परदे हटाकर करीने से
रोशनदान खोलकर
कमरे का फर्नीचर सजाकर
और स्वागत के शब्दों को तोलकर
टक टकी बाँधकर बाहर देखता हूँ
और देखता रहता हूँ मैं।
#DushyantKumar
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।
#DushyantKumar
@Hindiganj हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
#DushyantKumar@Atifkhan_AF@Saumyakul@manabi5 @Manavkaul19
अगला अक्षर ए-य
हम कौन हैं ये बहुत हद तक इस पर निर्भर करता है की हम ने किसे पढ़ा है, वो कौन सी किताबें थी जो हम ने सब से पहले पढ़ीं....
मैं हमेशा इस पर गर्व करता हूँ की मैंने सब से पहले प्रेमचंद को पढ़ा।
पहली किताब गोदान।
कलम के जादूगर को शत्-शत् नमन ।
#प्रेमचंद#Premchand#जन्मदिवस
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं
वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको
क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं
अब नयी तहज़ीब के पेशे-नज़र हम
आदमी को भूनकर खाने लगे हैं
- दुष्यंत कुमार
ग़रीबी
एक ख़ुली हुई क़िताब
जो हर समझदार
और मूर्ख के हाथ में दे दी गई है।
कुछ उसे पढ़ते हैं
कुछ उसके चित्र देख
उलट-पुलट रख देते
नीचे ’शो-केस’ के।
#Dhumil