आख़िरकार… धर्मेंद्र प्रधान को प्रधानमंत्री मोदी जी को अपना इस्तीफ़ा भेजना ही पड़ा।
मैंने पहले भी कहा थ,
कुछ दिन और लगेंगे, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा आएगा।
यह सिर्फ़ एक मंत्री का इस्तीफ़ा नहीं…
जवाबदेही की शुरुआत है।
अब कोई यह नहीं कह पाएगा कि
"हमारी सरकार में इस्तीफ़ा नहीं होता।"
अब जवाबदेही भी तय करनी होगी और दोषियों पर कार्रवाई भी करनी होगी।
यह जनता का साफ़ संदेश है कि कोई अधिकारी, मंत्री या नेता अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से नहीं बच सकता ,चाहे उसे सत्ता का संरक्षण मिले या विपक्ष का समर्थन। लोकतंत्र में सबसे बड़ा संरक्षण सिर्फ़ जनता के विश्वास का होता है।
छात्रों और जनता की आवाज़ आखिरकार सत्ता तक पहुँची
जिसे न चाहते हुए भी या मजबूरी में, स्वीकार करना ही पड़ा।
जय हिंद !
वोट चोरी भूल जाओगे...
नोटबंदी भूल जाओगे...
चंदा चोरी भूल जाओगे...
और कल को शायद एथेनॉल भी...
मगर पेपर लीक नहीं भूलने दूँगा...
अब इस पेपर लीक उद्योग के अंत का समय आ गया है।
सरकार का यह Revenue model अब और नहीं चलेगा।
हर आंदोलन गलत है।
लोग गलत हैं।
आवाज़ उठाना गलत है।
सवाल पूछना गलत है।
विरोध करना गलत है।
जवाब मांगना गलत है।
पारदर्शिता मांगना गलत है।
व्यवस्था पर प्रश्न उठाना गलत है।
अधिकार मांगना गलत है।
न्याय की उम्मीद करना गलत है।
फिर मैं पूछता हूँ -
क्या पेपर लीक सही है?
क्या मिलावटी पेट्रोल सही है?
क्या मंदिरों से चंदा चोरी सही है?
क्या भर्ती परीक्षाओं में वर्षों की देरी सही है?
क्या बेरोज़गारी सही है?
क्या महंगाई सही है?
क्या अस्पतालों में भ्रष्टाचार सही है?
क्या शिक्षा में घोटाले सही हैं?
क्या नकली दवाइयाँ सही हैं?
क्या पुलों का गिरना सही है?
क्या सड़कों पर गड्ढे और हादसे सही हैं?
क्या टैक्स देने के बाद भी बदहाल सुविधाएँ सही हैं?
क्या बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ सही है?
क्या युवाओं के सपनों का टूटना सही है?
आवाज़ उठेगी तभी तो कुछ बदलेगा अगर हर protest को हम ऐसे ही उसकी कमिया बताकर कमजोर करेंगे तो एक दिन आवाज़ उठाने वाले भी नहीं बचेंगे तब कौन आएगा आगे जब तुम पर ही बीतेगी |
मानवता जिन्दा रखो ||
सोनम वांगचुक, जिसने कभी अपने लिए नहीं माँगा, कुछ कि पद चाहिए, सत्ता चाहिए।
अपनी ज़िंदगी देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए लड़ते रहे है और 15-16 दिनों से अनशन पर बैठे हैं!
अपने लिए नहीं, देश के लिए। देश के बच्चों के भविष्य के लिए! उसके बाद भी देश के नेताओं की सोई हुई संवेदनाएँ नहीं जाग पा रही।
सत्ता की ख़ामोशी बरकरार है।
भूख हड़ताल और अनशन भी अगर व्यवस्था को सुनाई नहीं दे रहा, तो एक आम नागरिक की आवाज़ की कीमत क्या ही होगी?
