All the records broken by Lionel Messi today:
Most FIFA World Cup finals goals by a football (soccer) player - 18
Most FIFA World Cup matches played in by an individual - 28
Most matches won by a player at the football (soccer) FIFA World Cup - 18
Most minutes played in the football (soccer) FIFA World Cup - 2,489
We are witnessing history.
मैं वापस आऊँगा' कोई आसान फ़िल्म नहीं है। यह फ़िल्म एक वसीयतनामा है... यादों की, मोहब्बत की और उस घर की…जहाँ हम सब राजनीति और नफ़रत के इस दौर से थककर कभी न कभी वापस लौटना चाहते हैं।
पूरी बात यहाँ: https://t.co/7fHBa56gdj
#Mainvaapasaaunga#Imtiazali
एक विचारक होने के नाते कांग्रेस पार्टी के प्रचारकों के लिए भी मेरी एक सलाह है
अगर CJP हवा-हवाई पार्टी है तो इतना लोड क्यों लेना? विरोध में इतनी एनर्जी क्यों झोंकना? बबल है तो ख़ुद फूट जाएगा। अगर उनके 'कॉकरोचों' की बड़ी तादाद सिर्फ़ इंस्टाग्राम पर है तो आप अपने 'बब्बर शेर' के ज़रिए ग्राम ग्राम अपनी ताक़त दिखाइए। अपने अपने प्रदर्शनों के वीडियो और फ़ोटो दिखाइए लेकिन CJP से तुलना में पड़े बग़ैर। इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला।
ठीक है कि कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता भी छोटे, मध्यम और बड़े, कई प्रदर्शन करते रहते हैं, लाठियां और पानी की बौछार खाते रहते हैं... नीट और सीबीएसई के मुद्दे पर भी किया है। उन प्रदर्शनों को और बड़ा कीजिए। देश बहुत बड़ा है। आबादी बहुत बड़ी है। पीड़ितों की तादाद बहुत बड़ी है। मुद्दे और भी हैं। आपको तो किसी ने रोका नहीं है अपनी ताक़त दिखाने को! आपकी शिकायत है कि मीडिया नहीं दिखाता, तो कब तक उस गोदी मीडिया की बाट जोहते रहेंगे जो आपकी गोद में तभी आएगा जब आपकी सत्ता आएगी। जब भी आए।
और आपको लगता है कि CJP का उठान या तूफ़ान तो सिर्फ़ सोशल मीडिया तक ही सीमित है... तो आप भी गांव-कस्बों की सोसाईटी से लेकर सोशल मीडिया पर छा जाइए। आपके ऑनलाइन सिपहसालार भी तो कम नहीं हैं! कम पाते हैं तो बढ़ाइए। जेन-ज़ी के दिल में उतरिए। और पहले से उतरे हुए हैं तो फिर चिंता किस बात की?
आख़िरी बात। CJP अपने जिस मक़सद या टास्क को हाथ में लेकर चल रहा है वो आपके कहने से तो रुकेगा नहीं। आपका विरोध उसे और लेजिटिमेसी ही देगा। इसलिए हे वत्स, CJP जो कर रहा है करने दें। आप अपनी रणनीति पर ध्यान दें।
सुझाव है। लेना है तो लीजिए। नहीं तो मत लीजिएगा। कोई ज़बर्दस्ती नहीं है।
The cockroach protest has been successful and peaceful. The youth got to vent and police didn't have to exercise force.
Decent numbers of young, old, and older folks. 90% of them were clueless and curious. 10% were sharp and eloquent. So, quite representative of society.
Various student outfits sent fellow travellers to Jantar Mantar. Some known political fronts registered their presence. Also, there were some protest tourists.
Many opposed the government itself, but most had Dharmendra Pradhan as their target.
What if Pradhan resigned in protest against the protest making him the only target? Will the movement end? The government will naturally fear that that would be seen as surrender and cockroaches will taste blood.
