जो लोग ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत में आस्था रखते हुए जीवन जीते हैं, उन्हें कभी भी जाति, धर्म, नस्ल, रंग, लिंग, वर्ण, भाषा और स्थान के आधार पर किसी से भी कोई समस्या नहीं होती है।
यही सनातन धर्म है।
जय हिन्द 🙏🙏🇮🇳🇮🇳
❗सुप्रीम कोर्ट में सुप्रीम ड्रामा
😳
“न्यायिक सेवक महोदय,
मैं आपको ऑर्डर देता हूं कि लखनऊ के ACP विकास नगर के खिलाफ FIR दर्ज करें”
जज ने पूछा आप ऑर्डर देंगे तो काले कोट वाले ने कहा -जी हां ऑर्डर...
और फिर हाथ में रखे सारे दस्तावेज़ उड़ाकर कोर्ट रूम में फेंक दिए और कहा। आख़िर में कहा -
“ये दे देना 'मा ...' CJI को…।”
आरोपी का नाम प्रबल प्रताप, निवासी लखनऊ है।
ऑस्ट्रेलिया में पूछा गया कि मोदी जी प्रेस कांफ्रेंस क्यों नहीं करते?
जवाब आया कि भारत में ज़्यादातर लोग ग्रामीण हैं इसलिए सीधे भाषण करते हैं।
तो भइये, प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार कौन सा न्यूटन का सिद्धांत पूछेंगे जिसका जवाब ग्रामीणों को नहीं समझ आयेगा और मोदी जी कौन सा फ्रेंच में जवाब देंगे जो ग्रामीण नहीं समझ पायेंगे?
नरेंद्र मोदी ने बताया कि वो 30 साल पहले न्यूजीलैंड गए थे, तब उनको गिफ्ट में मफलर, एक कैप और एक दस्ताना मिला था. उस वक्त उन्हें कोई जानता नहीं था.
मोदी ने इससे पहले ये भी बताया है कि वो 35 साल तक भीख मांगकर खाए हैं. उससे पहले 17 साल की उम्र तक चाय बेची है.
सोचिए... कांग्रेस की सरकार में भीख मांगकर खाने वाले भी इतने अमीर थे कि न्यूजीलैंड घूम रहे थे.
है ना कमाल की बात
सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ वह दुखद है। माननीय जस्टिस ने संयम और उदारता का परिचय देते हुए उचित ही कोई एक्शन नहीं लिया। यह बात तारीफ़ के क़ाबिल है। सुप्रीम कोर्ट का कंधा चौड़ा होना चाहिए और दिल बड़ा। इस बात को भी संज्ञान में लेना चाहिए कि समाज में न्याय को लेकर हताशा फैलती जा रही है। उसकी निष्पक्षता पर संदेह बढ़ता जा रहा है। अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होती। कोई किसी का एनकाउंटर कर दे रहा है, किसी का घर गिरा दे रहा है। नागरिक अपने सवालों को लेकर कोर्ट की सीढ़ियाँ चढ़ता है लेकिन दीवारों से टकरा जा रहा है। इन्हीं कारणों से हताशा बढ़ती जा रही है। उम्मीद है, ऐसी घटना दोहराई नहीं जाएगी। यह भी कि न्याय व्यवस्था अपनी उदारता के साथ साथ विश्वसनीयता को बेहतर करेगी। उम्मीद की आख़िरी मंज़िल कोर्ट है और उस मंज़िल का बने रहना ही हताशा का इलाज है।
महाराष्ट्र में नेशनल हाईवे पर फ्रांस की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की गई है.
इस टेक्नोलॉजी में रास्ते के बीच में अचानक सुरंग बन जाती है, ताकि लोग आसानी से नेशनल हाईवे पार कर सकें.
इस टेक्नोलॉजी पर मोदी सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च किए हैं, पूरी ईमानदारी से काम किया है.
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RSS वाले पिछले 50 साल से यह झूठ फैला रहे हैं कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल इसलिए लगा दिया था क्योंकि उनकी संसद सदस्यता रद्द कर दी गई थी।
यह देखिए तब के RSS प्रमुख बालासाहब देवरस का इंदिरा गाँधी को लिखा पत्र जिसमें वह ख़ुद इंदिरा गाँधी को बधाई दे रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की पीठ ने श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्वाचन को वैध ठहराया है।
अब समय आ गया है कि 50 साल के झूठ से पर्दा हटाया जाय।
आपातकाल का सच
इंदिरा गांधी 1971 का लोकसभा चुनाव जीत चुकी थी और उसके बाद बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर चूकी थीं। उनके पास 352 सीट का बहुमत था और देश की जनता के मन में उनके प्रति अपार स्नेह।
विपक्ष के पास कुछ था नहीं।
1967 के आसपास कांग्रेस के विधायक तोड़कर बनाई गई संयुक्त विधायक दल की राज्य सरकारों को जनता नकार चुकी थी। विपक्ष के पास ऐसे नेता थे जिनके पास नाम तो था लेकिन वोट नहीं था। जनसंघ के पास सिर्फ़ 22 सीट थीं।
सरकार को कमजोर करने के लिए गोरक्षा के नाम पर संसद के ऊपर साधु वेशधारियों से हमला करवाकर कथित विपक्ष देख चुका था। कागजी समाजवाद और सांप्रदायिक जनसंघ की बातें जनता के गले नहीं उतर रही थी।
तब गुपचुप ढंग से तय किया गया कि देश में छिटपुट नहीं बल्कि संगठित और हिंसक बगावत फैलाई जाए। कॉलेज और यूनिवर्सिटी में दंगे फसाद होने लगे। बसें जलाई जाने लगीं। नौजवानों को निर्वाचित सरकार के खिलाफ उकसा दिया गया। मुख्यमंत्री और मंत्रियों के घरों को भीड़ से घिरवा दिया गया। नेताओं की हत्या तक की जाने लगी।
यहीं तक कसर नहीं थी। उसके बाद रामलीला मैदान से सेना और पुलिस से आवाहन किया गया कि वह चुनी हुई सरकार की बात ना माने और बगावत कर दें।
देश में संविधान और संविधान द्वारा चुनी गई सरकार के लिए तख्तापलट का संकट, वह भी पूरी तरह गुंडागर्दी और हिंसा के जरिए, खड़ा हो चुका था।
संविधान में आपातकाल का प्रावधान ऐसे ही हालात के लिए बनाया गया था। बल्कि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो पंडित नेहरू को एक जमाने में इससे कहीं छोटे मामलों के लिए आपातकाल लगाने की सलाह दी थी। संविधान सभा में डॉ भीमराव अंबेडकर ने आपातकाल की जरूरत और जिन परिस्थितियों की व्याख्या की थी, इंदिरा गांधी के समय में वह परिस्थितियों और भी व्यापक थी।
इंडियन एक्सप्रेस उस समय का सबसे स्वतंत्र और जनता की मुख्य आवाज वाला अखबार माना जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि उस समय उसके मालिक रामनाथ गोयनका विपक्षी दल के नेता थे और सरकार विरोधी प्रोपेगेंडा में पूरी तरह शामिल थे।
इंदिरा गांधी ने काफी इंतजार किया कि हालात काबू में आ जाए लेकिन जब देश ही बर्बाद हो जाएगा तो सरकार के होने या ना होने का क्या मतलब है? देश को बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया।
वह चाहती तो इस संवैधानिक प्रावधान का प्रयोग नहीं करती और विपक्ष के तमाम नेताओं को संदिग्ध मामलों में CBI, ED, इनकम टैक्स या अन्य किसी मामले में झूठा फंसा कर जेल में बंद कर देती। उन पर देशद्रोह या आतंकवाद के मामले लगाकर अंदर कर देती। उनके परिवार जनों पर दबाव डाल देती और उन्हें घुटने टेकने के लिए विवश कर देती। उनके मकान और व्यापार पर बुलडोजर चला देती। लेकिन इंदिरा गांधी ने ऐसा कुछ नहीं किया क्योंकि भारत के संविधान की आत्मा में यह सब बातें असंवैधानिक हैं और संविधान की मूल भावना के खिलाफ हैं।
