।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं
हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य ।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्
स्रोतांसि सर्वाणि भयानकानि ।।८।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्याय:)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र योग, ध्यान, आत्मसंयम और ब्रह्मविद्या के अद्भुत समन्वय का दिव्य प्रकाशस्तम्भ है। यहाँ उपनिषद् केवल शारीरिक आसन का निर्देश नहीं करती, अपितु सम्पूर्ण अन्तर्मन को ब्रह्माभिमुख करने वाली साधना-पद्धति का अत्यन्त सूक्ष्म एवं दार्शनिक निरूपण करती है। भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के अद्वैतवेदान्त के अनुसार आत्मसाक्षात्कार का मार्ग बाह्य चञ्चलता से अन्तर्मुख स्थिरता की ओर यात्रा है; और यह मन्त्र उसी आध्यात्मिक आरोहण का रहस्य उद्घाटित करता है।
“त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरम्” यहाँ साधक को शरीर को सम एवं संतुलित रखने का उपदेश दिया गया है। “त्रिरुन्नतम्” का अर्थ है- वक्षःस्थल, ग्रीवा और मस्तक को सीधा एवं एक रेखा में स्थित करना। यह केवल योगशास्त्रीय अनुशासन नहीं, बल्कि आन्तरिक संतुलन का प्रतीक भी है। शरीर की अस्थिरता मन की चञ्चलता को बढ़ाती है, जबकि शरीर की स्थिरता अन्तःकरण को एकाग्रता की ओर ले जाती है।
शाङ्करभाष्य की भावना में यह स्थिर आसन केवल देह की स्थिति नहीं, बल्कि साधक के जीवन में समत्व की स्थापना का संकेत है। जो व्यक्ति विषयों के आकर्षण, राग-द्वेष, भय और अहंकार से विचलित रहता है, उसका चित्त कभी आत्मतत्त्व में स्थिर नहीं हो सकता। अतः उपनिषद् पहले बाह्य स्थिरता के माध्यम से आन्तरिक स्थिरता का मार्ग प्रशस्त करती है।
इसके पश्चात् मन्त्र कहता है कि
“हृदीन्द्रियाणि मनसा सन्निवेश्य” अर्थात् मन द्वारा इन्द्रियों को हृदय में स्थापित करे। यहाँ “हृदय” केवल भौतिक अंग नहीं, बल्कि चेतना का आध्यात्मिक केन्द्र है। उपनिषदों में हृदय को आत्मा का निवासस्थान कहा गया है- “हृदि ह्येष आत्मा।” इन्द्रियाँ स्वभावतः विषयों की ओर प्रवाहित होती हैं। नेत्र रूप की ओर, कर्ण शब्द की ओर, रसना स्वाद की ओर भागती रहती हैं। यही बहिर्मुखता मनुष्य को संसारबन्धन में रखती है। जब साधक मन की शक्ति से इन्द्रियों को विषयों से हटाकर हृदय में स्थित करता है, तब चित्त धीरे-धीरे अन्तर्मुख होने लगता है। यही प्रत्याहार और ध्यान का वास्तविक आरम्भ है।
भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार आत्मा कभी विषयों में नहीं रहती; विषयों में केवल मन का अध्यास होता है। जब मन विषय-संकल्पों से मुक्त होकर आत्मचिन्तन में प्रतिष्ठित होता है, तब ज्ञान का प्रकाश प्रकट होने लगता है। यही कारण है कि गीता में कहा गया- “यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।” जैसे कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, वैसे ही ज्ञानी पुरुष इन्द्रियों को विषयों से हटा लेता है।
मन्त्र का तृतीय चरण अत्यन्त दिव्य है- “ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्” यहाँ “उडुप” का अर्थ है- नौका। उपनिषद् कहती है कि ज्ञानी पुरुष ब्रह्मरूपी नौका के द्वारा संसाररूपी महासागर को पार करता है। यह उपमा अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक अर्थ से युक्त है। अद्वैतवेदान्त में संसार को अविद्या से उत्पन्न भय, मोह, जन्म-मृत्यु और दुःखों का अनन्त प्रवाह कहा गया है। जीव इस संसार में ऐसे भटकता है जैसे कोई व्यक्ति प्रचण्ड समुद्र में दिशाहीन होकर डूब रहा हो। इस भयानक प्रवाह से पार कराने वाली एकमात्र नौका है- ब्रह्मज्ञान। “ब्रह्मोडुप” का अर्थ केवल शास्त्रीय ज्ञान नहीं, बल्कि वह प्रत्यक्ष अनुभूति है, जिसमें साधक जान लेता है कि वह शरीर, मन और इन्द्रियों से परे शुद्ध चैतन्यस्वरूप ब्रह्म है। जब यह अनुभूति होती है, तब संसार का भय समाप्त हो जाता है। मृत्यु, हानि, वियोग और परिवर्तन ज्ञानी को विचलित नहीं कर पाते, क्योंकि वह जानता है कि आत्मा नित्य, अविनाशी और अखण्ड है।
अन्तिम चरण- “स्रोतांसि सर्वाणि भयानकानि” संसार के उन समस्त भयावह प्रवाहों की ओर संकेत करता है, जो जीव को निरन्तर बहा ले जाते हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख और अनन्त वासनाएँ। यही वे “स्रोतांसि” हैं जिनमें फँसकर जीव बारम्बार संसारचक्र में घूमता रहता है। परन्तु भगवान आदि शंकराचार्य की अद्वैतदृष्टि में जब ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, तब ये समस्त प्रवाह मिथ्या प्रतीत होने लगते हैं। जैसे जागरण होने पर स्वप्न का भय समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर संसार का समस्त भय नष्ट हो जाता है। उपनिषद् का यही परम संदेश है - “तमेवविदित्वाऽतिमृत्युमेति।” उसी ब्रह्म को जानकर मनुष्य मृत्यु से परे चला जाता है और उसी क्षण वह संसार के समस्त भयानक स्रोतों को पार कर अमृतस्वरूप शान्ति में प्रतिष्ठित हो जाता है।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् ।
यत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्तमक्षिपत् ।।७।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र साधना, ब्रह्मचिन्तन और परम तत्त्व की ओर उन्मुख अन्तर्मन की आध्यात्मिक यात्रा का अत्यन्त गूढ़ एवं दिव्य उद्घोष है। यह मन्त्र बाह्य वैदिक देवता “सविता” के माध्यम से उस परम चेतन सत्ता की ओर संकेत करता है, जो समस्त सृष्टि की प्रेरक, धारक और चेतनामयी आधारशक्ति है। भगवद्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य की अद्वैतदृष्टि में उपनिषदों का प्रत्येक मन्त्र अन्ततः जीव को ब्रह्मस्वरूप की अनुभूति की ओर ले जाने वाला प्रकाशस्तम्भ है; अतः यह मन्त्र भी केवल कर्मकाण्डीय प्रार्थना नहीं, अपितु आत्मविद्या की सूक्ष्म साधना का दार्शनिक संकेत है।
यहाँ “सवित्रा प्रसवेन” अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पद है। “सविता” वैदिक परम्परा में वह दिव्य शक्ति है जो समस्त जगत् को प्रेरणा देती है, गति देती है, चेतना देती है। परन्तु शाङ्करभाष्य की दृष्टि से यह सविता कोई सीमित देवता नहीं, बल्कि ब्रह्म की ही उपाधियुक्त अभिव्यक्ति है- वह चेतन सत्ता जिसके कारण बुद्धि सोचती है, प्राण गतिशील होते हैं, सूर्य प्रकाश देता है और सम्पूर्ण जगत् क्रियाशील प्रतीत होता है।
“प्रसव” का अर्थ है - प्रेरणा, दिव्य आवेग, आध्यात्मिक प्रवर्तन। साधक अपने सीमित अहंकार, व्यक्तिगत संकल्प और विषयासक्ति से ऊपर उठकर उस परम चेतना की प्रेरणा में स्थित हो; यही इस मन्त्र का प्रथम संकेत है। जब तक साधना केवल व्यक्तिगत प्रयास रहती है, तब तक उसमें अहंकार का सूक्ष्म अंश विद्यमान रहता है; किन्तु जब साधक अनुभव करता है कि समस्त शक्ति परमात्मा से ही प्रवाहित हो रही है, तब उसकी साधना समर्पणमयी हो जाती है।
“जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्” यह पद अत्यन्त गहन दार्शनिक महत्त्व रखता है। “पूर्व्यं ब्रह्म” अर्थात् आद्य, अनादि, सनातन ब्रह्म - जो सृष्टि से पूर्व भी था, सृष्टि में भी है और प्रलय के पश्चात् भी अविचल रहता है। उपनिषद् यहाँ साधक को निर्देश देती है कि वह उसी आदिब्रह्म का सेवन, चिन्तन, ध्यान और आत्मानुभव करे।
अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म कोई बाह्य सत्ता नहीं, जिसे कहीं जाकर प्राप्त करना हो; वह स्वयं आत्मस्वरूप ही है। परन्तु अविद्या के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर देह, मन, बुद्धि और अहंकार को ही “मैं” मान बैठता है। इसलिए भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य बार-बार कहते हैं कि ब्रह्मज्ञान किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की विस्मृत स्मृति का पुनर्जागरण है। यह मन्त्र साधक को बाह्य जगत् की अस्थिरता से हटाकर उस “पूर्व्य ब्रह्म” की ओर उन्मुख करता है, जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है। यही ब्रह्म उपनिषदों में कहा गया - “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।” नेह नानास्ति किंचन।” जहाँ द्वैत का लेश भी नहीं, वही परम ब्रह्म है।
मन्त्र का उत्तरार्ध - “यत्र योनिं कृणवसे” अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक अर्थ से परिपूर्ण है। “योनि” यहाँ उत्पत्ति-स्थान, आधार, आश्रय अथवा अन्तःकरण की उस पवित्र भूमि का द्योतक है जहाँ ब्रह्मविद्या प्रतिष्ठित होती है। साधक अपने भीतर ऐसा अन्तर्मन्दिर निर्मित करे, जो शुद्ध, सात्त्विक, एकाग्र और ब्रह्माभिमुख हो।
शाङ्करवेदान्त के अनुसार अशुद्ध चित्त में ब्रह्मज्ञान स्थिर नहीं होता। जैसे अशान्त जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब विकृत दिखाई देता है, वैसे ही विक्षिप्त मन में आत्मतत्त्व का प्रकाश स्पष्ट नहीं होता। अतः साधना का उद्देश्य केवल ज्ञान-संग्रह नहीं, बल्कि अन्तःकरण-शुद्धि है। जब हृदय अहंकार, राग, द्वेष, लोभ और विषयासक्ति से मुक्त होकर निर्मल बनता है, तब वही ब्रह्मज्ञान की “योनि” अर्थात् उपयुक्त आधार बन जाता है।
“न हि ते पूर्तमक्षिपत्” यह पद अत्यन्त मार्मिक है। इसका भाव यह है कि साधक का यह आध्यात्मिक प्रयत्न निष्फल नहीं जाता; सत्य की ओर किया गया कोई भी प्रयास व्यर्थ नहीं होता। ब्रह्ममार्ग में किया गया प्रत्येक तप, प्रत्येक ध्यान, प्रत्येक आत्मचिन्तन अन्ततः साधक को परमकल्याण की ओर ही अग्रसर करता है।
अतः उपनिषद् साधक को आश्वस्त करती है कि यदि वह दिव्य प्रेरणा से, शुद्ध अन्तःकरण से और ब्रह्माभिमुख बुद्धि से साधना करता है, तो उसका आध्यात्मिक जीवन अवश्य ही पूर्णता को प्राप्त होगा।
भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य की अद्वैतदृष्टि में इस मन्त्र का परम रहस्य यह है कि साधना का अन्तिम लक्ष्य बाह्य देवता की प्राप्ति नहीं, अपितु उस चैतन्यस्वरूप आत्मा की अनुभूति है जो स्वयं ब्रह्म है।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते।
सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र सञ्जायते मनः ।।६।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्याय:)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र अत्यन्त गूढ़ योगदर्शन, अन्तर्मुख साधना तथा ब्रह्मविद्या के रहस्यों को अत्यल्प शब्दों में उद्घाटित करता है। यह केवल लौकिक अग्नि, वायु और सोम का वर्णन नहीं करता, अपितु साधक के अन्तःकरण में घटित होने वाली उस आध्यात्मिक प्रक्रिया का सूक्ष्म संकेत है, जिसके द्वारा चित्त शुद्ध होकर ब्रह्मबोध के योग्य बनता है। भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के भाष्य के अनुसार उपनिषदों की समस्त साधना का परम प्रयोजन आत्मस्वरूप की अनुभूति है, और यह मन्त्र उसी अनुभूति की पूर्वपीठिका के रूप में योग, प्राणसंयम तथा अन्तर्मन की दिव्य अवस्था का दिग्दर्शन कराता है।
यहाँ “अग्नि”, “वायु” और “सोम” इन तीनों शब्दों का तात्त्विक अर्थ ग्रहण करना आवश्यक है। शाङ्करभाष्य की परम्परा में उपनिषद् प्रतीकों और दार्शनिक संकेतों के माध्यम से साधना के गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करती हैं। “अग्नि” केवल भौतिक अग्नि नहीं, अपितु योगाग्नि, ज्ञानाग्नि अथवा साधना से प्रज्वलित अन्तःकरण का प्रतीक है।
“अभिमथ्यते” शब्द यह सूचित करता है कि जैसे अरणियों के मन्थन से अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही निरन्तर अभ्यास, वैराग्य, तप और आत्मचिन्तन के मन्थन से अन्तःकरण में ज्ञान की ज्वाला प्रकाशित होती है। साधना के बिना आत्मतत्त्व स्वतः प्रकट नहीं होता; उसके लिए चित्त का मन्थन आवश्यक है। यही कारण है कि गीता में भगवान् कहते हैं - “ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते।” ज्ञानरूप अग्नि ही अविद्या और कर्मबन्धनों को भस्म करती है।
“वायुर्यत्राधिरुध्यते” यहाँ वायु का तात्पर्य प्राणशक्ति से है। योगमार्ग में प्राण का अत्यन्त महत्त्व है, क्योंकि चित्त और प्राण परस्पर गहन रूप से सम्बद्ध हैं। जहाँ प्राण चञ्चल होता है वहाँ मन भी अस्थिर रहता है; और जहाँ प्राण संयमित होता है वहाँ चित्त भी एकाग्र होने लगता है। “आधिरुध्यते” का अर्थ है - नियन्त्रित, निरुद्ध अथवा संयमित किया जाना। यह प्राणायाम की ओर संकेत करता है। शाङ्करवेदान्त यद्यपि अन्ततः ज्ञानमार्ग का प्रतिपादक है, तथापि चित्तशुद्धि और एकाग्रता के लिए योगसाधना की उपयोगिता को स्वीकार करता है।
उपनिषद् का यह मन्तव्य है कि जब साधक प्राण को संयमित करता है, इन्द्रियों को विषयों से हटाकर अन्तर्मुख करता है, तब मन की चञ्चल वृत्तियाँ शान्त होने लगती हैं। पतञ्जलियोगसूत्र का यह वचन भी इसी सत्य को उद्घाटित करता है- “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।” चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है। परन्तु भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह निरोध अन्तिम लक्ष्य नहीं, अपितु आत्मसाक्षात्कार की तैयारी है। स्थिर चित्त ही ब्रह्मतत्त्व का अवगाहन कर सकता है।
“सोमो यत्रातिरिच्यते” यह पद अत्यन्त रहस्यमय एवं दिव्य है। वैदिक साहित्य में सोम अमृत, आनन्द, शान्ति और दिव्य चेतना का प्रतीक है। यहाँ सोम का तात्पर्य उस आध्यात्मिक आनन्द से है जो अन्तर्मन की निर्मलता और समाधिस्थ अवस्था में प्रकट होता है। जब साधक के भीतर ज्ञानाग्नि जागृत होती है और प्राण संयमित होता है, तब अन्तःकरण में एक अलौकिक प्रसाद, एक दिव्य शीतलता और आत्मानन्द का उदय होता है- यही सोम है।
अद्वैतवेदान्त में ब्रह्म को “सच्चिदानन्दस्वरूप” कहा गया है। यह आनन्द इन्द्रियजन्य सुख नहीं, अपितु आत्मा की स्वाभाविक पूर्णता है। जब मन विषयासक्ति से मुक्त होकर आत्मा में स्थित होता है, तब भीतर का सोम अर्थात् आनन्दरूप अमृत प्रवाहित होने लगता है। यही कारण है कि उपनिषद् बार-बार कहती हैं- “रसो वै सः।” वह परमात्मा ही परम रस है।
इस मन्त्र का अन्तिम चरण- “तत्र सञ्जायते मनः” विशेष रूप से गम्भीर है। सामान्यतः मन जन्म से प्राप्त माना जाता है, परन्तु यहाँ उपनिषद् कहती है कि वास्तविक मन तो तब उत्पन्न होता है, जब साधना द्वारा अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। यहाँ “मनः” से अभिप्राय उस दिव्य, सात्त्विक, अन्तर्मुख और ब्रह्माभिमुख चित्त से है, जो आत्मसाक्षात्कार का पात्र बनता है।
अविद्याग्रस्त, विषयों में प्रवृत्त, राग-द्वेष से मलिन मन वस्तुतः मन नहीं, अपितु चञ्चल वृत्तियों का समूह है। उपनिषद् जिस “मन” की बात करती है, वह समाधिस्थ, निर्मल और आत्मदर्शी चेतना है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत में आत्मा तो सदा सिद्ध है, परन्तु अज्ञान से आच्छादित होने के कारण उसका अनुभव नहीं हो पाता। जब चित्त शुद्ध होता है, तब वही मन ब्रह्मदर्शन का साधन बनता है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
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#भगवत्पादाचार्य
भारत के गौरव का एक और स्वर्णिम क्षण !