One good outcome expected is a cleanup of the examination system, which has been repeatedly ignored for years. While Pradhan being replaced by some other person is not a solution, the protest has brought the spotlight to a problem that was talked about incident by incident.
The real Cockroach Janata Party has been in power since 1947. It is not elected but selected. It's built of steel that survives everything.
https://t.co/9OSuKTGg4p
CBSE Tender Row | Sarthak Sidhant Speaks to Times Now
'In the earlier RFP, there were clear clauses stating that any service provider with a record of poor performance would be disqualified from the bidding process. However, in the revised RFP issued on 28 August, these disqualification clauses were removed': Sarthak Sidhant speaks to @anchoramitaw.
ये भी कांड है? एक स्त्री ने अपना दूसरा विकल्प चुन लिया तो इतना हंगामा। रिश्ते टूटते हैं। उनके बीच सौ कारण हो सकते हैं। पति को छोड़ा जैसे वाक्यों से स्त्री को ही संदिग्ध बना रहे हैं। जैसे उसका दूसरा विकल्प चुनना कोई अपराध हो। किसी रिश्ते का टूटना दुखद ख़बर है लेकिन इस तरह की हेडलाइन से लगता है कि पति को छोड़ना कोई अपराध है। पति को भी स्वीकार कर आगे बढ़ जाना चाहिए। चली गई तो चली गई। आप भी चले जाइये। ज़मीन बेचा, मकान बेचा ये सब मत कीजिए। जब रिश्ते अच्छे थे तो पति ने किया। अब उसे अहसान की तरह गिनवा रहे हैं। अहसान कोई बैंक का निवेश नहीं है कि रिर्टन फिक्स होगा। अफसर बनने और बनाने की सनक का इलाज खोजिए। घूस और किसी को फर्ज़ी फंसाने का सुख न हो तो सरकार दरवाज़ा खोल कर बैठी रह जाएगी कोई अफसर बनने नहीं जाएगा। सामंती सुख के लिए ज़मीन बेच रहे थे। सामंती सुख को डबल करने के लिए किसी ने नया रिश्ता चुन लिया। CBSE जैसा कांड हो गया उससे तो फर्क ही नहीं पड़ रहा इस देश को।
बशीर बद्र का नाम सैयद मोहम्मद बशीर था; लेकिन ‘बद्र’ ने उन्हें चांद की तरह फैला दिया
‘बद्र’ का अर्थ है पूर्णिमा का चांद। यह तख़ल्लुस उनके व्यक्तित्व पर अद्भुत ढंग से बैठता था। उनके यहां चांदनी भी है, अकेलापन भी; रोशनी भी है, छाया भी। वे नारे के शायर नहीं थे, लेकिन समय के अंधेरे को पहचानते थे।उनके शेरों में बार-बार शाम, रात, चराग़, याद, रास्ता, दरवाज़ा, घर, बारिश, फूल, धूप और धुंध आते हैं। ये सब केवल दृश्य नहीं, मनुष्य की आंतरिक अवस्थाएं हैं। बशीर बद्र ने मौसमों को मन की भाषा बना दिया।
वे सिर्फ़ रोमांटिक शायर नहीं, ग़ज़ल के गंभीर आलोचक और अध्यापक भी थे।
बशीर बद्र को अक्सर केवल प्रेम और नफ़ासत का शायर समझ लिया जाता है, जबकि वे ग़ज़ल के बड़े अध्येता भी थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ली, शोध किया, अध्यापन किया और बाद में मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग से जुड़े। उनका महत्व सिर्फ़ यह नहीं कि उन्होंने अच्छी ग़ज़लें लिखीं; महत्व यह है कि वे जानते थे कि ग़ज़ल की परंपरा किस मिट्टी से आई है, आधुनिकता में उसका रूप कैसे बदला है और आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़ल को किस तरह अपनी नई ज़मीन बनानी पड़ी। यानी वे केवल कवि नहीं थे, कविता के भीतर बैठे हुए विचारक भी थे।
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा।
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा।
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है;
तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा।