वो मन-सा है, जो पलटती है
कि शायद कोई डोर उस तक आना चाहती हो
उसे बचाने…
लेकिन मायूस होकर डूबती जाती है
किनारे पर खड़े तुम
उसे विलय होते देखते हो
सुनो..मैं वही हूँ
जिसे तुम बस डूबते हुए देखते रहे…
काश तुमने एक बार
हाथ बढ़ाया होता…
#मन_सा
"इस नदी को देखो.. तुम अक्सर कहते हो न कि कोई मन बह रहा हो जैसे.. शब्दों और भावनाओं से भरा मन"
"हां! जब भी यहां कुछ क्षण बिताता हूं.. शब्दों से भर जाता हूं। दूर पर्वतों के देस में बैठा कोई शब्द घोलता है इस नदी में। कल-कल बहती इसकी ध्वनि सुनो.. वो लेखक मुस्कुरा रहा है"। ❤️❤️#शुभई