स्लोवाकिया के राष्ट्रपति महामहिम पीटर पेलेग्रिनी द्वारा भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को “द ऑर्डर ऑफ द व्हाइट डबल क्रॉस” प्रथम श्रेणी से सम्मानित किया जाना सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए अत्यंत गौरव, आनंद और अभिमान का विषय है।
यशस्वी प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी ने इस सम्मान को अपने लिए व्यक्तिगत उपलब्धि न मानकर भारत के 140 करोड़ देशवासियों को समर्पित किया है। यह उनकी विनम्रता, राष्ट्रनिष्ठा और जनसेवा के प्रति अटूट समर्पण का अद्भुत उदाहरण है।
यह सम्मान केवल मात्र एक अलंकरण ही नहीं अपितु भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा, सशक्त कूटनीति, सांस्कृतिक गरिमा और विश्वबंधुत्व की भावना का प्रतीक है। प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत ने विश्व पटल पर मैत्री, विश्वास, सहयोग और शांति के नए सेतु निर्मित किए हैं।
स्लोवाकिया का यह सर्वोच्च सम्मान सम्माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को प्राप्त 33वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है, जो उनके दूरदर्शी नेतृत्व, वैश्विक स्वीकार्यता और भारत के प्रति विश्व समुदाय के बढ़ते सम्मान का प्रमाण है।
यह वास्तव में भारत के लिए एक और गौरवपूर्ण क्षण है।आदरणीय प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हार्दिक बधाई एवं अनंत
शुभकामनाएँ।
Heartiest congratulations to Hon’ble Prime Minister Shri Narendra Modi Ji on being conferred with Slovakia’s highest honour, “The Order of the White Double Cross” First Class by H.E. President Peter Pellegrini.
By dedicating this honour to the 140 crore people of India, PM Modi Ji has once again reflected his humility, statesmanship and unwavering devotion to the nation. This honour is a shining testimony to India’s rising global stature and the world’s growing respect for India’s leadership.
@narendramodi@PMOIndia@PellegriniP_ #वंदेमातरम्
।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्विश्लोक
एतु पथ्येव सूरेः।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये
धामानि दिव्यानि तस्थुः ।।५।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह मन्त्र वैदिक अध्यात्म की उस महान् पुकार का उद्घोष है, जो समस्त मानवता को बाह्य सीमाओं से ऊपर उठाकर अमृतस्वरूप आत्मा की ओर आमन्त्रित करती है। यह केवल ऋषियों का वैदिक स्तवन नहीं, अपितु आत्मविद्या का सार्वभौम निमन्त्रण है। भगवद्पादाचार्य भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत-वेदान्त की दृष्टि से यह मन्त्र जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराता है कि वह नश्वर देह, मन और बुद्धि तक सीमित नहीं, बल्कि अमृत, शाश्वत और ब्रह्मस्वरूप है।
मन्त्र का प्रारम्भ - “युजे वां ब्रह्म पूर्व्यम्” अत्यन्त गम्भीर आध्यात्मिक संकेत देता है। “पूर्व्यं ब्रह्म” अर्थात्, आदि, सनातन, अनादि सत्य वह ब्रह्म जो सृष्टि के पूर्व भी था, सृष्टि में भी है और प्रलय के पश्चात् भी अविचल रहता है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव के अनुसार ब्रह्म कोई उत्पन्न वस्तु नहीं, न ही परिवर्तनशील सत्ता; वह नित्य, स्वयंप्रकाश, सर्वव्यापक चैतन्य है। “युजे” का अर्थ यहाँ है - उसमें अपने चित्त को नियोजित करना, आत्मभाव से उससे संयुक्त होना। यही उपनिषदों का योग है; चित्त का ब्रह्म में अवस्थान।
“नमोभिः” यह पद साधना के अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्व को उद्घाटित करता है। अद्वैत वेदान्त में ज्ञान सर्वोपरि है, किन्तु ज्ञान का उदय अहंकारयुक्त चित्त में नहीं होता। नम्रता, श्रद्धा और समर्पण ज्ञान की भूमि को उर्वर बनाते हैं। “नमः” का वास्तविक अर्थ केवल शारीरिक प्रणाम नहीं, बल्कि अहंकार का विसर्जन है। जब तक “मैं” की कठोरता बनी रहती है, तब तक ब्रह्म का अखण्ड अनुभव सम्भव नहीं। भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य बार-बार कहते हैं कि आत्मविद्या विनय, गुरु-भक्ति और अन्तःकरण-शुद्धि से ही फलवती होती है। अतः यहाँ “नमोभिः” आत्मसमर्पण का प्रतीक है।
“विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः” यहाँ उपनिषद् उस दिव्य मार्ग की चर्चा करती है, जिस पर सूर्य की भाँति प्रकाशमान चेतना अग्रसर होती है। “सूरेः पथ” केवल आकाश में सूर्य की गति नहीं, बल्कि ज्ञान का पथ है। जैसे सूर्य अन्धकार का नाश करता है, वैसे ही आत्मज्ञान अविद्या का विनाश करता है। शाङ्करवेदान्त के अनुसार अविद्या ही संसारबन्धन का मूल कारण है। जीव अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूलकर देह, मन, इन्द्रिय और अहंकार से स्वयं को अभिन्न मान बैठता है। यही अध्यास संसार है। जब ज्ञानरूप सूर्य उदित होता है, तब यह मिथ्या अन्धकार स्वयं विलीन हो जाता है।
मन्त्र का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं सार्वभौम उद्घोष है - “शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः”
यह केवल काव्यमय सम्बोधन नहीं; यह उपनिषदों की विश्वमानवता का दिव्य उद्घोष है। यहाँ ऋषि सम्पूर्ण जगत् को सम्बोधित करते हुए कहते हैं - हे अमृत पुत्रो ! सुनो ! भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य की अद्वैतदृष्टि में प्रत्येक जीव मूलतः ब्रह्मस्वरूप है। जीव का वास्तविक स्वरूप जन्म-मरण से रहित, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा है। संसार में दुःख इसलिए प्रतीत होता है क्योंकि जीव स्वयं को सीमित मानता है। उपनिषद् इस विस्मृति को तोड़ती है और कहती है- आप नश्वर नहीं, अमृतस्वरूप हो।
“अमृतस्य पुत्राः” यहाँ “अमृत” ब्रह्म का द्योतक है। ब्रह्म ही अमृत है - जो काल से परे है, परिवर्तन से रहित है, और जिसका कभी विनाश नहीं होता। जीव उसी अमृत ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। अद्वैत वेदान्त का सम्पूर्ण दर्शन इसी एक वाक्य में सिमट आता है - जीव और ब्रह्म भिन्न नहीं। अज्ञानवश जीव स्वयं को सीमित अनुभव करता है; ज्ञान से वही अपनी अमृतता को पहचान लेता है।
इसके पश्चात् मन्त्र कहता है- “आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः” हे वे दिव्य धामों में स्थित महान् साधको ! आप भी सुनो। यहाँ “दिव्य धाम” केवल किसी लोकविशेष का संकेत नहीं; यह चेतना की उच्च अवस्थाओं का प्रतीक भी है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार समस्त लोक, देवता और दिव्य अवस्थाएँ भी अन्ततः ब्रह्म में अधिष्ठित हैं। ब्रह्म ही सबका आधार है। अतः उपनिषद् की यह पुकार केवल मनुष्यों के लिए नहीं, सम्पूर्ण चेतन सत्ता के लिए है।
यह मन्त्र एक अद्भुत आध्यात्मिक समन्वय प्रस्तुत करता है- ज्ञान, भक्ति, नम्रता, ध्यान और सार्वभौमिक आत्मबोध का। यहाँ वेदान्त किसी संकीर्ण सम्प्रदाय की शिक्षा नहीं देता; वह सम्पूर्ण अस्तित्व को एकात्म दृष्टि से देखता है। उपनिषद् कहती है- आप सब उसी अमृत सत्य की संतान हो; अतः विभाजन, भय, द्वेष और अज्ञान से ऊपर उठो।
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#भगवत्पादाचार्य
क्या आप जानते हैं? आयकर से छूट की सीमा छह गुना बढ़ गई है। 2013-14 में ₹2 लाख तक की आय tax-free थी। आज यह सीमा बढ़कर ₹12 लाख हो गई है। यह भारत के मध्यम वर्ग को मिली सबसे महत्वपूर्ण tax relief पहलों में से एक है, जिससे लाखों परिवारों को बड़ी राहत मिली है।
#12YearsOfSakshamMiddleClass
।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्यतो धिया दिवम्।
बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ।।३।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीय अध्याय)
मन और बुद्धि का संयम : साधना का प्रथम सोपान ! अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक संकेतों से युक्त है। शाङ्करवेदान्त की दृष्टि से यह केवल वैदिक कर्म या देवोपासना का विधान नहीं, अपितु अंततः ब्रह्मविद्या की ओर उन्मुख साधना-मार्ग का दिग्दर्शन करता है।
भवदपादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के भाष्य के अनुरूप, “युक्त्वा मनसा” का तात्पर्य है-मन को संयमित, एकाग्र और अंतर्मुख करना। चञ्चल, विषयासक्त और विक्षिप्त मन न तो देवताओं का यथार्थ ध्यान कर सकता है, न ही आत्मतत्त्व का साक्षात्कार। अतः साधक का प्रथम प्रयास मन को विषयों से हटाकर तत्त्व की ओर लगाना है।
यहाँ “देवान्” शब्द केवल बाह्य देवताओं तक सीमित नहीं है; भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य इसे इन्द्रिय-शक्तियों अथवा चेतना के विभिन्न प्रकाश-आयामों के रूप में भी ग्रहण करते हैं। जब साधक अपने मन को संयमित कर इन्द्रियों को एकाग्र करता है, तब वह बिखरी हुई चेतना को एक केन्द्र में स्थापित करता है - यही उपासना का वास्तविक आरम्भ है।
धिया दिवम् - बुद्धि का उत्कर्ष और ब्रह्मबोध की दिशा ! “सुवर्यतो धिया दिवम्” यहाँ “धिया” (बुद्धि) का विशेष महत्व है। शंकरभाष्य में बुद्धि को वह माध्यम माना गया है, जिसके द्वारा आत्मा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट होता है। “दिवम्” का अर्थ केवल स्वर्ग नहीं, बल्कि प्रकाशस्वरूप चेतना का उच्चतम स्तर है। अतः यह वाक्य इंगित करता है कि साधक को केवल मन के संयम पर ही नहीं रुकना चाहिए, बल्कि अपनी बुद्धि को भी सूक्ष्म, निर्मल और विवेकयुक्त बनाना चाहिए। यही “विवेक” (नित्य-अनित्य-वस्तु-विवेक) शाङ्करवेदान्त की साधना का मूलाधार है। बुद्धि जब शुद्ध होती है, तब वह ब्रह्म के प्रकाश को धारण करने योग्य बनती है।
बृहज्ज्योतिः ब्रह्म का परम प्रकाश ! बृहज्ज्योतिः करिष्यतः” यहाँ “बृहज्ज्योति” से अभिप्राय है वह अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश ब्रह्म, जो समस्त ज्योतियों का भी ज्योति है। यह वही तत्त्व है जिसे उपनिषद् अन्यत्र “ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः” कहकर निरूपित करते हैं। भगवत्पाद भगवान आद्य शंकराचार्य के अनुसार, यह “बृहज्ज्योति” कोई बाह्य प्रकाश नहीं, अपितु आत्मस्वरूप चैतन्य है-जो सदा प्रकाशित है, किन्तु अज्ञान के कारण अप्रत्यक्ष प्रतीत होता है। साधक का लक्ष्य इसी आत्मज्योति का साक्षात्कार करना है।
सविता- प्रेरक शक्ति के रूप में ईश्वर !