अब दर्द सिर्फ़ यह नहीं कि एक व्यक्ति अनशन पर है, बड़ा दर्द यह है कि देश धीरे-धीरे उस मुकाम पर पहुँच रहा है जहाँ जनता की पीड़ा का महत्व खत्म है और उस पर सत्ता हावी है।
सोचिए, आज अगर एक ऐसे व्यक्ति की आवाज़ अनसुनी की जा सकती है, जिसने अपना जीवन देश के लिए लगा दिया, तो कल बेरोज़गार युवा, न्याय की गुहार लगाता परिवार, किसान, छात्र या कोई भी आम नागरिक किस उम्मीद से अपनी तकलीफ़ के लिए लड़ पाएगा और कौन उसकी सुनेगा?
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ चुनाव है क्या? अगर सत्ता अपने शांत नागरिक की आवाज़ नहीं सुन रही, तो ये लोकतंत्र पर सवाल नहीं है?
और अगर वह आवाज़ भी अनसुनी होने लगे! तो यह चिंता सिर्फ़ पूरे देश को होनी चाहिए।
Be stand with Sonam Wangchuk
कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन के सामने उनके अपने थे।जिन भीष्म पितामह की गोद में खेलकर वे बड़े हुए थे, वे सामने खड़े थे।जिन द्रोणाचार्य से उन्होंने धनुर्विद्या सीखी थी, वे सामने खड़े थे।भाई, बंधु, मित्र, रिश्तेदार- सब उसी रणभूमि में थे।
अर्जुन युद्ध छोड़ना चाहते थे- उन्हें हार का डर नहीं था। वह इसलिए टूट गए थे क्योंकि उन्हें लग रहा था कि जिन लोगों का उन्होंने जीवनभर सम्मान किया, आज उन्हीं के विरुद्ध खड़ा होना पड़ रहा है।
उनकी आँखें भर आईं, हाथ काँपने लगे,धनुष हाथ से छूटने लगा। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि ऐसे राज्य, ऐसे वैभव, ऐसी विजय का क्या करूँगा जिसके लिए मुझे अपने ही लोगों के विरुद्ध खड़ा होना पड़े?
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा- ये तुम्हारे अपने हैं- क्या संबंधों के मोह में सत्य और कर्तव्य त्याग दोगे?
व्यक्ति से प्रेम और उसके हर कर्म का समर्थन करना, दोनों अलग बातें हैं।
यदि केवल अपनेपन के कारण हम सही और गलत का निर्णय करना छोड़ दें, तो फिर न्याय का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
महाभारत हमें सिखाती है कि कभी-कभी जीवन में ऐसी घड़ी आती है जब आपके सामने कोई दुश्मन नहीं, बल्कि वही लोग खड़े होते हैं जिनके साथ आपने समय बिताया होता है, जिनका सम्मान किया होता है, जिनसे आपका परिचय होता है। उस समय सबसे आसान रास्ता होता है मौन रह जाना, आँखें बंद कर लेना और कहना कि - ये मेरे अपने हैं, मैं कुछ नहीं बोलूँगा।
व्यक्ति के प्रति सम्मान अपनी जगह है, लेकिन धर्म और सत्य उससे ऊपर हैं।मित्रता का अर्थ यह नहीं कि हम किसी की हर बात पर मौन हो जाएँ। सच्ची मित्रता और सच्चा सम्मान वही है जिसमें व्यक्ति के प्रति आदर बना रहे, लेकिन सत्य के प्रति निष्ठा भी बनी रहे।
मैंने जीवन में कभी यह नहीं कहा कि किसी व्यक्ति की सारी बातें गलत हैं। न मैंने यह कहा कि किसी व्यक्ति की सारी बातें सही हैं।
यदि किसी ने कभी मुझसे सलाह ली, यदि मैं किसी समारोह में गया, यदि मंच साझा किया, तो क्या उससे यह सिद्ध हो जाता है कि मैं जीवनभर उसकी हर बात पर मौन रहूँ?