इंदिरा गांधी ने षड्यंत्र की जगह सीधे मुकाबले का रास्ता अपनाया। मीसा जैसा कानून बनाया और उसके तहत विपक्ष के उपद्रव फैलाने वाले नेताओं को एक राजनीतिक कैदी की हैसियत से जेल भेजा गया। वहां उनके साथ सम्मानित राजनीतिक कैदी की तरह बर्ताव किया गया और ज्यादातर लोग मुश्किल से 1 साल जेल में रहे।
जब हालात काबू में आ गए तो इंदिरा गांधी ने बहुत सम्मान के साथ आपातकाल समाप्त कर दिया और विपक्ष के नेता रिहा कर दिए गए। उन्हें ना तो चुनाव लड़ने से रोका गया और ना कांग्रेस के खिलाफ जमकर प्रचार करने से। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुए और इंदिरा गांधी शान के साथ चुनाव हार गईं। उन्होंने बिना किसी विरोध के सत्ता छोड़ दी।
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के मुखर आलोचक रहे नवभारत टाइम्स के संपादक राजेंद्र माथुर ने बाद में लिखा कि इंदिरा गांधी तानाशाह नहीं थी। कोई तानाशाह तानाशाही लागू करने के लिए कई वर्ष तक इंतजार नहीं करता। अगर वह तानाशाह होतीं तो लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बनते ही तानाशाही लागू करने की कोशिश करती। इसी तरह कोई तानाशाह बिना किसी खास दबाव के तानाशाही से हटता नहीं है। इतिहास गवाह है कि बिना गृह युद्ध, विदेशी ताकतों के हाथ या सैनिक तख्ता पलट के बिना कोई तानाशाह अपनी गद्दी नहीं छोड़ता। लेकिन इंदिरा गांधी ने ऐसा किया।
सत्ता के अहंकार में डूबी मोदी सरकार अब इस मुकाम पर पहुँच गई है कि अपने अधिकारों, निष्पक्ष परीक्षाओं और सुरक्षित भविष्य की मांग करने वाले छात्रों को ही शिक्षा मंत्री “आतंकवादी” कह रहे हैं।
ज़रा सोचिए - जिसकी नाकामी से इतने पेपर लीक हुए, जिसके राज में 20 बच्चों ने जान दे दी, जिसने करोड़ों युवाओं का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया - वो आज पीड़ित बच्चों और उनकी आवाज़ उठाने वालों को “दहशतगर्द” बता रहा है।
पर यह कोई नई बात नहीं: अन्नदाता किसानों को "आंदोलनजीवी और परजीवी" कहा। सवाल पूछने वाले को “Anti-National” कहा। और अब युवाओं को “दहशतगर्द।”
जो भी सरकार से सवाल पूछे - उसे देशद्रोही बता दो, यही इनकी पूरी राजनीति है।
धर्मेंद्र प्रधान जी, देश के करोड़ों युवाओं से तुरंत माफ़ी माँगिए और अपनी नाकामियों के लिए इस्तीफ़ा दीजिए।
और रही मेरी बात - आप मुझ पर जितने चाहें हमले कर लीजिए। मैंने कोटा में कहा था, और फिर कहता हूँ: यह शिक्षा व्यवस्था आज सिर्फ़ एक वसूली तंत्र बन गई है। मैं इसे ऐसे ही नहीं रहने दूँगा।
हर बच्चे को सस्ती, अच्छी शिक्षा और निष्पक्ष परीक्षा मिले - इस आवाज़ को उठाना मैं कभी बंद नहीं करूँगा।
#ChhatronKiGoonj
#ChhatraJodo
इमरजेंसी पर ज़्यादा डिफेंसिव होने की ज़रूरत नहीं है। उसका दूसरा पक्ष भी है।
इंदिरा जी से किसे दिक्कत थी? बैंकों को, राजे-रजवाड़ों को और जमींदारों को।
इमरजेंसी गलत हो सकती है, इंदिरा गांधी नहीं @ratanlal72
इमरजेंसी का केवल एक हिस्सा दिखाने वालों को 1978 का इंदिरा गाँधी का यह इण्टरव्यू ज़रूर सुनना चाहिए। वे कौन से हालात थे जिनमें में इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगानी पड़ी।
विपक्ष के नेता कह रहे थे कि अगर हम बैलेट से नहीं जीतेंगे तो बुलेट से सत्ता हथिया लेंगे।
पूरे देश में अराजकता की आंधी चला दी गई थी। एक बड़ा षड्यंत्र था जिसके ख़िलाफ़ इंदिरा गांधी झुकी नहीं।
इमरजेंसी के बाद बनी जनता पार्टी सरकार ने किस तरह 23, हज़ार शिक्षकों को जेल में डाल दिया था।
सुनिए 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित करने वाला इंदिरा गांधी का संदेश।
कैबिनेट मंत्री की हत्या, चीफ जस्टिस पर प्राणघातक हमला, सेना से तख्तापलट की विपक्ष की अपील, विधायकों से जबरन इस्तीफ़े लिखवाकर सरकार गिराना और पूरे देश को हिंसा में झोंकना।
इन हालात में प्रयोग हुआ था संविधान का आपातकाल का क्लॉज़।