नरेंद्र मोदी Gen Z से थरथर काँपते हैं
▪️और इसीलिए अब उन्होंने षड्यंत्र रचा है कि युवाओं को वोट ही न देने दिया जाये
▪️ज्ञानेश कुमार Gen Z के वोटिंग अधिकार को छीनने में लगे हुए हैं
▪️चुनाव आयोग हर साल Special Summary Revision (SSR) करता है, ताकि नए 18 साल के युवाओं को वोटर लिस्ट में जोड़ा जाए
▪️लेकिन ज्ञानेश कुमार ने 2024 से SSR पर रोक लगा दी है, मतलब 18 साल के युवाओं को वोटर लिस्ट में जोड़ने का काम बंद पड़ा हुआ है
▪️दोनों चुनाव आयुक्त - सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी SSR को शुरू करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन ज्ञानेश कुमार ऐसा नहीं होने दे रहे हैं
• यूपी और गोवा में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, लेकिन यहां SSR नहीं किया गया. इसकी वजह से 18 साल के नए युवा वोटर लिस्ट में जुड़ नहीं पाए
• बिहार में SIR की प्रकिया के बाद एक साल हो चुका है. उसके बाद से 18 साल के नए वोटर को जोड़ने का काम नहीं हुआ
👉👉आप कुछ भी कर लीजिए मोदी जी, Gen Z सब देख रहा है - सबक सिखाएगा
Report @EconomicTimes
असली खेल ECINet (वोटर डिलीशन) सॉफ्टवेयर का है जिसे सीमा खन्ना मैनेज करती हैं. इस सॉफ्टवेयर के बारे में इतनी सीक्रेसी क्यों है, क्यों ERO को इसका एक्सेस नहीं था?
क्या इस सॉफ्टवेयर के पीछे एसोसियन ऑफ बिलियन माइंड्स है - एक रहस्यमयी कंपनी जो बीजेपी का इलेक्शन मैनेजमेंट देखती है?
ममता बनर्जी SIR में इस कंपनी के रोल के बारे में इशारा कर चुकी हैं.
Deepest condolences to Dipika ji @DipikaPS for the unimaginable tragedy. Losing a child is a heart wrenching loss.
Praying for strength for her and her family.
🚨🚨 BREAKING NEWS 🚨🚨
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी SIR के ECINet नेटवर्क के जरिए प्रक्रिया के केंद्रीकरण का विरोध कर रहे हैं. इस बात को @IndianExpress ने सबके सामने रखा है.
अगर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भाषा में कहें कि ECI नेटवर्क एक ही साथ चल भी रहा है, दौड़ भी रहा है और उड़ भी रहा है……तो हमें लगता है कि संगठित जन आक्रोश भी एक ही समय में चलकर, दौड़कर और उड़ाकर ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयोग के दफ्तर से बाहर कर सकता है.
ब्रेकिंग...प्रत्याशियों के चयन में अनियमितता और त्रुटि की वजह से हाल ही में हुए AICC सचिवों के इंटरव्यू प्रक्रिया को निरस्त (रद्द) कर दिया गया है। अब पार्टी परंपरागत तरीके से ही आने वाले समय में सचिवों की नियुक्ति करेगा। इस साक्षात्कार में कई ऐसे प्रत्याशियों को बुला लिया गया था जो हाल ही में संगठन सृजन के माध्यम से जिलाध्यक्ष बने थे। इसके अलावा कई सिफ़ारिशी लोग भी इंटरव्यू तक पहुंच गए थे। जिनको इंटरव्यू पैनल में बैठे नेतृत्व द्वारा जमकर क्लास लगाई गई थी..
👉🏻कैसे हुई गोवा SIR में गड़बड़ी?
👉🏻कैसे सॉफ्टवेयर ने 97 लोगों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं जोड़ने दिए?
👉🏻चुनाव आयोग ने इसपर क्या किया?
चुनाव आयोग की पूरी गड़बड़ी जानने के लिए देखिए हमारी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट. इंडियन एक्सप्रेस हिंदी के यूट्यूब चैनल पर.
