क्यों बे, "राष्ट्रीय समलैंगिक संगठन" के डिजिटल सदस्य! एक-दूसरे की इतनी मत खुजाओ, थोड़ा तेल भी ले लो 👇🏿!!
बाकी, उस कुकुर को इतना निर्लज्ज नहीं कि पोस्ट कर दूँ। उसके बच्चे की कोई गलती नहीं है कि उसके बाप की नीचता की वजह से उसे घसीटा जाए।
वैसे पितृपक्ष आ रहा है, पितृ की चिंता कर। पिछली बार दिहाड़ी में ज़्यादा बिज़ी था तू; उसका लेखा-जोखा भी है।
तो औकात मे रहो, वरना सिलाई उधेड़ दूँगा। अभी बस तुम्हारे मालिक की हवा निकाल रहा हूँ।
मोदी कई मायनों में ऑस्ट्रिया के मेटरनीख की तरह हैं🖋️
रोज़ाना की ख़बरों पर प्रतिक्रिया के परे मैं क्यों कहता हूँ कि मोदी कई मायनों में ऑस्ट्रिया के मेटरनीख की तरह हैं।
मेटरनीख, ऑस्ट्रिया को स्थिरता (stability) तो दे पाया, परंतु ऑस्ट्रियन साम्राज्य (हैब्सबर्ग परिवार) के विरोधाभासों का समाधान न कर सका। ऑस्ट्रिया के अंदर बसने वाले जर्मन, क्रॉट्स, हंगेरियन, चेक्स, स्लोवेन्स, रोमेनियंस, इन सभी के बीच समन्वय नहीं बना सका। वो इन्हें एक दूसरे के ख़िलाफ़ करके, साम्राज्य में संतुलन तो ले आया लेकिन यह उसके स्टेटक्राफ़्ट का परिचय था, राष्ट्र निर्माण का नहीं।
मेटरनीख की सबसे बड़ी समस्या थी कि वो यथास्थितिवाद में जीना चाहता था और ख़ुद को और साम्राज्य के हितैषियों को ये कहकर गुदगुदा देता था कि किसी भी प्रकार से साम्राज्य की स्थिरता को सुनिश्चित करना ही विकास है। उसका मूल मंत्र था “Stability first, Reform risks revolution”.
नतीजा क्या निकला? मेटरनीख, ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग एम्पायर को बचाने में कामयाब तो हो गया। वो लगभग तीस साल तक स्थिरता बनाए रखा। लेकिन अंतर-विरोधों का समाधान किए बगैर, सिर्फ़ एक को दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करने से, साम्राज्य बच तो गया पर बेहद कमज़ोर हो गया।
फिर क्या था 1848 में पूरा यूरोप और ऑस्ट्रियन एम्पायर क्रांति और अराजकता में डूब गया और 13 मार्च को मेटरनीख को पद से निष्कासित कर दिया गया। हैब्सबर्ग परिवार और ऑट्रिया साम्राज्य बच तो गया पर अंदरूनी रूप से ऐसा कमज़ोर हुआ कि आने वाले कुछ दशकों में पहले यूरोप की राजनीति से ग़ायब हुआ और फिर साम्राज्य का सूरज ही अस्त हो गया।
मोदी भी, मेटरनीख की ही तरह, स्टेटक्राफ़्ट के काफ़ी क्राफ्टी नेता साबित हो रहे हैं, जिन्हें ये तो मालूम है कि सत्ता पर पकड़ कैसे बनाए रखनी है, कैसे विपक्ष को धराशाई करना है, कैसे हिंदुत्व के नीचे जाति समूहों को एक दूसरे का भय दिखाकर संतुलित करना है, पर सही मायने में भारत के भीतर उभरते हुए अंतर-द्वन्दों का उनके पास कोई समाधान नहीं है। बल्कि वो इन अंतर-विरोधों को अपनी स्थिरता के लिए हवा दे रहे हैं।
तो राजनीतिक स्थिरता तो बनी हुई है पर भारत का समाज और उसकी राजनीति विस्फोटक होते जा रहे हैं। ऐसे में सिर्फ स्थिरता की गुदगुदी भारत को न बचा पाएगी, न ही इसे आगे ले जा पाएगी।
"हिंदुत्व के नीचे जाति समूहों को एक दूसरे का भय दिखाकर संतुलित करना है, पर सही मायने में भारत के भीतर उभरते हुए अंतर-द्वन्दों का उनके पास कोई समाधान नहीं है। बल्कि वो इन अंतर-विरोधों को अपनी स्थिरता के लिए हवा दे रहे हैं।"..
