देश में जाति के आधार पर सदिय��ं से तोड़े व पछाड़े गये ख़ासकर ’बहुजन समाज’ के करोड़ों दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों एवं अन्य कमज़ोर तबक़ों आदि को उनके वोट की ताक़त के माध्यम से सत्ता की मास्टर चाबी देकर उन्��ें शोषित से शासक वर्ग बनाने हेतु इनके मसीहा परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के आत्म-सम्मान व स्वाभिमान के रुके एवं बिखरे हुये कारवाँ को आगे मंज़िल तक पहुँचाने के लिये बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी.) के जन्मदाता एवं संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी को आज उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर बी.एस.पी. परिवार की ओर से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि व अपार श्रद्धा-सुमन अर्पित।
मान्यवर श्री कांशीराम ���ी के मिशनरी संकल्प का ही यह सुखद परिणाम था कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल व महत्वपूर्ण राज्य में मेरे नेतृत्व में बी.एस.पी. की चार बार सरकार बनी और इसके माध्यम से ’सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति’ के ऐतिहासिक कार्य करके ’बहुजन समाज’ में समय-समय पर जन्मे महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों में भी ख़ासकर महात्मा ज्योतिबा फुले, श्री नारायणा गुरु, राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज व बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर आदि के समता व समानता के हक़ के लिये उनके अतुलनीय संघर्ष व बहुमूल्य योगदान को ज़मीनी स्तर पर उतारकर संविधान के पवित्र मंशा की पूर्ति की गयी।
यही नहीं बल्कि इन महापुरुषों की प्रेरणा से, यूपी में सर्वसमाज के ह���त में अपराध नियंत्रण व क़ानून व्यवस्था के मामलों में क़ानून द्वारा क़ानून का राज क़ायम करके तथा जनहित, जनकल्याण एवं विकास के मामलों में भी, बेहतरीन सरकार देकर मान्यवर श्री कांशीराम जी को सच्ची श्रद्धांजलि व श्रद्धा-सुमन अर्पित किया गया।
1. सपा, कांग्रेस व अन्य विरोधी पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा बी.एस.पी. का शुरु से ही चला आ रहा नीला रंग अब यह इनके गले का गमछा व कपड़े पहनने से तथा स्टेज आदि में भी नीला कपड़ा इस्तेमाल करने ���े इनकी सर्वसमाज में से ख़ासकर ग़रीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़े व अन्य उपेक्षित वर्गों के प्रति वर्षों से चली आ रही इनकी जातिवादी, संकीर्ण, सामन्तवादी एवं पूँजीवादी सोच नहीं बदल सकती है तथा ना ही ये लोग दिल से अम्बेडकरवादी होने एवं कहलाने वाले हैं। इसीलिये ’बहुजन समाज’ के वास्तविक हित व कल्याण के प्रति पहले वे अपना दिल व दिमाग़ तो पाक-साफ करें।
2. वैसे भी ये लोग इन वर्गों के मामले में आए दि��� गिरगिट की तरह ही रंग बदलते रहते हैं अर्थात् ये कहते कुछ हैं और करते उसके ठीक विपरीत हैं। ख़ासकर इनके सपा के PDA के मामले में तो इनकी सोच, चाल, चरित्र व चेहरा आदि हमेशा दोग़ला व बईमान ही रहा है, जिसके अनेकों उदाहरण हैं, ये सभी जानते हैं। इसलिए इन वर्गों की एकमात्र हितैषी व अम्बेडकरवादी पार्टी केवल बी.एस.पी. ही है, जो सर्वविदित है।
3. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अन्य पार्टियों की तरह बी.एस.पी. के जो भी लोग पार्टी में अनुशासनहीनता आदि के कारण समय-समय पर निष्कासित क��� दिये जाते हैं तो वे अधिकतर इन्हीं सब कारणों से अब तक कई पार्टी बदल चुके हैं, जो किसी से छिपा नहीं है। इसी से ही अन्दाज़ा लगा लेना चाहिये कि ये लोग पूरे स्वार्थी व अवसरवादी हैं और वे किसी भी पार्टी के हित में नहीं हो सकते हैं।
