@ShubmanGill koi gall ni veer hun tension len wali gall ni... jo ho lyea oh ho lyea agge di socho... Sabh pressure mehsoos kr k khed rhe c tan krke haar gye, j natural form ch khed de tn araam nal jittna c... Is cheej da solution hona chahida e
विनेश फोगाट ने कहा-मैं प्रधानमंत्री की चुप्पी से आहत हूं, जब पहलवान खेल मंत्री अनुराग ठाकुर से बात कर रहे थे तो वे फोन पर व्यस्त थे, उन्हें मेरी चिंताएं सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी
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नाथ सम्प्रदाय की हत्या..
नाथ सम्प्रदाय की मठ परंपरा के संस्थापक गोरखनाथ माने जाते हैं । गोरखनाथ के गुरु थे मत्स्येंद्रनाथ जिनका संबंध मत्स्य यानी मछुआरों से था। गोरखनाथ का इतिहास देखेंगे तो इतना घपला मिलेगा कि आप दंग रह जाएंगे। उनके जन्म के बारे में तमाम कथाएं है जिनमें यह तय करना मुश्किल है कि कौन सी वाली सही है । जो सबसे प्रचलित कथा है उसके अनुसार उनका जन्म मत्स्येंद्रनाथ की कृपा से हुआ था।
मत्स्येन्द्रनाथ ने एक निःसन्तान महिला को बच्चा होने के लिए भभूति दी। महिला ने भभूति गोबर के ढेर पर डाल दी और चलती बनी। 12 वर्ष बाद मत्स्येन्द्रनाथ को वो महिला मिल गई। बाबा ने उससे उसकी संतान के बारे में पूछा। झेंपकर उसने गोबर वाली बात बताई। मत्स्येन्द्रनाथ झल्ला उठे। उन्होंने गोबर के ढेर के पास आवाज़ लगाई और वहां से एक 12 वर्ष का लड़का सामने आया। मत्स्येन्द्रनाथ ने इस लड़के का नाम रखा गोरखनाथ। इन्हीं महंत गोरखनाथ के नाम पर गोरखपुर को उसका नाम मिला। इन्ही के नाम पर गोरखनाथ मठ की स्थापना हुई।
इन्हीं के चेले थे राजा गोपीचंद और भर्तहरि। जोगियों के अनुसार गोपीचंद ने सारंगी का अविष्कार किया तथा राजा भर्तहरि वो व्यक्ति थे जिन्होंने गोरखनाथ के प्रभाव से राजपाठ छोड़ दिया। जोगी आज भी अपने गीतों में इनका उल्लेख करते हैं।
यहां यह ध्यान देने योग्य है कि गोरखनाथ के जन्म और जाति को छिपाया गया है और कबीर की तरह इन पर भी परोक्ष रूप से ब्राह्मणी की कोख से जन्म वाली कथा थोपने की फ़िज़ूल कोशिश की गई है। दूसरी बात जो सबसे अहम है।
गोरखनाथ ने ब्राह्मणवाद, बौद्ध परम्परा में अतिभोगवाद व सहजयान में आई विकृतियों के खिलाफ विद्रोह किया। हिंदू-मुसलमान एकता की नींव रखी और ऊंच-नीच, भेदभाव, आडम्बरों का विरोध किया। यही कारण है कि नाथ सम्प्रदाय में बड़ी संख्या में सनातन धर्म से अलगाव की शिकार अस्पृश्य जातियां इसमें शामिल हुईं। नाथपंथियों में वर्णाश्रम व्यवस्था से विद्रोह करने वाले सबसे अधिक थे। हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग बल्कि कहीं-कहीं तो मुसलमान बड़ी संख्या में नाथ संप्रदाय में शामिल हुए। गोरखनाथ का प्रभाव कबीर , दादू , जायसी और मुल्ला दाऊद जैसे अस्पृश्य जातीय और गैर-हिन्दू कवियों पर भी माना जाता है। इससे यह स्पष्ट है कि गोरखनाथ और उनके गुरु किसी ऊंची जाति से तो कतई नहीं थे।