“सविता प्रसुवाति तान्” यहाँ “सविता” (सूर्य) को भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य केवल भौतिक सूर्य तक सीमित नहीं करते, बल्कि उसे उस परम चेतन सत्ता का प्रतीक मानते हैं, जो समस्त साधना को प्रेरित और सम्पन्न कराती है। यह “सविता” ईश्वर का वह रूप है जो साधक के अंतःकरण को शुद्ध करता है, उसे साधना में प्रवृत्त करता है और अन्ततः ब्रह्मज्ञान की ओर अग्रसर करता है। अद्वैत वेदान्त में, यद्यपि ब्रह्म निराकार और निर्गुण है, तथापि उपासना के स्तर पर यही ईश्वर (ईश्वर-तत्त्व) साधक का मार्गदर्शक बनता है।
शाङ्करवेदान्तीय समन्वय : उपासना से ज्ञान की ओर ! इस मंत्र का गूढ़ संदेश यह है कि
प्रारम्भ में साधक मन और इन्द्रियों को संयमित करता है तत्पश्चात बुद्धि को शुद्ध और विवेकयुक्त बनाता है; फिर ईश्वर-प्रेरणा से ब्रह्मप्रकाश की ओर अग्रसर होता है और अंततः बृहज्ज्योति आत्मस्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार करता है
भगवत्पाद भाष्यकार आदि शंकराचार्य के अनुसार, उपासना (देव-चिन्तन) और ज्ञान (ब्रह्मबोध) परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि साधना के क्रमिक सोपान हैं। यह मंत्र उसी क्रम का संकेत देता है- जहाँ देवोपासना अन्ततः आत्मज्ञान में परिणत होती है।
इस प्रकार, यह मंत्र साधक को एक समग्र साधना-पथ प्रदान करता है। मन के संयम से प्रारम्भ होकर बुद्धि की शुद्धि, ईश्वर की प्रेरणा और अन्ततः ब्रह्मसाक्षात्कार तक।
शाङ्करवेदान्त की दृष्टि में यह सम्पूर्ण प्रक्रिया बाह्य से आन्तरिक, उपासना से ज्ञान, और अनेकता से अद्वैत की ओर यात्रा है। जब साधक “बृहज्ज्योति” अपने ही आत्मस्वरूप को पहचान लेता है, तब वह समस्त बन्धनों से मुक्त होकर परम शान्ति और आनन्द को प्राप्त करता है।
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।
अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ।।१।।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् – द्वितीयोऽध्यायः)
यह मन्त्र साधना, ध्यानयोग और आत्मविद्या के सम्पूर्ण पथ का उद्घाटन करता है। यदि प्रथम अध्याय में उपनिषद् ने ब्रह्मतत्त्व की जिज्ञासा और उसके स्वरूप का विवेचन किया है, तो द्वितीय अध्याय में वह साधक को उस दिव्य अनुभूति तक पहुँचने की साधना-पद्धति का निर्देश देता है। यह मन्त्र वस्तुतः वेदान्त और योग के अद्भुत समन्वय का उद्घोष है।
“युञ्जानः प्रथमं मनः” यह वाक्यांश सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का आधार है। ‘युञ्जानः’ धातु ‘युज्’ से बना है, जिसका अर्थ है- जोड़ना, नियोजित करना, संयमित करना और परम लक्ष्य में स्थापित करना। यही धातु आगे चलकर ‘योग’ शब्द का आधार बनती है। अतः उपनिषद् कहता है कि साधना का प्रथम चरण बाह्य जगत् का परित्याग नहीं, अपितु मन का संयमन है।
मन ही बन्धन का कारण है और मन ही मोक्ष का साधन। अमृतबिन्दू उपनिषद् का प्रसिद्ध वचन है- “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
विषयों में आसक्त मन बन्धन का कारण बनता है और आत्मा में प्रतिष्ठित मन मुक्ति का द्वार खोल देता है। इसलिए साधक को सर्वप्रथम अपने मन को चञ्चलता, विषयासक्ति, राग-द्वेष, भय, कामना और अहंकार से मुक्त करना पड़ता है। जिस प्रकार अशान्त जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब स्पष्ट नहीं दिखता, उसी प्रकार विक्षिप्त चित्त में आत्मतत्त्व का प्रकाश प्रतिबिम्बित नहीं हो सकता।
“तत्त्वाय” यह पद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मन को एकाग्र करना ही पर्याप्त नहीं; वह किस लक्ष्य के लिए एकाग्र किया जा रहा है, यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। संसार में चोर भी एकाग्र होता है, वैज्ञानिक भी एकाग्र होता है और कलाकार भी। परन्तु उपनिषद् जिस एकाग्रता की बात करता है, उसका लक्ष्य परम तत्त्व है- वह सत्य जो त्रिकालाबाधित, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है।
वेदान्त की दृष्टि में तत्त्व का अर्थ है- वह जो वास्तव में है। उपनिषद् साधक को असत्य से सत्य की ओर, अनित्य से नित्य की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाना चाहता है - "असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय।"
अतः मन का संयम तभी सार्थक है, जब वह आत्मबोध और ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए हो।
“सविता धियः” यहाँ ‘सविता’ केवल दृश्य सूर्य नहीं, अपितु समस्त चेतना का दिव्य प्रेरक है। ऋग्वेद के गायत्री मन्त्र में भी यही भाव व्यक्त हुआ है- “तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।।”
सविता वह परम चेतन सत्ता है, जो बुद्धि को प्रेरित करती है, विवेक को जाग्रत करती है और अन्तःकरण को सत्य की ओर उन्मुख करती है। मनुष्य का पुरुषार्थ आवश्यक है, किन्तु ईश्वरीय अनुग्रह के बिना अन्तिम जागरण सम्भव नहीं। आत्मविद्या में साधना और कृपा दोनों का समन्वय अनिवार्य है।
“अग्नेर्ज्योतिर्निचाय्य” यहाँ अग्नि बाह्य अग्नि नहीं, अपितु ज्ञानाग्नि है। भगवद्गीता में भगवान कहते हैं- "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।"
ज्ञानरूपी अग्नि अविद्या, संशय और कर्मबन्धन को दग्ध कर देती है। ‘निचाय्य’ का अर्थ है- भलीभाँति समझकर, पहचानकर, अनुभवपूर्वक ग्रहण करना। केवल शास्त्र पढ़ लेने से ज्ञान नहीं होता; ज्ञान तब होता है जब साधक उस ज्योति को अपने अन्तःकरण में अनुभव करता है।
यह अग्निज्योति विवेक की ज्योति है, जो नित्य और अनित्य में भेद करना सिखाती है। यही आत्मप्रकाश है, जिसके उदय होते ही अज्ञानरूपी रात्रि समाप्त हो जाती है। मुण्डकोपनिषद् कहता है- “भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।”
ज्ञान-ज्योति के उदय से हृदय की गाँठें खुल जाती हैं और संशय समाप्त हो जाते हैं।
“पृथिव्या अध्याभरत्” यह पद अत्यन्त गूढ़ है। पृथ्वी स्थूलता, जड़ता और भौतिक चेतना का प्रतीक है। साधक जब केवल शरीर, इन्द्रियों और विषयों तक सीमित रहता है, तब उसकी चेतना पृथ्वी-तत्त्व में बँधी रहती है। किन्तु जब वह ध्यान, विवेक और आत्मचिन्तन के द्वारा चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है, तब वह स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण और कारण से परब्रह्म की ओर आरोहण करता है। योगशास्त्र इसे चित्तवृत्ति-निरोध कहता है, वेदान्त इसे आत्मविचार कहता है और उपनिषद् इसे तत्त्वाभिमुखता कहता है। नाम भिन्न हो सकते हैं, पर लक्ष्य एक ही है - आत्मस्वरूप की अनुभूति।
भगवत्पादाचार्य श्रीआदि शंकराचार्य के भाष्य-भाव के अनुसार ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे नया प्राप्त करना हो। वह तो नित्यसिद्ध है। अज्ञान केवल उसके प्रकाश को ढँक देता है। इसलिए साधना का प्रयोजन ब्रह्म को उत्पन्न करना नहीं, अपितु अन्तःकरण को इतना शुद्ध बनाना है कि उसमें नित्य विद्यमान आत्मप्रकाश प्रतिबिम्बित हो सके।
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नारी त्रैलोक्यजननी
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नारी त्रिभुवनाधारा
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् ।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत् परम् ।।१६।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोध्याय:)