मोदी कई मायनों में ऑस्ट्रिया के मेटरनीख की तरह हैं🖋️
रोज़ाना की ख़बरों पर प्रतिक्रिया के परे मैं क्यों कहता हूँ कि मोदी कई मायनों में ऑस्ट्रिया के मेटरनीख की तरह हैं।
मेटरनीख, ऑस्ट्रिया को स्थिरता (stability) तो दे पाया, परंतु ऑस्ट्रियन साम्राज्य (हैब्सबर्ग परिवार) के विरोधाभासों का समाधान न कर सका। ऑस्ट्रिया के अंदर बसने वाले जर्मन, क्रॉट्स, हंगेरियन, चेक्स, स्लोवेन्स, रोमेनियंस, इन सभी के बीच समन्वय नहीं बना सका। वो इन्हें एक दूसरे के ख़िलाफ़ करके, साम्राज्य में संतुलन तो ले आया लेकिन यह उसके स्टेटक्राफ़्ट का परिचय था, राष्ट्र निर्माण का नहीं।
मेटरनीख की सबसे बड़ी समस्या थी कि वो यथास्थितिवाद में जीना चाहता था और ख़ुद को और साम्राज्य के हितैषियों को ये कहकर गुदगुदा देता था कि किसी भी प्रकार से साम्राज्य की स्थिरता को सुनिश्चित करना ही विकास है। उसका मूल मंत्र था “Stability first, Reform risks revolution”.
नतीजा क्या निकला? मेटरनीख, ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग एम्पायर को बचाने में कामयाब तो हो गया। वो लगभग तीस साल तक स्थिरता बनाए रखा। लेकिन अंतर-विरोधों का समाधान किए बगैर, सिर्फ़ एक को दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करने से, साम्राज्य बच तो गया पर बेहद कमज़ोर हो गया।
फिर क्या था 1848 में पूरा यूरोप और ऑस्ट्रियन एम्पायर क्रांति और अराजकता में डूब गया और 13 मार्च को मेटरनीख को पद से निष्कासित कर दिया गया। हैब्सबर्ग परिवार और ऑट्रिया साम्राज्य बच तो गया पर अंदरूनी रूप से ऐसा कमज़ोर हुआ कि आने वाले कुछ दशकों में पहले यूरोप की राजनीति से ग़ायब हुआ और फिर साम्राज्य का सूरज ही अस्त हो गया।
मोदी भी, मेटरनीख की ही तरह, स्टेटक्राफ़्ट के काफ़ी क्राफ्टी नेता साबित हो रहे हैं, जिन्हें ये तो मालूम है कि सत्ता पर पकड़ कैसे बनाए रखनी है, कैसे विपक्ष को धराशाई करना है, कैसे हिंदुत्व के नीचे जाति समूहों को एक दूसरे का भय दिखाकर संतुलित करना है, पर सही मायने में भारत के भीतर उभरते हुए अंतर-द्वन्दों का उनके पास कोई समाधान नहीं है। बल्कि वो इन अंतर-विरोधों को अपनी स्थिरता के लिए हवा दे रहे हैं।
तो राजनीतिक स्थिरता तो बनी हुई है पर भारत का समाज और उसकी राजनीति विस्फोटक होते जा रहे हैं। ऐसे में सिर्फ स्थिरता की गुदगुदी भारत को न बचा पाएगी, न ही इसे आगे ले जा पाएगी।
The sheer arrogance of an expat sitting comfortably outside India and lecturing Indians about how they should vote is fu*king pathetic.
You don't live here, you don't deal with the consequences of these policies, yet you have the nerve to call Indians "bigoted", "crabs" and "ntellectual slaves" because they refuse to bend to your political sermon.
And the funniest part? You claim these people "don't matter", then write an entire meltdown about what might happen if their votes actually matter. 😂
If we matter so little, why the hell are you this rattled by what we do with our votes?
Stay in your comfortable foreign bubble, you arrogant political slave. Indians living here will decide India's politics, not some self-important expat sitting thousands of miles away and throwing around condescending bullshit as if he owns the fu*king country.
Maybe get off your high horse and stop lecturing people who actually live in the country you're so desperate to intellectually colonise.
PH 110 🤣🤣🤣🤣
बोर्ड पर क्या लिखा है, वो तो पढ़ लेता! और **कौन अटेंड करता है इसको, क्यों बनी ये क्लास और क्यों इतने कम लोग हैं**
वैसे कुछ 'टोपी जी का परिवार" वाले इसको भी सच मान सकते है!