अगर रोज़ इन लोगों की कहानी अख़बार में छपे, इनमें से कोई सुरजीत भल्ला की तरह एक्सप्रेस में संपादकीय लिखे तो क्या होगा? RC की रिपोर्ट है कि VIP के घर जाकर ठीक करने के लिए कहा जा रहा है। रिपोटर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट कल के शोर में खो गई । आपकी रिपोर्ट बता रही है कि आम वोटर कितना झेल रहा है। यहाँ तक आने जाने का ख़र्चा, अगर वकील लगा होगा तो उसका ख़र्चा। क्या तरुण पाल उन 27 लाख लोगों में से हैं जिनका केस ट्रिब्यूनल के पास है?
बिहार के मुख्यमंत्री की जमुई की घटना पर शर्मनाक बयान सुनिये:
"अगर उसने रील नहीं बनाई होती तो वह पकड़ा जाता क्या? रील बनाने के चक्कर में कितने लोग मारे जाएंगे?"
क्या महोदय कहना चाह रहे है कि छेड़खानी करो बस रील मत बनाओ?
जमुई सदर अस्पताल में जादुई इलाज हुआ आरोपी का..
सम्राट सरकार के सदर अस्पतालों के सामने दुनिया के सारे अस्पताल फेल हैं , जादुई इलाज होता है बिहार के छोटे कहे जाने वाले अस्पतालों में भी , लोग नाहक ही बिहार के सरकारी अस्पतालों की बदइंतजामी पर सवाल उठाते हैं ..
ऐसा ही जादुई इलाज जमुई छेड़खानी मामले के मुख्य आरोपी हरेराम यादव का हुआ , कल तक पैर टूटने के बाद जो हरेराम यादव मीडिया के कैमरे के सामने खुद से सीधा खड़ा तक नहीं हो पा रहा था और पुलिस वालों की मदद से बड़ी मुश्किल से लंगड़ा कर चल रहा था , वो महज 24 घंटे के भीतर तेज कदमों से चलने लगा, एक तरह से दौड़ने ही लगा l
अब शायद बिहार के मुख्यमंत्री ही बेहतर बता पाएंगे कि इस चमत्कार के पीछे असली कलाकारी किसकी है , आरोपी - अपराधी हरेराम की , जमुई पुलिस की या जमुई सदर अस्पताल के डॉक्टरों की ? या फिर कोई चमत्कार नहीं हुआ, असलियत में आरोपी का पैर टूटा ही नहीं था और पैर टूटने की पुलिसिया कहानी ही झूठी थी ?
नोएडा DM मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से राहत तो मिल गई लेकिन CJI जस्टिस सूर्यकांत पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है ! क्या राहत देने के लिए बदली गई बेंच?
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सुरजीत भल्ला प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य रहे हैं, दिल्ली में रहते हैं दशकों से, वोट भी दिया है लेकिन ज्ञानेश गुप्ता का सॉफ्टवेयर इन्हे वोटर मानने को तैयार नहीं है.
देश भर में 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काट दिये ज्ञानेश गुप्ता ने जिसमे कुछ एक को छोड़कर सुरजीत भल्ला जैसा रसूखदार तो नहीं होगा.
ज्ञानेश गुप्ता को लोकतंत्र की हत्या करने का लाइसेंस सुप्रीम कोर्ट ने दिया है SIR जैसे गैरकानूनी काम को मंजूरी देकर.
गोवा में ऐसा क्या हुआ कि 97 वोटर पात्र प्रूव होने के बाद भी ख़ुद को वोटर लिस्ट में नहीं पा सके?
ऐसा क्या हुआ कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी भी सॉफ्टवेयर के सामने बेबस रहे?
क्या आगे भी ऐसा ही रहेगा?
सभी बातों के बारे में जानने के लिए पहुंचें हमारे यूट्यूब चैनल पर. देखें इंडियन एक्सप्रेस की इन्वेस्टिगेशन.
कुछ पत्रकार कह रहे हैं कि वोटर लिस्ट में पहले भी गड़बड़ होती रही है। करीब सौ करोड़ वोटर की लिस्ट परफेक्ट करना मुश्किल है।
लेकिन वो असली बात भूल रहे हैं:
* पहले चुनाव आयोग मांगने पर वोटर लिस्ट की जाँच में अड़चन नहीं डालता था। 2018 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने ही जाँच की थी। उसके बाद चुनाव आयोग ने 27 लाख नक़ली वोटर हटाए थे।
* लेकिन उसके बाद चुनाव आयोग ने encryption तकनीक का इस्तेमाल किया। इससे छपी हुई वोटर लिस्ट को अब डेटाबेस में बदलना असंभव हो गया है, इससे अब जाँच असंभव हो गई है। चुनाव आयोग ने ऐसा क्यों किया?