मुद्दा किसी एक संस्थान का नहीं है।
हर बड़े coaching centre के मालिक पर toppers खरीदने का आरोप है| शिक्षा सेवा थी , जिम्मेदारी थी | उसे केवल उद्योग बनाकर नहीं देखा जा सकता।
सस्ती शिक्षा, सस्ती शिक्षा... यह सिर्फ एक ढिंढोरा है।
जिसे सच में बच्चों की चिंता होती, वह YouTube पर भी भरपूर पढ़ा सकता था।हमने खुद 1800 घंटे से ज्यादा YouTube पर पढ़ाया है।
लेकिन दुख इस बात का है कि 99.99% लोगों ने YouTube का उपयोग marketing tool के रूप में किया।
वहाँ पढ़ाई से ज्यादा emotions दिखाए।
गरीबी दिखाई।
संघर्ष बेचा।
झूठे सपने बेचे।
व्यक्तित्व को ब्रांड बनाया।
और धीरे-धीरे पढ़ाई पीछे छूटती गई।
मुझे पैसा कमाने से समस्या नहीं है।
मुझे समस्या है- शिक्षा के नाम पर भावनाओं का व्यापार हो।
कोविड के बाद online education के क्षेत्र में बहुत कुछ बदला। technology आई, opportunity बढ़े, लेकिन इसके साथ एक खतरनाक प्रवृत्ति भी बढ़ी।
Fake views, fake watching , खरीदी हुई लोकप्रियता, PR और बनावटी छवि के दम पर करोड़ो छात्रों को प्रभावित किया गया। गरीबी, संघर्ष और emotions को इस तरह बेचा गया कि लोगो ने उसे सत्य मान लिया। धीरे-धीरे शिक्षा पीछे छूटती गई और व्यक्तित्व की पूजा शुरू हो गई।
Podcast, interview और social media के reels & shorts के माध्यम से कुछ लोगों की ऐसी छवि गढ़ी गई मानो वे सबसे से ऊपर हों। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि उनसे असहमति जताना या उनसे सवाल पूछना भी अपराध जैसा माना जाने लगा।
लेकिन क्या बड़ा होने का अर्थ यह है कि आपसे प्रश्न नहीं पूछे जा सकते?
क्या लोकप्रियता जवाबदेही का विकल्प है?
क्या करोड़ों लोगों की पहुँच मिल जाने के बाद गलतियों पर चर्चा बंद हो जानी चाहिए?
और यदि कोई आवाज़ उठाए, तो क्या उसे उसी ताकत, प्रभाव और पैसे के दम पर दबा देना उचित है जो जनता ने ही आपको दिया है?
लोकतंत्र हो, शिक्षा हो या समाज - प्रश्न पूछना सुधार की पहली शर्त है।
व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसे प्रश्नों से बड़ा नहीं होना चाहिए।
मुझे सबसे अधिक चिंता किसी एक व्यक्ति की नहीं है। चिंता उस माहौल की है जहाँ लोग सत्य से अधिक छवि को, तर्क से अधिक प्रचार को और जवाबदेही से अधिक लोकप्रियता को महत्व देने लगे हैं।
कभी-कभी लगता है कि पैसा कमाने की दौड़ में कुछ लोगों ने सिर्फ अपने सिद्धांत नहीं, अपना ज़मीर तक गिरवी रख दिया।
और सबसे दुखद बात यह है कि इसका मूल्य उन छात्रों ने चुकाया जो सच और दिखावे के बीच का अंतर नहीं समझ पाए ।
विपक्ष को तोड़ कर चुनौती जनता को दी जा रही है कि आपकी कोई औक़ात नहीं है। ऐसा कर लोकतंत्र का उत्साह ख़त्म किया जा रहा है। अगर कोर्ट केस माफ़ कराने के लिए सांसद पार्टी छोड़ रहे हैं तो सवाल उठेगा कि क्या कोर्ट ने ED की जगह ले ली है? अदालत की साख को दाँव पर लगाने से नुक़सान भरोसे का होगा। वकील प्रतिस्पर्धा में निखरते हैं।उनके पेशे को AI से ज़्यादा ख़तरा न्याय व्यवस्था को पार्टी व्यवस्था में बदल देने से होगा। इसके बाद क्या बचेगा? हताशा का लंबा दौर और नतीजा? एक शब्द में - दुर्दशा। हताशा से केवल दुर्दशा पैदा होती है। राष्ट्र के लोक जीवन का उत्साह ख़त्म हो जाता है। उसकी आर्थिक प्रगति भी कुंठित हो जाती है। अभी सत्ता के दम पर कुछ भी कर लीजिए लेकिन सबके सामने सांसदों को गुलाम की तरह पेश कर राजनीति के महत्व को भी समाप्त किया जा रहा है। अगर यह जीत है तो बीजेपी जश्न क्यों नहीं मना रही? क्या इस देश में किसी को पार्टी चलाने नहीं आती? फिर जब सारा बहुमत आ ही गया तब चुनाव बंद कर दीजिए।
पता है, भारत की सिर्फ़ 5 परीक्षाओं - NEET, JEE, SSC, UPSC और RRB की तैयारी पर छात्र और उनके परिवार हर साल कितना ख़र्च करते हैं?