4. इतना ही नहीं बल्कि जिनको पार्टी से निकाल दिया जाता है तो उनमें से कुछ लोग दूसरी पार्टियों के हाथों में खेलकर छोटी-छोटी पार्टियाँ व संगठन आदि भी बना लेते हैं, जिनसे ’बहुज��� समाज’ का सा��ूहिक हित नहीं हो सकता है,
5. हालांकि ऐसी पार्टियाँ बिना किसी गठबन्धन के भी चुनाव नहीं लड़ सकती हैं तथा किसी भी पार्टी की सरकार बनने पर सरकार में शामिल हुये बिना भी नहीं रह सकती हैं, जो पार्टी से निकाले हुये लोगों को अक्सर अपनी पार्टी में लेने की बात करते हैं या उन्हें पार्टी बनाने की भी सलाह देते हैं, तो वे पहले अपने गिरेबान में भी झाँककर ज़रूर देख लें।
6. ख़ासकर कांग्रेस पार्टी, जिन निकाले हुये ���ोगों को अपनी पार्टी में लेने की बात कर रही है, तो ऐसी पार्टी में जो डूबते जहाज़ की तरह है, उसमें भला कौन शामिल होकर अपने भविष्य को अन्धकार में डालेगा, जबकि ख़ासकर इस पार्टी से दूरी बनाने के लिये बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर जी ने अपने जीते-जी बहुजन समाज के लोगों को अगाह (चेताया) भी किया था। इसलिये यह सब वर्तमान हालात में, पार्टी व मूवमेन्ट के हित में बी.एस.पी. के लोगों को जानना व समझना भी बहुत ज़रूरी है तो यह उचित होगा।
7. यहां यह भी बताना बहुत जरूरी है कि जिस दिन बी.एस.पी. ने श्री अशोक सिद्धार्थ को राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दी थी तो उस दिन ��न्होंने इनके उपर काफी दबाव पड़ने के बावजूद भी अपने संन्यास लेने की घोषणा तब तत्काल नहीं की थी।
8. क्योंकि उस दिन यह पूरी रातभर इसे रुकवाने के लिए क़िस्म-क़िस्म के हथकण्डे इस्तेमाल करते रहे जिसमें कामयाबी नहीं मिलने पर, फिर मजबूरी में, अगले दिन यह सोच कर इनको लगभग प्रातः 6ः30 बजे अपने संन्यास की काफी किन्तु-परन्तु वाली घोषणा करनी पड़ी है, कि कहीं ज्यादा देरी होने पर और भी बड़ा नुकसान ना हो जाये, जिसके बारे में सही समय आने पर पार्टी के लोगों को और भी बहुत कुछ ज़रूर बताया जायेगा।
कांग्रेस का टिकिट फार्मूला शुरू हुआ है जिसमे उम्मीदवार के बैंक खाते में 20 लाख रुपए होना अनिवार्य और दो लाख रुपए पार्टी फण्ड में जमा कराने होंगे तब जाकर टिकिट मिलेगा।
ये खबर उन लोगों के मुँह पर दे मारो जो कहते है कि बसपा टिकिट के बदले पैसे लेती हैं।
मैं आकाश आनंद भाई के साथ हूं।
राजनीति में जब कोई व्यक्ति मुश्किल दौर से गुजर रहा होता है, तब उसके साथ खड़ा होना सबसे कठिन होता है। लेकिन मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो किसी के अच्छे दिनों में उसके साथ खड़े रहें और बुरे दिनों में उससे किनारा कर लें।
मैं आकाश आनंद के साथ इसलिए हूँ, क्योंकि मैंने उनमें बहुजन समाज के लिए कुछ करने की बेचैनी देखी है। मैंने देखा है कि किस तरह उन्होंने युवाओं के बीच जाकर BSP की बात रखी, नई पीढ़ी से संवाद किया और यह बताने की कोशिश की क�� मान्यवर कांशीराम एवं माननीया बहन जी का संघर्ष केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की लड़ाई भी है।
अगर उनसे कुछ गलती हुई भी है तो उन्हें समझाइए। अगर वह जल्दबाजी करते हैं तो उन्हें रोकिए। अगर उनमें कमी है तो उन्हें सिखाइए। लेकिन उन्हें बार-बार अपमानित करते हुए सार्वजनिक रूप से यह मत कहिए कि वह "इमैच्योर" हैं या कुछ कर ही नहीं सकते। जहां तक पब्लिक डोमेन में उपलब्ध बातों का सवाल है, मुझे आकाश आनंद बहुत ही परिपक्व, योग्य एवं ���ेबाक नेता लगते हैं। धूर्त पदाधिकारियों के बहकावे में आकर बहन जी द्वारा ससुर और ससुराल के बहाने पग-पग पर उनके पांव रोकना हरगिज जायज नहीं है।
