हा मददगार की जरूरत है
छत हुं दीवार की जरूरत है
आपकी नफरतें बताती है
आपको प्यार की जरूरत है
तुम तो लफ्जों से मार देते हो
क्या तुम्हे हथियार की जरूरत है
जीत में अंधा कर दिया है
तुझको एक हार की जरूरत है
यादों में उनकी जाग के, रातें गुज़ार दीं,
सूरज तो उग गया मगर, दिन सा नहीं लगा।
इक तेरे ना होने से, डूबा हुआ है दिल,
कश्ती तो मिल गई मगर, किनारा नहीं लगा।
आँखो को मेरी आज भी उनकी तलाश है,
चेहरे मिले लाखों, कोई उनसा नहीं लगा।
ना मिल किसी अपने से परेशान बनकर
समझेंगे तुझे तेरे तुझको आसान बनकर
बनेगा तू एक मसीहा अपने और गैरों का
देख तो जरा वक्त वक्त पर सामान बनकर
ना कर बसेरा कहीं भी एक दिन से ज्यादा
बोझ हो जाएगा जो रुका मेहमान बनकर
ठोकर,कांटे,पत्थर, कबूल कर खुशी खुशी
इंसानियत जिंदा रखना नेक इंसान बनकर
खून के रिस्तों को दामन से छूड़ाने
निकले !
अपनी तहज़ीब को हम ख़ुद मिटाने निकले !
आश्रम में किया माँ बाप को दाख़िल हमने !
और न्यू कार में कुत्तो को घुमाने निकले !