कुछ दिन बोझिल हैं. बाक़ी दिन भारी हैं. इसलिए क्योंकि उन दिनों में एक कहानी आपके झोले में होती है. कहानी जिसे JCB से खुरचकर छुड़ाया जा रहा था.
उपलब्धि का भाव नहीं आता. बेचैनी जगह नहीं छोड़ती. जिनके पाँवों में ये चप्पलें रही होंगी, जिनके बदन पर ये वस्त्र रहे होंगे और जो सूचियों में खोजे जा रहे हैं; कैसे दिखते होंगे उनके चेहरे.
ये स्टोरी नहीं कर पाते तो नींद कैसे आती. कर ली है तो अब किस तरह सोएंगे. पत्रकारिता जल्दी में लिखा गया इतिहास है, जो पहला डंक अपने लेखक को ही मारता है.
Hard-hitting reporting from @Abhinav_Pan and @mohankanojia2. Tough day! Proud day!
It’s funny how things work in our country. So, what’s the right move? Do we roll it out and hope it works or test it first? And if it’s not working, should the govt stop it and risk looking like they failed, or keep going just to save their vote banks? What do you think?
What do you call something that’s meant to make life better but, when you look at the bigger picture, feels like a waste of money? That’s #VandeBharatTrain
It’s fast, convenient, and kept in great shape. It’s trying to attract middle-class and premium travellers... (contd)
saving them time and giving them a touch of luxury without breaking the bank. Sounds great, right?
But here’s the problem: it’s not filling up. Low attendance means tax money wasted and big losses. For many, ₹600 for a 90-minute trip is still too much.
लापता सिर्फ़ लेडीज नहीं, हम मर्द भी रहे हैं। हम भी खो गए हैं नौ से पांच की नौकरी में, कोचिंग कारखानों के पोस्टरों में, कंधे पर बैग टांगे, जेनरल डब्बों की भीड़ में।
दीपक की तरह फुल इंग्लिश में अपनी फूल को आई लव यू बोलने का सपना हमारा भी रहा है। पर हमारी फूल तो हमारे सामने ब्याह दी गई किसी शहर वाले प्रमोद से और हम उसे चाहकर भी ढूँढ नहीं पाए।
"मां तुम्हारे लिए खाना है न!" पूछकर ही खाया पहला निवाला, बाबूजी की उम्मीदें सर पर उठाकर चलते रहे, यार दोस्तों को कभी ना नहीं कहा पर फिर भी कहीं गुम होकर रह गए।
खुद लापता रहे पर हमेशा कोशिश रही कि किसी फूल, जया या स्टेशन वाली अम्मा के चेहरे की मुस्कान बन पाएँ।
- तन्मय कुंज
आकाशदीप के पिता के गुजरने के 6 महीने के भीतर उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया था। उनके बडे भाई की 2 बेटियाँ हैं, आरोही और आर्या। बड़े भाई के गुजरने के बाद क्रिकेटर आकाशदीप अपनी दोनों भतीजीयों को संभाल रहे हैं। बिहार से बिलॉन्ग करने वाले आकाशदीप ने भारतीय टीम में डेब्यू के दौरान मां के साथ दोनों भतीजियों को भी मैदान पर बुलाया था।
दरअसल, अपने पिता और बडे भाई के देहांत के बाद 3 साल तक आकाशदीप ने क्रिकेट छोड़ दिया था। आकाशदीप घर के आसपास काम करते थे और परिवार का भरण-पोषण करते थे। जब लगा कि क्रिकेट के बगैर जिंदा नहीं रह पाऊंगा, तब 3 साल बाद वापसी की और आज भारतीय टीम के लिए खेल रहे हैं।
टेनिस क्रिकेट में प्रतिदिन ₹2000 कमाने से लेकर भारतीय टीम का सफर बहुत कठिन रहा है। जिस तरह आकाशदीप ने अपनी भतीजियों को संभाला है, वह देखकर गर्व महसूस होता है। उन्होंने दोनों बच्चियों को पिता की कमी महसूस नहीं होने दी है।
कितनी बेहतरीन कहानियाँ-किस्से उन कहानियों के अन्दर छुपे हुए हैं जिन्हें हम रोज पढ़ते आ रहे हैं। ऐसे किस्से सुनते हैं तो लगता है कि दुनिया में असम्भव कुछ नहीं है, आप अपने हिस्से कोशिश दिल से करते रहें तो प्रकृति आपको एक दिन सही जगह पहुँचा देती है।