कांशीराम साहब ने भी बहन जी को एक दिन में तैयार नहीं किया था। उन्होंने उन्हें अवसर दिया, जिम्मेदारी दी, समझाया और समय के साथ तराशा। बहन जी स्वयं इस बात की सबसे बड़ी मिसाल हैं कि एक युवा कार्यकर्ता को अगर सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो वह इति��ास बदल सकता है। इसलिए आकाश आनंद को भी सीखने और खुद को साबित करने का अवसर मिलना चाहिए।
माननीया बहन जी को समझना होगा कि आज AI के इस दौर में युवाओं के सवाल अलग हैं, उनकी भाषा अलग है, उनके माध्यम अलग हैं और उनके सपने अलग हैं। अगर बहुजन आंदोलन को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है, तो उसके नेतृत्व को भी उस पीढ़ी से संवाद करना पड़ेगा। इसीलिए बहुजन आंदोलन को नई पीढ़ी चाहिए।
BSP को सिर्फ पुराने 15-20 धूर्त पदा��िकारियों की पार्टी बनाकर नहीं रखा जा सकता। इनमें से अधिकांश पदाधिकारी धूर्त, स्वार्थी एवं बहन जी से मिलाने एवं टिकट दिलाने के नाम पर अकूत धन ऐंठने वाले हैं। ऐसे में पार्टी को हर उस युवा तक भी पहुंचना होगा, जो मोबाइल पर राजनीति देखता है, सोशल मीडिया पर बहस करता है और अपने भविष्य को लेकर सवाल पूछता है। आकाश आनंद ने इस दिशा में शानदार कोशिश की थी। वह इसमें कुछ हद तक सफल भी रहे।
आज अगर आकाश के साथ खड़े होने का मतलब यह है कि मैं अकेला दिखाई दूंगा, तो भी मुझे मंजूर है। क्योंकि राजनीति में समर्थन सिर्फ तब नहीं दिखना चाहिए, जब आ��के नेता के पास पद हो, मंच हो और हजारों लोग उसके आसपास खड़े हों। असली समर्थन तब होता है, जब उसके पास कुछ भी न बचा हो और फिर भी आप कहें; "भाई आप संघर्ष करें, हम आपके साथ हैं।"
आज जब आकाश आनंद बार-बार मुश्किल परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, तब उनके साथ खड़ा होना और भी जरूरी है। अच्छे समय में किसी के साथ खड़े होने वाले बहुत लोग मिल जाते हैं, लेकिन जब वही व्यक्ति अपमान और अकेलेपन से गुजर रहा हो, तब उसके साथ ख���़े होने वाले कम होते हैं। मैं उन कम लोगों में रहना पसंद करूंगा।
आकाश आनंद भाई, यह आपके लिए परीक्षा की घड़ी है। शांत रहना समस्या का समाधान नहीं है। पार्टी के धूर्त पदाधिकारियों ने बहन जी के इर्द-गिर्द जो मकड़जाल बना रखा है, आपको उसे तोड़ना ही होगा। आपको गिराया जा सकता है, रोका जा सकता है, आपकी जिम्मेदारी छीनी जा सकती है, लेकिन इसे अपनी राजनीतिक यात्रा का अंत हरगिज नहीं होने देना है।
भाई आप हिम���मत मत हारना। आपके हिस्से शुरू से ही संघर्ष आया है। आज का समय मुश्किल है, लेकिन इसे अपनी कहानी का अंत मत समझना। राजनीति लंबी यात्रा है। इसमें बहुत से उतार-च��़ाव आते हैं। यह एक योद्धा की जिम्मेदारी है कि वह इस साजिश को भेदकर बाहर निकले।
इन मुश्किलों से टूटें नहीं, बल्कि इस पूरे अनुभव से और मजबूत होकर निकलें। अपने भीतर के विश्वास को मत खोएं। हम आपके साथ हैं.. किसी पद के लिए नहीं, किसी रिश्ते के लिए नहीं, किसी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं इस युवा में बहुजन आंदोलन को आगे बढ़ाने की संभावना देखता हूं।
आपका शुभचिंतक- सूरज कुमार बौद्ध
@Mayawati @AnandAkash_BSP
मोदी की दबंग वाली इमेज गलत है. दरअसल वे परिवार के उस मुखिया की तरह हैं, जो सबको साथ लेकर चलते हैं.