₹3.5 लाख करोड़।
यानी भारत सरकार के पूरे शिक्षा बजट का लगभग तीन गुना। शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, विज्ञान और महिला-बाल विकास - इन पाँच मंत्रालयों के कुल बजट के बराबर।
और बदले में करोड़ों युवाओं को क्या मिलता है? तनाव, अनिश्चितता, बेरोज़गारी, और टूटते सपने।
जो ख़र्च सरकार की ज़िम्मेदारी है, उसका बोझ आज परिवार उठा रहे हैं।
#ChhatronKiGoonj
भारत की शिक्षा व्यवस्था आज सिर्फ़ एक वसूली तंत्र बन गई है।
ज़रा सोचिए - देशभर के परिवार जितना पैसा सिर्फ़ NEET की तैयारी पर ख़र्च करते हैं, वो भारत सरकार के पूरे शिक्षा बजट के बराबर है।
आज कोटा से, और देश के हर कोने से, लाखों युवा एक सुर में कह रहे हैं - इस व्यवस्था ने हमारे साथ अन्याय किया है।
हर युवा अलग है, पर सबकी कहानी एक - या तो सपने देखने नहीं दिए गए, या देखे हुए सपने तोड़ दिए गए।
‘छात्रों की गूंज’ सिर्फ़ अभियान नहीं - एक क्रांति है। हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी है जो आपको बड़े सपने देखने का हक़ दे और आपकी ज़िंदगी गिरवी रखे बिना, उन्हें पूरा करने में आपका साथ दे।
#ChhatronKiGoonj
दिल❤️ की आवाज़ है - Must read ||
अच्छा सोचेगा भारत, तभी तो अच्छा करेगा भारत।
लेकिन सोच अच्छी कैसे होगी?
जब हम अधिकांश मिलावटी खाना खा रहे है ।
शरीर को पोषण मिलेगा कैसे ?
दिमाग कैसे विकसित होगा ? Fresh feel होगा ?
उसके बाद स्कूल में सालो से वही किताबें रटवा दी जा रही है।
संस्कार, नागरिकता की समझ, व्यवहार, संविधान की बुनियादी जानकारी, वित्तीय साक्षरता, तकनीक, व्यावहारिक कौशल- जिन चीज़ों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है,
वो है ही न्ही - जीवन जीना कहाँ से सीखेगा ?
फिर बच्चा मेहनत करके पढ़ ले तो अच्छे कॉलेज की दौड़ में हार जाता है ।
कॉलेज मिल जाए तो डिग्री की चिंता,डिग्री मिल जाए तो नौकरी की चिंता,
नौकरी मिल जाए तो stability की चिंता।
एक इंसान अपनी पूरी जवानी सिर्फ़ खुद को साबित करने में लगा दे रहा है।जिस ecosystem को उसे आगे बढ़ाने के लिए बनना चाहिए था- वो देश बना ही नहीं पाया |
इस विफलता के लिए केवल एक सरकार जिम्मेदार नहीं है।
इसमें दशकों की राजनीति, सुस्त नौकरशाही, दूरदृष्टि की कमी,
और उन तमाम प्रभावशाली लोगों , मीडिया की भी जिम्मेदारी है जो समस्याओं को हल करने से ज्यादा उन्हें छिपाने में लगे रहे ।
सबसे दुखद बात ये है कि लोग पहले निराश हुए और अब हताश हो चुके हैं।इतने ढल चुके है कि उन्हें समस्याएँ अब समस्याएँ लगती ही नहीं।
पेपर लीक? चलता है।
बेरोज़गारी? चलता है।
खराब स्कूल? चलता है।
अस्पतालों की बदहाली? चलता है।
प्रदूषण? चलता है।
यही “चलता है” ने पूरे समाज को रोक दिया ।
सब यही कहने सुनने लगे है कि
“इस देश का कुछ नहीं हो सकता।”
मैं पूछता हूँ…क्यों नहीं हो सकता?