उपनिषद् का यह मंत्र आत्मतत्त्व की सर्वव्यापकता तथा उसके अनुभव की साधना-पद्धति का अत्यन्त गूढ़ निरूपण करता है। भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत-वेदान्त के आलोक में यह मंत्र स्पष्ट करता है कि आत्मा सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी सामान्य दृष्टि से प्रत्यक्ष नहीं होती, क्योंकि वह अविद्या के आवरण से आवृत प्रतीत होती है।
उपनिषद् यहाँ एक अत्यन्त सुन्दर दृष्टान्त प्रस्तुत करता है, जैसे - दूध में घी निहित रहता है, परन्तु वह प्रत्यक्ष नहीं दिखता; उसे प्राप्त करने के लिए मंथन और संस्कार की प्रक्रिया आवश्यक होती है। उसी प्रकार सर्वव्यापी आत्मा प्रत्येक जीव और समस्त जगत् में व्याप्त होते हुए भी साधारण दृष्टि से अनुभव में नहीं आती। जब साधक आत्मविद्या और तप के द्वारा अन्तःकरण को शुद्ध करता है, तब वही निहित ब्रह्मस्वरूप प्रकट हो उठता है।
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के भाष्य की भावना के अनुसार, यहाँ ‘आत्मविद्या’ का तात्पर्य उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित उस ज्ञान से है, जो जीव और ब्रह्म की अभिन्नता का बोध कराता है। यह ज्ञान प्रस्थानत्रयी उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र तीनों का सार है। छान्दोग्य उपनिषद् का महावाक्य “तत्त्वमसि” तथा बृहदारण्यक का “अहं ब्रह्मास्मि” इसी सत्य की उद्घोषणा करते हैं कि आत्मा ही ब्रह्म है।
श्रीमद्भगवद्गीता भी इसी तत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहती है कि “सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि” - ज्ञानी पुरुष समस्त प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में समस्त प्राणियों को देखता है। इसी प्रकार ब्रह्मसूत्र यह प्रतिपादन करते हैं कि ब्रह्म सर्वव्यापक और सर्वाधार तत्त्व है, जिसका ज्ञान ही मोक्ष का कारण है।
अतः इस मंत्र का सार यह है कि सर्वव्याप्त ब्रह्म प्रत्येक जीव में अन्तर्निहित है, किन्तु उसका अनुभव तभी सम्भव है, जब साधक आत्मविद्या और तप के द्वारा अपने अन्तःकरण को निर्मल करता है। जिस प्रकार दूध से मंथन द्वारा घी प्रकट होता है, उसी प्रकार ज्ञान और साधना के द्वारा आत्मा का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।
इस प्रकार यह उपनिषद् का मंत्र साधक को स्मरण कराता है कि ब्रह्म कहीं दूर स्थित कोई सत्ता नहीं, बल्कि प्रत्येक हृदय में निहित वह परम सत्य है, जिसका साक्षात्कार आत्मज्ञान और तप के माध्यम से ही सम्भव है; यही उपनिषदों का परम सन्देश है।
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्माऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसायोऽनुपश्यति ।।१५।।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह मंत्र वेदान्त के उस परम रहस्य का उद्घाटन करता है, जिसके अनुसार आत्मा कोई बाह्य पदार्थ, नवीन उपलब्धि अथवा भविष्य में प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है, अपितु वह मनुष्य के स्वयं के अस्तित्व का नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप है। उपनिषद् यहाँ आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया को अत्यन्त सरल किन्तु अत्यन्त गहन दृष्टान्तों के माध्यम से स्पष्ट करता है। यह मंत्र बताता है कि आत्मज्ञान किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि उस सत्य का अनावरण है जो सदैव विद्यमान होते हुए भी अज्ञान के कारण अप्रकट बना रहता है।
उपनिषद् कहता है कि जैसे तिलों के भीतर तैल स्वभावतः विद्यमान रहता है, किन्तु वह प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता। उचित विधि से मर्दन और निष्पेषण करने पर वही तैल प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार दधि के भीतर सर्पि अर्थात् घृत निहित रहता है, परन्तु मन्थन के बिना वह दृष्टिगोचर नहीं होता। जैसे पर्वतीय स्रोतों और भूमिगत धाराओं में जल विद्यमान रहता है, परन्तु उसे खोजने और उचित मार्ग देने पर ही वह प्रवाहित होता है; और जैसे अरणिकाष्ठ में अग्नि निहित रहती है, किन्तु मन्थन के बिना उसकी ज्वाला प्रकट नहीं होती- वैसे ही आत्मा भी प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में नित्य विद्यमान है, परन्तु अज्ञान, अविवेक और वासनाओं के आवरण के कारण उसका स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं हो पाता।
भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस मंत्र के भाष्य में स्पष्ट संकेत करते हैं कि आत्मा कभी उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि जो वस्तु उत्पन्न होती है वह विनाशशील भी होती है। आत्मा नित्य है, स्वयंसिद्ध है और स्वप्रकाश है। अज्ञान आत्मा का नाश नहीं करता, क्योंकि सत्य का कभी नाश नहीं हो सकता; अज्ञान केवल उसके प्रकाश को ढँक देता है। जिस प्रकार बादल सूर्य को नहीं मिटाते, केवल दृष्टि को आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार अविद्या आत्मा को नहीं मिटाती, केवल उसके अनुभव में बाधक बनती है।
मंत्र का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वाक्य है- “एवमात्माऽत्मनि गृह्यते”। यहाँ उपनिषद् यह घोषित करता है कि आत्मा का साक्षात्कार कहीं बाहर नहीं, स्वयं आत्मा में ही होता है। परमात्मा को किसी विशेष स्थान, दिशा अथवा बाह्य वस्तु में खोजने की आवश्यकता नहीं है। वह स्वयं साधक के हृदय में, उसके चैतन्य में, उसके अस्तित्व के मूल में सदा विद्यमान है। आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है; उसे नेत्र देख नहीं सकते, वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, मन पूर्णतः ग्रहण नहीं कर सकता। वह तो स्वयं उन सबका आधारभूत साक्षी है। इसलिए आत्मसाक्षात्कार का अर्थ है- दृश्य जगत्, देह, मन, बुद्धि और अहंकार से अपनी भिन्नता का विवेकपूर्वक अनुभव करना तथा उस शुद्ध साक्षी-चैतन्य में स्थित होना।
उपनिषद् आगे आत्मप्राप्ति का साधन भी बताता है- “सत्येन” और “तपसा”।
यहाँ ‘सत्य’ का अर्थ केवल वाणी की सत्यता नहीं है। शाङ्कर-वेदान्त के अनुसार सत्य वह है जो त्रिकालाबाधित हो- जो भूत, वर्तमान और भविष्य में कभी परिवर्तित न हो। ब्रह्म ही सत्य है, आत्मा ही सत्य है। अतः ‘सत्येन’ का तात्पर्य है- अपने जीवन को परम सत्य की दिशा में उन्मुख करना, अनित्य में आसक्ति का त्याग करना तथा नित्य आत्मतत्त्व में श्रद्धा और निष्ठा स्थापित करना। जब साधक संसार के क्षणभंगुर आकर्षणों से ऊपर उठकर सत्यस्वरूप आत्मा को अपने जीवन का केन्द्र बना लेता है, तभी उसके भी आत्मज्ञान की भूमि तैयार होती है।
‘तपस्’ का अर्थ भी केवल शारीरिक कष्ट या उपवास नहीं है। उपनिषद् के परिप्रेक्ष्य में तपस् का वास्तविक स्वरूप है- अन्तःकरण की शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, मन की एकाग्रता, वासनाओं का क्षय, आत्मचिन्तन, ध्यान तथा निरन्तर साधना। तपस् वह आन्तरिक अग्नि है जिसमें अहंकार, राग, द्वेष, मोह और अज्ञान क्रमशः भस्म होते जाते हैं। जब चित्त शुद्ध और निर्मल हो जाता है, तब उसमें आत्मज्ञान का प्रकाश उसी प्रकार प्रतिबिम्बित होता है जैसे स्वच्छ दर्पण में सूर्य का प्रकाश।