इसे ऐसे समझिए कि 2014 के बाद सिर्फ 8 संविधान संशोधन हुए और कांग्रेस ने सभी 8 का समर्थन किया. कांग्रेस साथ नहीं आई, तब तक वे रुके रहे. दो तिहाई बहुमत से हो जाता लेकिन उन्होंने आम सहमति का इंतजार किया. वे जिद्दी नहीं हैं. इगो पर नहीं लेते.
जिद्दी नहीं हैं, इसलिए टिकाऊ हैं.
भारत का मिजाज भी ऐसा ही है.
1. जैसाकि सर्वविदित है कि बी.एस.पी. ने यूपी में अपनी सरकार के दौरान पुलिस व पंचायती राज विभाग में लगभग सवादो लाख नये सरकारी पद सृजित करके तथा नौकरियों की भर्ती पर लगी रोक को भी हटाकर सर्वसमाज के कई लाख लोगों की सरकारी नौकरियों में बहाली की और फिर उसके बाद सरकार में ना रहने पर काफी लम्बे समय से देश में व ख़ासकर यूपी, उत्तराखण्ड व पंजाब अदि राज्यों में व्याप्त ज़बरदस्त महंगाई, अति-ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, बदतर स्वास्थ्य व्यवस्था, पिछड़ापन एवं उनके मजबूरी के पलायन, महिला असुरक्षा, पेपरलीक व भ्रष्टाचार आदि से त्रस्त लोगों के दुखी जीवन जैसे ज्��लन्त मुद्दों एवं गंभीर समस्याओं के निदान हेतु प्रभावी कदम उठाने की माँग केन्द्र व राज्य सरकारों से बार-बार करती रही है, लेकिन सभी सरकारें, पूर्व की कांग्रेसी सरकारों की तरह ही, ज़्यादातर मामलों में उदासीन व लापरवाह ही बनी हुई हैं, जो देश के बिगड़ते हुये राजनीतिक, आर्थिक, संसदीय व सामाजिक हालात के मद्देनज़र अति-दुखद एवं अत्यन्त चिन्तनीय���
2. और अब जबकि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नाम से विशेषकर बेरोज़गारी व अंधकार भविष्य आदि से पीड़ित व आहत शिक्षित युवा-युवतियों ने ख़ासकर दिल्ली में जंतर मंतर के 36 दिन तक चले अपने बहु-चर्चित आन्दोलन के ज़रिये इन ज्वलन्त मुद्दों को वास्तव में राष्ट्रीय महत्व का विशेष व गंभीर चर्चा का मुद्दा बना दिया है और जिसको लेकर देश के शिक्षा मंत्री को भी अपनी कुर्सी गवानी पड़ी है, केन्द्र व राज्य सरकारों को देश के क़रीब सवासौ करोड़ ग़रीबों, श्रमिकों, युवाओं, महिलाओं व अन्य मेहनतकश लोगों तथा ख़ासकर बेरोज़गारी की मार से पीड़ित लाखों परिवारों की वास्तविक चिन्ता, सब कुछ भुलाकर, तत्काल शुरू कर देनी चाहिये।
3. ऐसे में, अन्य बातों के अलावा, सरकारी नौकरियों पर खा़स ध्यान देने की ज़रूरत है और इस क्रम में राष्ट्रीय सम्पत्तियों को निजी हाथों में बेचना बंद करके तथा सभी सरकारी विभागों में रिक्त पड़े ला���ों पदों पर पेपरलीक व भ्रष्टाचार-मुक्त समयबद्ध भर्तियाँ तत्काल प्रारम्भ करके ��मस्या के फौरन निदान के प्रति गंभीर प्रयास शुरू कर दें तो यह उचित होगा।
4. इस प्रकार एक परिवार में अगर एक को भी सरकारी नौकरी मिल गयी तो लाखों परिवारों का सीधे तौर पर भला होगा और साथ ही इससे एससी, एसटी व ओबीसी समाज को भी वह सुरक्षा मिल पायेगी जो आरक्षण के काफी हद तक निष्प्रभावी व निष्क्रिय बना दिये जाने के कारण, संविधान प्रदत्त आत्म-सम्मान की ज़िन्दगी जीने के बजाय, ग़रीबी व लाचारी का त्रस्त जीवन जीने को ही मजबूर हैं।