क्या इस देश में talent की कमी है?
क्या इस देश में मेहनत करने वालों की कमी है?
क्या इस देश में सपने देखने वालों की कमी है?
नहीं।
कमी इतनी है कि हमने सवाल पूछना कम करते चले गए।
हमने अपने अधिकारों को मांगना छोड़ दिया ।
हमने व्यवस्था से जवाब लेना छोड़ दिया ।
देशभक्ति केवल झंडा लगाने का नाम नहीं है।
देशभक्ति ये भी तो है कि
जब शिक्षा कमजोर हो रही हो तो आप आवाज़ उठाएँ।
जब अस्पतालों की हालत खराब हो तो आप सवाल पूछें।
जब युवाओं का भविष्य खतरे में हो तो आप चुप न रहें।
जब व्यवस्था गलती करे तो उसकी आलोचना की जाये
क्योंकि अंधा समर्थन देश प्रेम नहीं होता।
सुधार की मांग करना राष्ट्रप्रेम है।
मुझे उस देशभक्ति पर भरोसा है
जो देश को बेहतर बनाना चाहती है,
न कि हर कमी पर पर्दा डालने वाली।
क्योंकि "मेरा देश" कोई नारा नहीं है।
यह करोड़ों बच्चों के सपने हैं , उम्मीदें हैं।
यह उन माता-पिता की आँखों का विश्वास है
जो अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं।
और जब तक यह विश्वास जिंदा है, तब तक मेरा दिल कभी यह मानने को तैयार नहीं होगा
“इस देश का कुछ नहीं हो सकता।”
नहीं।
इस देश का बहुत कुछ हो सकता है।
बस हम समस्याओं को normal मानना बंद करें,
और समाधान मांगना शुरू करें।
क्योंकि देशभक्ति देश को बेहतर बनाने की जिद से पैदा होनी चाहिए । 🇮🇳❤️
Maths मेरे नाम में विषय नहीं, सोचने का तरीका,तर्क और विश्लेषण भी है। है।
जहाँ आँकड़े होंगे, वहाँ Maths होगी।
चाहे EXAM का Paper हो या देश की अर्थव्यवस्था।
लोग कहते हैं मेरे tweet Maths के syllabus से बाहर है।
मैं कहता हूँ बेरोज़गारी, GDP, बजट, महंगाई, टैक्स, शेयर बाज़ार - सब Numbers की भाषा हैं।
Maths सिर्फ़ HCF-LCM तक सीमित नहीं है।
देश की अर्थव्यवस्था से लेकर शेयर बाज़ार तक, पूरी दुनिया Numbers पर चलती है।
इसलिए Abhinay Maths नाम है, Abhinay Chapter-7 Exercise-3 नहीं।
MATHS = Mindset, Analysis, Truth, Humanity & Statistics
MATHS = Mindset And Thinking Handling Society
इसलिए सवाल चाहे परीक्षा का हो, अर्थव्यवस्था का हो या समाज का - चर्चा जारी रहेगी।
This #WorldEnvironmentDay, I want to ask every young Indian one question:
What kind of India do you want to inherit?
One where rainforests have been bulldozed for casinos, coral reefs erased from maps, tribal communities pushed off their land, and the air we breathe turned into poison?
Or one where India’s natural heritage is protected, our tribal communities are safe, and progress works with nature - not against it.
Right now, the Modi government is destroying Great Nicobar Island. More than 1.5 crore trees, ancient coral reefs, irreplaceable rainforests are being destroyed - to profit one businessman.
This is your inheritance they are bulldozing. And only you can stop them.
Sign the petition. Tell the Modi government we choose #GreenOverGreed 🇮🇳
#NicobarMatters
https://t.co/bJOIt0tzgs