मंत्र का अन्तिम पद- “अनुपश्यति” अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ रखता है। उपनिषद् केवल ‘पश्यति’ नहीं कहता, बल्कि ‘अनुपश्यति’ कहता है, अर्थात् साधक उस सत्य का बारम्बार, निरन्तर और स्थिर भाव से दर्शन करता है। यह कोई क्षणिक अनुभव नहीं, बल्कि ऐसी आत्मनिष्ठा है, जिसमें ज्ञानी पुरुष निरन्तर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित रहता है। उसके लिए आत्मा कोई विचार नहीं रहती, बल्कि जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाती है।
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासादेवं पश्येन्निगूढवत् ।।१४।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
यह मंत्र उपनिषद्-साहित्य के उन विलक्षण मंत्रों में से है, जिनमें सम्पूर्ण साधना-पथ को एक अत्यन्त सरल, किन्तु अत्यन्त गहन रूपक के माध्यम से व्यक्त किया गया है। यह केवल ध्यान की कोई सामान्य विधि नहीं बताता, अपितु आत्मसाक्षात्कार की सम्पूर्ण प्रक्रिया का दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा अनुभूतिपरक रहस्य उद्घाटित करता है। भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य के भाष्य के आलोक में यह मंत्र साधक को बाह्य जगत् से हटाकर उसके अपने अन्तःकरण की ओर ले जाता है, जहाँ ब्रह्म का शाश्वत प्रकाश सदा से विद्यमान है, किन्तु अविद्या के आवरण के कारण अप्रकट प्रतीत होता है।
उपनिषद् यहाँ वैदिक यज्ञपरम्परा में प्रयुक्त अरणि-मंथन की प्रक्रिया का अत्यन्त सुन्दर रूपक प्रस्तुत करता है। प्राचीन काल में अग्नि उत्पन्न करने के लिए दो अरणियों का उपयोग किया जाता था। अधःस्थित अरणि आधार बनती थी और ऊर्ध्वस्थित अरणि को निरन्तर घर्षण द्वारा घुमाया जाता था। दीर्घ अभ्यास एवं सतत प्रयास से उसी घर्षण से अग्नि प्रकट होती थी। उपनिषद् कहता है कि आत्मज्ञान की प्राप्ति भी इसी प्रकार होती है। साधक अपने शरीर और अन्तःकरण को अधःअरणि के रूप में धारण करे तथा प्रणव अर्थात् “ॐ” को उत्तरारणि के रूप में स्थापित करे। तत्पश्चात् ध्यान, मनन, चिन्तन और आत्मविवेक रूपी मंथन के द्वारा उस परम सत्य को प्रकट करे, जो उसके भीतर ही गुप्त रूप से विद्यमान है।
भगवत्पादाचार्य इस मंत्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि आत्मा कोई उत्पन्न होने वाली वस्तु नहीं है। जिस प्रकार अग्नि वास्तव में अरणियों में पहले से ही सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहती है और मंथन के द्वारा केवल प्रकट होती है, उसी प्रकार आत्मा भी नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप से सदैव विद्यमान है। साधना का प्रयोजन आत्मा को उत्पन्न करना नहीं, बल्कि अज्ञानरूपी आवरण को हटाना है। ज्ञान किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति नहीं, प्रत्युत अपने वास्तविक स्वरूप की पुनः पहचान है।
इस मंत्र का विशेष महत्व इस तथ्य में निहित है कि यहाँ साधना का केन्द्र बाह्य कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि अन्तर्मुखता है। उपनिषद् यह संकेत करता है कि परम सत्य को बाह्य विषयों, इन्द्रियानुभवों अथवा लौकिक उपलब्धियों में खोजने का प्रयास अन्ततः व्यर्थ सिद्ध होता है। सत्य का निवास स्वयं साधक के अन्तःकरण में है। इसी कारण कहा गया - “स्वदेहमरणिं कृत्वा”। साधना का क्षेत्र कोई बाहरी स्थान नहीं, अपितु स्वयं का अन्तःकरण है; और साधना का उपकरण भी वही अन्तःकरण है।
यहाँ “प्रणव” अर्थात् “ॐ” को उत्तरारणि कहा गया है। समस्त उपनिषदों में प्रणव को ब्रह्म का प्रत्यक्ष वाचक माना गया है। माण्डूक्य उपनिषद् उद्घोष करता है - “ओंकार एवेदं सर्वम्” यह सम्पूर्ण विश्व ओंकारस्वरूप है। भगवत्पादाचार्य के अनुसार प्रणव का ध्यान वस्तुतः ब्रह्म के ध्यान से भिन्न नहीं है। प्रणव में सम्पूर्ण वेदों का सार निहित है। उसमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय - चारों अवस्थाओं का समन्वय है। अतः जब साधक श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता के साथ प्रणव का चिन्तन करता है, तब उसका चित्त क्रमशः बाह्य विषयों से निवृत्त होकर ब्रह्माकार वृत्ति को प्राप्त करता है।
मंत्र में प्रयुक्त “ध्याननिर्मथनाभ्यास” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। केवल एक बार का ध्यान या क्षणिक साधना आत्मसाक्षात्कार का कारण नहीं बनती। जिस प्रकार अग्नि उत्पन्न करने के लिए निरन्तर और धैर्यपूर्ण मंथन आवश्यक होता है, उसी प्रकार आत्मज्ञान के लिए भी अविरत अभ्यास आवश्यक है। योगशास्त्र में जिसे “अभ्यास” कहा गया है और वेदान्त में जिसे “निदिध्यासन” कहा गया है, वही यहाँ “ध्याननिर्मथन” के रूप में व्यक्त हुआ है। बार-बार आत्मतत्त्व का चिन्तन, बार-बार ब्रह्मभाव में स्थित होने का प्रयास, बार-बार मन को विषयों से हटाकर आत्मा में स्थिर करना - यही वह मंथन है जिससे ज्ञानाग्नि प्रज्वलित होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश भी इसी सत्य की पुष्टि करता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”
अर्थात्, इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कोई वस्तु नहीं है। परन्तु यह ज्ञान केवल बौद्धिक सूचना नहीं है; यह ध्यान, साधना, अन्तर्मुखता और आत्मानुभूति से प्रकाशित होने वाला सत्य है। इसी कारण गीता के छठे अध्याय में योगी को अपने मन को बार-बार आत्मा में स्थिर करने का निर्देश दिया गया है।
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।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
वह्नेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिर्न दृश्यते नैव च लिङ्गनाशः।
स भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ।।१३।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
यह मंत्र वेदान्त के अत्यन्त गूढ़ किन्तु अत्यन्त सुगम सत्य का उद्घाटन करता है। उपनिषद् यहाँ एक ऐसे दृष्टान्त का आश्रय लेता है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति सहज रूप से समझ सकता है। जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि विद्यमान रहती है, किन्तु सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार आत्मा भी प्रत्येक जीव के भीतर नित्य उपस्थित होकर भी अज्ञान के कारण अप्रकट प्रतीत होती है। यह मंत्र साधक को यह समझाने का प्रयास करता है कि आत्मसाक्षात्कार किसी नये तत्त्व की प्राप्ति नहीं, अपितु अपने ही नित्यस्वरूप की पहचान है।
भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के भाष्य के आलोक में इस मंत्र का रहस्य और अधिक स्पष्ट हो जाता है। वे बताते हैं कि आत्मा न तो उत्पन्न होती है, न नष्ट होती है, न परिवर्तित होती है। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप है। उसका अस्तित्व किसी प्रमाण का मोहताज नहीं है, क्योंकि वह स्वयं समस्त प्रमाणों का आधार है। फिर भी मनुष्य उसे नहीं जान पाता, क्योंकि उसका चित्त नाम-रूपात्मक जगत् में इतना उलझा रहता है कि आत्मा का स्वप्रकाश स्वरूप आवरणों के पीछे छिप जाता है।