5. कुल मिलाकर, सभी सरकारों को हर हाल में मुनाफाखोरी/लाभ कमाने वाली व्यापारिक सोच/प्रवृति को त्याग कर संविधान की सही मानवतावादी व कल्याणकारी नीति एवं सिद्धान्त को पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ अमल करके आगे बढ़ाना होगा, जो ’हर हाथ को काम’ देने वाली व्यापक देश व जनहित में लाख दुखों की एक दवा है, यही सभी सरकारों से अपील।
6. इसके साथ ही, जंतर मंतर में आन्दोलित छात्र-छात्राओं व बे��ोजगार युवाओं आदि के मुद्दों को लेकर संसद के वर्त��ान सत्र में अब तक लगातार जारी गतिरोध को भी समाप्त किया जाना ज़रूरी है, ताकि बिना समुचित बहस/चर्चा के सरकारी विधेयकों को पारित होकर कानून बनने की प्रक्रिया पर विराम लग सके।
#बहन_जी_का_संदेश
क्योंकि आरक्षण मूलतः सदियों से जातिवादी व्यवस्था के शिकार करोड़ों शोषित-पीड़ित, उपेक्��ित व तिरस्कृत लोगों को मानवीय आधार पर समता व समानता का संवैधानिक व कानूनी अधिकार देना है, और जिसे आर्थिक उन्नति से कतई भी नहीं आँका जा सकता है - आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी
1.देश में ’बहुजन समाज’ में से ख़ासकर एससी, एसटी व ओबीसी वर्गों के लिये आरक्षण ’सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति’ अर्थात् हमेशा से इनके आ��्म-सम्मान की ज़िन्दगी से जुड़ा अति-महत्वपूर्ण व अत्यन्त संवेदनशील मामला है और जाति के आधार पर सदियों से यहाँ तोड़े, सताये व पछाड़े गये एससी व एसटी समाज के लिये तो यह अत्यन्त ज़रूरी मामला भी विशेषकर तब बन जाता है जब जातिवादी द्वेष, शोषण, प्रताड़ना, अन्याय-अत्याचार कम होने का नाम ना ले, और इसीलिये इसमें क्रीमी लेयर की बात करना अनुचित ही नहीं बल्कि परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के मानवतावादी संविधान के पवित्र उद्देश्यों के भी विरुद्ध है, हालाँकि किसी को भी इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिये बल्कि सभी को देश व जनहित के मद्देनज़र अपनी पूूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ इस पर अमल भी ज़रूर करना चाहिये।
2.जबकि इस बारे में आरएसएस प्रमुख का अभी हाल में फिर से यह कहना कि, ’आरक्षण का जानबूझकर राजनीतिकरण किया गया है जिससे समाज में कड़वाहट भरी है तथा आरक्षण के लाभार्तियों को स्वेच्छा से इसका ���ाभ छोड़ देना चाहिये’, वास्तव में यह इनकी ऐसी जातिवादी सोच है जिससे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति तो हो स��ती है, किन्तु इससे संवैधानिक उद्देश्यों की अवहेलना होती है, क्योंकि आरक्षण मूलतः सदियों से जातिवादी व्यवस्था के शिकार करोड़ों शोषित-पीड़ित, उपेक्षित व तिरस्कृत लोगों को मानवीय आधार पर समता व समानता का संवैधानिक व कानूनी अधिकार देना है, और जिसे आर्थिक उन्नति से कतई भी नहीं आँका जा सकता है, क्योंकि जातिवाद का दंश जीवन के हर पहलू में उन्हें डसता ही रहता है और जो क्रम अभी भी हर स्तर पर लगातार जा���ी है, यह आरएसएस से ज़्यादा भला कौन जानता है?
