छूट गया है
वे इस महा परिवर्तन को महसूस करते हैं
और महसूस करने के बाद कहते हैं ….घोर कलियुग आ गया है
वे ब्राह्मण हैं
हर चुनाव से पहले देश की ज़्यादातर राजनीति यह कहती है
कि ब्राह्मणों के कारण ही ऊँच-नीच है, भेदभाव है
वह निरन्तर ऐसी चर्चाओं को सुनते हैं ,
मगर इनमें फँसने के बजाए
वे आगे बढ़ना चाहते हैं
इन सब के चक्कर में
वे पीछे ना छूट जाए इस बात से डरते हैं
उनके बच्चे
कोचिंग की कतारों में लगे रहते हैं ,
उनकी स्त्रियाँ
उनके कंधों के बरक्स चला करती है।
वे ब्राह्मण हैं
वे ब्राह्मण हैं इसलिए
डूबते हुए जहाज़ के नाविकों की तरह
परंपराओं को भींचे रहते हैं ,
कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें कोसा जाए तो
किस सदी के लिए कोसा जाए
बहस यह थी
कि उन्हें नकारा जाए
तो किस आधार पर नकारा जाए
यह बहस अनवरत चलेगी
यह देवताओं को नकारने का विषय है
मगर जब यहाँ कुछ नहीं था
तब वे थे
जब तलक यहाँ सबकुछ है
तबतक वह रहेंगे
जब सबकुछ मिट जाएगा फिर भी वह रहेंगे
क्योंकि
वे ब्राह्मण हैं
वे ब्राह्मण हैं
वे ब्राह्मण हैं
@AnupamHB असली चुनौती यह है कि जब तक सरकार सीधे वोटरों के खातों में धनराशि ट्रांसफर करती रहेगी, तब तक राजनीति नीतियों या विकास के आधार पर नहीं चलेगी। समस्या यही है वोटरों को प्रत्यक्ष धन-वितरण के माध्यम से प्रभावित करने की यह प्रवृत्ति सत्ता को जनकल्याण नहीं वोट ख़रीद की ओर अधिक झुकाती है।