मंत्र में अग्नि का उदाहरण अत्यन्त सारगर्भित है। लकड़ी में अग्नि विद्यमान है, परन्तु जब तक उचित विधि से मन्थन नहीं किया जाता, तब तक वह प्रकट नहीं होती। इसका अर्थ यह नहीं कि मन्थन से अग्नि उत्पन्न होती है; वास्तव में मन्थन केवल उस अप्रकट अग्नि को व्यक्त करता है जो पहले से ही वहाँ विद्यमान थी। इसी प्रकार आत्मज्ञान भी आत्मा को उत्पन्न नहीं करता; वह केवल अज्ञानरूपी आवरण को हटाता है। आत्मा पहले भी थी, ज्ञान के बाद भी वही रहती है। परिवर्तन केवल साधक की दृष्टि में होता है, आत्मा में नहीं।
उपनिषद् आगे कहता है - “तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे”। अर्थात्, जिस प्रकार अग्नि और काष्ठ का सम्बन्ध है, उसी प्रकार देह में स्थित आत्मतत्त्व का साक्षात्कार प्रणव अर्थात् “ॐ” के माध्यम से किया जा सकता है। यहाँ प्रणव मात्र उच्चारण करने योग्य ध्वनि नहीं है। वह सम्पूर्ण वेदों का सार, ब्रह्म का वाचक तथा आत्मबोध का दिव्य प्रतीक है। समस्त उपनिषदों में प्रणव को परम साधन के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
माण्डूक्योपनिषद् तो सम्पूर्ण रूप से प्रणव के रहस्य का ही प्रतिपादन करती है। वहाँ “ॐ” को सम्पूर्ण विश्व और उसके अधिष्ठान ब्रह्म का प्रतीक बताया गया है। अकार, उकार और मकार जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं के द्योतक हैं, जबकि इन तीनों से परे स्थित अमात्र तुरीय ही आत्मा का परम स्वरूप है। अतः प्रणव का ध्यान साधक को बाह्य जगत् की विविधताओं से उठाकर उस अद्वैत सत्य की ओर ले जाता है जहाँ समस्त भेद समाप्त हो जाते हैं।
भगवद्गीता भी इसी सत्य की पुष्टि करती है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चित्त को स्थिर कर आत्मा में स्थित किया जा सकता है। जब मन विषयों की ओर भागना छोड़ देता है और अन्तर्मुख होकर अपने स्रोत की ओर लौटता है, तब आत्मस्वरूप का प्रकाश स्वतः प्रकट होने लगता है। यह कोई रहस्यमय उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने वास्तविक अस्तित्व की पहचान है।
ब्रह्मसूत्र भी यही प्रतिपादित करते हैं कि मोक्ष का साधन ज्ञान है। बन्धन का कारण अज्ञान है और अज्ञान की निवृत्ति का साधन आत्मविद्या। जब अज्ञान का नाश होता है, तब आत्मा का प्रकाश उसी प्रकार प्रकट हो जाता है जैसे बादलों के हट जाने पर सूर्य का प्रकाश स्वतः दिखाई देने लगता है। सूर्य नया उत्पन्न नहीं होता; केवल आवरण हटता है। यही स्थिति आत्मज्ञान की है।
इस मंत्र का एक और सूक्ष्म संकेत यह है कि साधना का उद्देश्य किसी दूरस्थ सत्य की खोज नहीं, बल्कि अपने ही अन्तःकरण में स्थित दिव्यता का उद्घाटन है। मनुष्य प्रायः ईश्वर को बाहर खोजता है, जबकि उपनिषद् उसे भीतर देखने की प्रेरणा देता है। जिस सत्य की तलाश समस्त दिशाओं में की जाती है, वह स्वयं साधक के हृदयगुहा में विराजमान है। आवश्यकता केवल उचित साधना, एकाग्रता, विवेक और आत्मचिन्तन की है।
अतः यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि आत्मा कोई प्राप्त की जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि हमारी स्वयं की नित्य सत्ता है। जैसे लकड़ी में अग्नि छिपी रहती है और मन्थन से प्रकट होती है, वैसे ही आत्मा प्रत्येक जीव में सदा विद्यमान है और प्रणव-उपासना, आत्मविचार तथा ज्ञान के द्वारा उसका प्रकाश अनुभव में आता है। जब यह अनुभव घटित होता है, तब साधक जान लेता है कि जिस सत्य को वह बाहर खोज रहा था, वह तो सदैव उसके भीतर ही प्रकाशित था।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं
नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् ।
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा
सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ।।१२।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोऽध्यायः)
यह मंत्र उपनिषद् के प्रथम अध्याय का सिद्धान्त-वाक्य है। भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य की दृष्टि में “एतत् ज्ञेयम्” का आशय है - वह तत्त्व जो नित्य, आत्मा में ही प्रतिष्ठित (आत्मसंस्थ) और स्वप्रकाश है। इसलिए उपनिषद् दृढ़ता से कहता है - “नातः परं वेदितव्यं किञ्चित्”: इससे आगे जानने योग्य कुछ नहीं; क्योंकि जो जानने वाले (प्रमाता) का भी अधिष्ठान है, उससे परे कोई विषय शेष नहीं रहता। यह वाक्य ज्ञान की पराकाष्ठा नहीं, अविद्या का अन्त घोषित करता है।
फिर मंत्र व्यवहार-क्षेत्र का त्रिविध भेद दिखाता है - भोक्ता (जीव), भोग्य (जगत्/प्रकृति) और प्रेरिता (ईश्वर)। भगवत्पाद भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यह त्रिविधता व्यवहार-सत्य में उपयोगी है: देह-मन से तादात्म्य के कारण जीव “भोक्ता” बनता है; प्रकृति-प्रपंच “भोग्य” बनता है; और वही एक परम तत्त्व माया-उपाधि से सम्बद्ध होकर “प्रेरिता/नियन्ता” के रूप में प्रतीत होता है। पर उपनिषद् का अन्तिम निष्कर्ष यह है - “त्रिविधं ब्रह्म एतत्”: ये तीनों अन्ततः ब्रह्म से भिन्न नहीं - भेद उपाधि-कल्पित है, अधिष्ठान एकमेव अद्वितीय ब्रह्म है।
यही प्रस्थानत्रयी का मर्म है : उपनिषद् आत्मा को नित्य-साक्षी बताकर विषय-जगत् को अनित्य ठहराते हैं; गीता कर्तृत्व-भोक्तृत्व को गुणों पर रखकर आत्मा को असंग घोषित करती है; और ब्रह्मसूत्र समस्त भेदों का अपवाद कर ब्रह्म की एकरसता सिद्ध करते हैं। इस मंत्र की शिक्षा साधक को सीधी राह पर ले जाती है - भोक्ता-भाव की भ्रान्ति का त्याग, प्रेरिता में चित्त-समर्पण, और अन्ततः ब्रह्मात्मैक्य-बोध: यही वह ज्ञान है जिसके बाद “कुछ और” जानना शेष नहीं रहता।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः
क्षरात्मानावीशते देव एकः ।
तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्व-
भावात् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ।।१०।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - प्रथमोऽध्यायः)
श्वेताश्वतर उपनिषद् के अनुसार भाष्य-परम्परा में “शाङ्कर-श्रेय” का निर्णय विद्वानों में मतभेद का विषय रहा है; पर शाङ्कर-अद्वैत के सिद्धान्त-सूत्र (उपनिषद्–गीता–ब्रह्मसूत्र) के आलोक में इस मंत्र का अर्थ अत्यन्त स्पष्ट और सुसंगत रूप से खुलता है।
क्षर-अक्षर” का विवेक और मोक्ष की दिशा !
यह मंत्र एक ही श्वास में जगत् के कारण-प्रपंच और मोक्ष के उपाय दोनों को कह देता है। उपनिषद् पहले दृश्य-सृष्टि को “क्षर” कहकर अनित्य घोषित करता है, फिर चेतना-तत्त्व को “अक्षर” कहकर अविनाशी ठहराता है, और अन्ततः दोनों पर एक देव की अधिष्ठान-शक्ति स्थापित करता है ताकि साधक का मन कारण-जाल में उलझने के बजाय एक तत्त्व पर स्थिर हो सके।
क्षरं प्रधानम् -परिवर्तनशील “प्रधान/प्रकृति” (त्रिगुणात्मक उपादान-कारण)
अमृत-अक्षरं हरः अक्षर” अमृतस्वरूप तत्त्व, जो नाशरहित है; “हरः” यहाँ परम नियन्ता/ईश्वर का बोधक भी माना जाता है
क्षरात्मानम् आवीशते देव एकः - एक ही देव/ईश्वर क्षर-प्रकृति में प्रवेश करके उसे नियमबद्ध, संचालित करता है -
"तस्य अभिध्यानात् योजनात् तत्त्वभावात्"
(1) उसी का ध्यान, (2) चित्त का उसी में संयोजन, (3) तत्त्व का यथार्थ-बोध/अवस्थान
अन्ते विश्वमाया-निवृत्तिः अन्त में “विश्व-माया” का निवारण: जगत् का ज्ञानात्मक भ्रान्ति-आवरण हट जाना।
यहाँ उपनिषद् मानो कहता है कि प्रकृति को समझो, पर प्रकृति पर अटक मत जाओ; उस एक देव में मन को बाँधो, और तत्त्व-बोध से माया का बन्धन काटो।
“क्षरं प्रधानम्” प्रकृति की सत्ता: कारण है, सत्य नहीं !