तीसरी अहम बात गोरखनाथ के बाद आप उनके उत्तराधिकारियों श्री वरद्नाथ तत्पश्चात परमेश्वर नाथ एवं गोरखनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करने वालों में प्रमुख बुद्ध नाथ जी (1708-1723 ई), बाबा रामचंद्र नाथ जी, महंत पियार नाथ जी, बाबा बालक नाथ जी, योगी मनसा नाथ जी, संतोष नाथ जी महाराज, मेहर नाथ जी महाराज, दिलावर नाथ जी, बाबा सुन्दर नाथ जी, सिद्ध पुरुष योगिराज गंभीर नाथ जी, बाबा ब्रह्म नाथ जी महाराज तक के इतिहास में कुछ खास नहीं मिलेगा। ये कौन थे, किस पृष्ठभूमि से थे इसके बारे में आज पता लगाना मुश्किल है।
अब आते हैं अंतिम बात पर आपको अचानक से गोरखपुर मठ का इतिहास राजस्थान के ठाकुर नान्हू सिंह यानी दिग्विजयनाथ से मिलना शुरू हो जाएगा। यह हिन्दू महासभा के सदस्य थे। इस महंत के मठ प्रमुख बनने के बाद मुस्लिम और अस्पृश्य जाति के जोगियों की संख्या में गिरावट आने लगी। दिग्विजयनाथ के बाद एक दूसरा ठाकुर अवैद्यनाथ यानी कृपाल सिंह बिष्ट (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड) बनता है। इनके बाद तीसरा ठाकुर आदित्यनाथ यानी अजय सिंह बिष्ट (पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड) मठ प्रमुख बनता है। पौड़ी गढ़वाल के इन दोनों ठाकुरों का क्या रिश्ता है किसी को नहीं पता। इन तीनों ठाकुरो के आने के बाद तीन बातें देखने को मिलती हैं -:
1. मुस्लिम और अस्पृश्य जाति के जोगियों का सफाया हो जाता है।
2. क्रमशः एक ही जाति (ठाकुर) के मठ प्रमुख बनने की परंपरा कायम होती है।
3. नाथ सम्प्रदाय गोपीनाथ और भर्तहरि के गीत गाना छोड़कर, हिन्दू मुस्लिम एकता, ऊंच नीच, आडंबरों का विरोध छोड़कर क्षत्रिय राम की बात करने वाला कट्टर हिन्दू सम्प्रदाय बन जाता है।
जार्ज वेस्टन ब्रिग्स की पुस्तक ‘गोरखनाथ एंड दि कनफटा योगीज’ में उल्लिखित 1891 की जनसंख्या रिपोर्ट और इसी वर्ष की पंजाब की जनसंख्या रिपोर्ट के अनुसार 28,816 गोरखनाथी और 78,387 योगी में 38,137 मुसलमान योगी थे। आज हालत ये है कि उत्तर भारत, खासकर पूर्वांचल से उनका पूरी तरह सफाया हो गया है। गोरखपुर में जो बचे खुचे मुसलमान जोगी थे वो हिन्दू युवा वाहिनी के डर से भगवा वस्त्र पहनना और सारंगी बजा कर गीत गाना छोड़ चुके हैं।
इस तरह एक सामंती जाति के मठाधीशों ने नाथ सम्प्रदाय की हत्या कर दी। उसे उसके असल वारिसों से छीन लिया। 👇1/2
@_MayankSaxena मुसलमानों ने 1192 से अंग्रेजों के आने तक राज किया, लगभग 550 साल। इस दौरान उन्होंने असंख्य काम किया यहां की सभ्यता संस्कृति कला विज्ञान सब पर उनका प्रभाव पड़ा जिसे मिटाया नहीं जा सकता। क्या इतिहास से 5 शताब्दी से अधिक का समय गायब किया जा सकता है। यह मूर्खता की पराकाष्ठा है
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