* पहले कोई भी शिकायत कर्ता था या प्रमाण देता था, तो चुनाव आयोग गड़बड़ियों का संज्ञान के ले कर जाँच करता था।अब लिखित में देने पर भी नहीं करता। क्यों?
* पहले चुनाव आयोग पारदर्शिता बढ़ाने के लिए CCTV जैसे कदम को प्रोत्साहन देता रहा है। अब वो CCTV फुटेज को 45 दिन में डिलीट करने का फैसला ले लेता है। क्यों?
* चुनाव आयोग फाइनल वोटर लिस्ट देने से इंकार क्यों कर रहा है? supplementary list और additional supplementary list जो पार्टियों को नहीं मिलती, उसे देने से क्यों मना कर रहा है?
* पहले चुनाव आयोग कोई भी बड़ा रिफार्म या फैसले से पहले राजनैतिक दलों से मशविरा करता था। लेकिन अब अचानक SIR जैसा फैसला लेता है और उसे सब पर थोप रहा है। क्यों?
* पहले चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों के नुमाइंदों से खुल कर, सौहार्दपूर्ण वातावरण में मिलता था। राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों का सम्मान करता था। लेकिन अब निर्देश देने लगा है कि उससे कौन मिलेगा। क्यों?
* पहले चुनाव आयोग हर फैसले की प्रेस कांफ्रेंस करता था। SIR पर कोई नहीं की। क्यों?
महाराष्ट्र चुनाव में वोटिंग से पहले महा विकास अघाड़ी की तीनों पार्टियों ने ECI को चिट्ठी लिखी थी। उस पर जांच तो दूर, जवाब तक नहीं दिया। क्यों?
कांग्रेस ने पिछले आठ महीने में कई बार लिखित शिकायत की है, क्या कोई जाँच हुई?
उत्तराखंड में करीब 4000 वोटर, जिनके नाम डिलीट हुए थे, उन्होंने जानकारी मांगी थी, उसे क्यों नहीं दिया गया?
बात सिर्फ इतनी नहीं है कि गड़बड़ है। बात ये भी है की अब गड़बड़ की सुनवाई नहीं है।
@RahulGandhi@INCIndia@kharge
आज भी पढ़िये @RitikaChopra__ की रिपोर्ट।
समझिए कि किस तरह चुनाव आयोग में मनमाने तरीके से काम हो रहा है।
आयोग एक व्यक्ति के मनमाने फैसले का केंद्र बन गया है। ज्ञानेश कुमार को तुरंत पद छोड़ना चाहिए।स्कूल के मॉनिटर एग्जाम में भी इससे अधिक पारदर्शिता और जिम्मेदारी ली जाती है।
सूत्र चुनाव आयोग पर उठे सवालों का जवाब देने में कमज़ोर साबित होंगे।इसलिए आयोग को एक विस्तृत बयान में इन सवालों का जवाब देना चाहिए।
1.नया वोटर कौन है? फॉर्म 6 क्यों बदला गया?
2.मतदाता सूची तक किसकी पहुंच होनी चाहिए? इसमें स्थानीय ERO की दखल किसके आदेश पर और क्यों कम की गई ?
3.बंगाल में 16.10 लाख वोटर्स का नाम हटाए जाने के आवेदन कहाँ से आया? इसको किसने अधिकृत किया?
4.सॉफ़्टवेयर में गड़बड़ी है, ये बताए जाने के बाद भी उसपर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? नतीज़ा genuine वोटर्स का नाम कटा?
5.क्या चुनाव आयुक्त ने आयोग के अधिकारियों को ये लिखा है कि आयोग के फ़ैसले के तौर पे जारी किए जा रहे वक्तव्य/आदेश दरअसल पूरे आयोग का नहीं है?
करीब 5घंटे का सर्वे…
करीब 3000से ज्यादा जवाब…
#CEC#GyaneshKumar के बारे में मिनी से मिनी ..उससे भी मिनी …,,,, भारत की राय …..
78% लोगों की राय… #ज्ञानेश_कुमार जी के लिये बेहद परेशान करने वाली है!
22% लोग ही उन्हें बचाना चाहते हैं… बाकी सब कह रहे हैं कि उन्हें #सीईसी से बाहर जाना ही होगा!!