शाङ्कर-अद्वैत के अनुसार “प्रधान/प्रकृति” का स्वीकार व्यवहार के स्तर पर है, क्योंकि जगत् में गुण, परिवर्तन, कारण-कार्य-श्रृंखला और नियम-व्यवस्था अनुभव में आते हैं। पर उपनिषद् इसे "क्षर" कहकर सावधान करता है - जो परिवर्तनशील है, वह परम सत्य नहीं हो सकता। जो गुणों से बना है, वह गुणातीत आत्मा का स्वरूप नहीं। अर्थात्, प्रकृति व्यवहार का कारण है, पर मोक्ष का आधार नहीं। मोक्ष का आधार वही है, जो क्षर नहीं अक्षर है ।
“अमृताक्षरं” - अक्षर का अर्थ : साक्षी-चैतन्य, अविनाशी आत्मतत्त्व !
“अक्षर” का संकेत उस तत्त्व की ओर है, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से परे है जिसे उपनिषद् कहीं “अमृत”, कहीं “नित्य”, कहीं “अजर-अमर” कहता है। शाङ्कर-दृष्टि में यह चैतन्य-साक्षी है; जो स्वयं नहीं बदलता, पर सब परिवर्तन को प्रकाशित करता है। जो कर्ता-भोक्ता नहीं, पर कर्तृत्व-भोक्तृत्व की प्रतीति का प्रकाशक है। यह “अक्षर” ही अन्ततः ब्रह्म है और आत्मा का स्वरूप भी वही।
“देव एकः” एक ईश्वर का अधिष्ठान: प्रवेश का तात्त्विक अर्थ ! “देव एकः क्षरात्मानम् आवीशते” यह “प्रवेश” स्थूल अर्थ में स्थानिक प्रवेश नहीं; यह अधिष्ठान और अन्तर्यामित्व का संकेत है। शाङ्कर-अद्वैत में ईश्वर-तत्त्व को समझने की कुँजी है:
एक ही चेतन तत्त्व माया-उपाधि से सम्बद्ध होकर ईश्वर कहलाता है - सर्वनियम-कर्ता, सर्वव्यापी नियन्ता। वही चेतन तत्त्व अविद्या-उपाधि से सम्बद्ध होकर जीव कहलाता है - सीमित कर्ता-भोक्ता-भाव वाला।
मंत्र का “देव एकः” हमें बहु-तत्त्ववाद से हटाकर एकतत्त्व-बोध की ओर ले जाता है: दृष्टि एक हो तभी बन्धन ढहता है।
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Bloomberg ने जिस तरह भारत के सोना बेचने की झूठी खबर छापी, फिर उसे वापस लिया, ये सबूत है इस बात का कि बे-सिर-पैर की report छापकर भारत को बदनाम करने की कोशिश की जाती है. #Bloomberg#Trump#Putin
।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशावजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता।
अनन्तश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत्।।९।।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह मंत्र वेदान्त-दर्शन के अत्यन्त गूढ़ और मौलिक सिद्धान्तों में से एक को उद्घाटित करता है। यहाँ केवल सृष्टि-विज्ञान अथवा जीव-जगत्-ईश्वर के परस्पर सम्बन्ध का वर्णन नहीं है, अपितु सम्पूर्ण बन्धन और मोक्ष के रहस्य को अत्यन्त संक्षिप्त व प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया गया है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के भाष्य के आलोक में यह मंत्र साधक को उस बिन्दु तक ले जाता है, जहाँ से संसार का समस्त वैविध्य एक अद्वितीय ब्रह्म-सत्य में विलीन होता हुआ दिखाई देता है।
मंत्र में “अज” अर्थात् “अजन्मा” शब्द का प्रयोग हुआ है। यहाँ तीन तत्त्वों का संकेत है- ईश्वर, जीव और प्रकृति (माया)। ईश्वर “ज्ञ” तथा “ईश” है; वह सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, समस्त जगत् का नियन्ता एवं उपादान-अधिष्ठान कारण है। इसके विपरीत जीव “अज्ञ” तथा “अनीश” है; उसका ज्ञान सीमित है, शक्ति सीमित है, और वह अपने को देह, मन तथा बुद्धि के साथ अभिन्न मानकर सुख-दुःख का भोक्ता बन जाता है। तीसरा तत्त्व है “अजा” अर्थात् प्रकृति या माया, जो भोक्ता, भोग्य और भोग- इन तीनों के व्यवहार को प्रकट करती है तथा सम्पूर्ण नाम-रूपात्मक जगत् की रचना का माध्यम बनती है।
किन्तु उपनिषद् का उद्देश्य केवल इन तीन तत्त्वों का पृथक्-पृथक् निरूपण करना नहीं है। उसका वास्तविक प्रयोजन साधक को यह दिखाना है कि ये तीनों भेद अन्तिम सत्य नहीं हैं। आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि जीव का अज्ञान और ईश्वर का सर्वज्ञत्व भी व्यवहारिक स्तर की उपाधियाँ हैं; परमार्थतः आत्मा न तो सीमित है, न कर्ता है, न भोक्ता है। आत्मा अनन्त है, विश्वरूप है, सर्वव्यापक है और सर्वथा अकर्ता है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व तथा बन्धन केवल अविद्या-जनित अध्यास हैं, जो देह-मन-बुद्धि के साथ तादात्म्य के कारण प्रतीत होते हैं।
जब तक जीव अपने को शरीर, इन्द्रिय, मन और अहंकार के साथ जोड़कर देखता है, तब तक वह स्वयं को कर्मों का कर्ता और उनके फल का भोक्ता मानता है। यही बन्धन का मूल कारण है। परन्तु जब विवेक के प्रकाश में यह अनुभव होता है कि शरीर बदलता है, मन बदलता है, विचार बदलते हैं, किन्तु इन सब परिवर्तनों का साक्षी चैतन्य कभी नहीं बदलता, तब आत्मा का वास्तविक स्वरूप प्रकट होने लगता है। वही साक्षी आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, न कर्म करती है और न कर्मफल का भोग करती है।
मंत्र का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पद है - “त्रयं यदा विन्दते ब्रह्म एतत्”। इसका आशय केवल इतना नहीं कि साधक ईश्वर, जीव और प्रकृति का ज्ञान प्राप्त कर ले; वरन् यह है कि वह इन तीनों के व्यवहारगत भेद को समझकर उनके एकमात्र अधिष्ठान ब्रह्म का साक्षात्कार करे। जब यह ज्ञात हो जाता है कि ईश्वर, जीव और जगत् - ये सभी उपाधि-जनित भिन्नताएँ हैं तथा इनके आधार में एक ही अद्वितीय चैतन्य सत्ता विद्यमान है, तब द्वैत की समस्त संरचना ढह जाती है।
यही सत्य सम्पूर्ण प्रस्थानत्रयी की समवेत वाणी है। उपनिषद् अविद्या से उत्पन्न जीव-भाव का निरूपण कर ब्रह्म की साक्षी-सत्ता का प्रतिपादन करते हैं। भगवद्गीता बार-बार यह शिक्षा देती है कि “इन्द्रियाँ अपने विषयों में प्रवृत्त होती हैं”; आत्मा न कर्ता है न भोक्ता। ब्रह्मसूत्र इस निष्कर्ष को दार्शनिक दृढ़ता प्रदान करते हुए सिद्ध करते हैं कि जीव और ब्रह्म का भेद वास्तविक नहीं, अपितु उपाधि-जनित है। इस प्रकार श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह मंत्र उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र के अद्वैत-सिद्धान्त का एक सशक्त सूत्ररूप बन जाता है।
इसके अन्य मंत्रों में भी यही उद्घोष सुनाई देता है कि ब्रह्म अपनी मायाशक्ति के माध्यम से जगत् की प्रतीति कराता है और वही माया जीव को नाम-रूप के जाल में उलझा देती है। अतः मुक्ति का साधन किसी बाह्य उपलब्धि में नहीं, अपितु विवेक, वैराग्य और आत्मचिन्तन द्वारा उस अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप की पहचान में निहित है, जो सदा से प्राप्त है, किन्तु अज्ञानवश अप्राप्त प्रतीत होता है।
अतः इस मंत्र का साधक के लिए अत्यन्त व्यवहारिक सन्देश है- प्रथम, प्रकृति के समस्त गुण, विकार और परिवर्तनशील प्रपंच को अनात्म समझना; द्वितीय, सीमित जीवभाव, अहंकार तथा भोक्तृत्व के अध्यास को पहचानना; और तृतीय, अपने वास्तविक स्वरूप को अनन्त, अकर्ता, असंग और सर्वव्यापक ब्रह्म के रूप में दृढ़तापूर्वक स्थापित करना। जब यह बोध परिपक्व होता है, तब बन्धन की समस्त ग्रन्थियाँ स्वतः शिथिल हो जाती हैं और साधक ब्रह्मनिष्ठा की उस अवस्था को प्राप्त होता है, जहाँ न भय शेष रहता है, न शोक, न मोह।
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