3.इतना ही नहीं बल्कि केन्द्र में अभी तक रही सभी सरकारें भी इस कड़वी ज़मीनी वास्तविकता को भलीभाँति जानती और समझती भी हैं और इसीलिये अगर वर्तमान सरकार अपने वाजिब तर्कों के आधार पर इसकी प्रभावी व समुचित पैरवी करके एससी व एसटी समाज को क्रीमी लेयर से दूर रखने हेतु अपना पक्ष अदालत से मनवा लेती है तो यह पूर्णतः उचित व संवैधानिक होगा। वैसे अक्सर यही देखा ग��ा है कि सरकारों के लचर रवैये व अच्छी कानूनी पैरवी के अभाव में ही अदालतें ’सामाजिक परिवर्तन’(Social Transformation) आदि के मामलों में सही से न्याय नहीं कर पाती हैं।
4.इस बारे में आरएसएस से भी यही कहना है कि वह परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के मानवतावादी एवं कल्याणकारी संविधान को पूरा-पूरा आदर-सम्मान देते हुये आरक्षण को लेकर राजनीति करना छोड़ दे और साथ ही आरक्षण में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की व��ालत बंद करके देश में ’��मतामूलक समाज व्यवस्था’ (Equalitarian Social order) की स्थापना के संवैधानिक दायित्व/उद्देश्यों की पूर्ति में पूरी तरह से सहयोग करे तो यह बेहतर होगा, यही वक्त की ज़रूरत व समय की माँग भी है।
बहन जी AC में क्यों बैठी हैं?
2000 के आसपास की बात है। उस समय मैं अपने गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ता था। उस समय जब भी कहीं चुनाव होता था, तो साथ पढ़ने वाले यादव बच्चे बहन जी को "चमारिन", काली *&#, जैसी कई जातिसूचक गालियां देते थे।
बहन जी के पोस्टरों पर गंदे-गंदे इशारे किए जाते, उनका नाम मुलायम सिंह के ���ाथ जोड़कर अश्लील और जातिसूचक गालियां द�� जातीं। मेरा गांव में कई जाति के लोग रहते हैं। गांव में चाय की दूकान पर राजनीतिक चर्चा के नाम पर सभी गैर दलित समुदाय के सभ्य से सभ्य लोग चाय की चुस्कीयां लेते हुए बहन जी पर अपमानजनक टिप्पणियां करते और खूब ठहाके लगाते। ये वही लोग थे, जिन्हें हम सम्मान से चाचा, बाबा.. कहकर बुलाते थे। देश में PM इंदिरा गांधी सहित कई महिलाएं CM एवं बड़ी नेता रही हैं लेकिन कोई उन्हें गाली नहीं देता था। सिर्फ बहन जी से ही इतनी नफरत क्यों थी? सिर्फ इसलिए क्योंकि वह दलित हैं।
बुरा तो लगता था, लेकिन तब हम छोटे थे। उस समय मुझमें इतना भावबोध नहीं था, लेकिन इतना जरूर पता था कि वह हमारे समाज की नेता हैं। हमारे बाबा एक पुराना नीला झंडा लेकर बसपा की सभी मीटिंगों और रैलियों में जाते थे। गांव के कुछ बड़े लोग मान्यवर साहब और बहन जी के संघर्षों के बारे में बताते थे। बाबा अपने मिट्टी के घर पर बड़े गर्व से बसपा का झंडा लगाते थे��� छोटी उम्र ��े ही हम सब उनका नाम सुनते ही एक खास अपनापन महसूस करते थे। जब गांव में बसपा का कोई नेता आने वाला होता, तो हम सब खुशी से नाचते हुए बहन जी के पोस्टर लगाया करते थे। रास्ते से साइकिल पर जाते हुए इन पोस्टरों को देखकर बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी ठहाके लगाकर मसखरी करते थे।
एक बार यादव समाज के लोगों ने गांव में होली मिलन समारोह रखा था। उसमें तूफानी सरोज भी आए थे। उनके सामने गायक ने मुलायम सिंह और बहन जी ���ा नाम जोड़कर मंच से एक अभद्र गीत गाया, लेकिन तूफानी सरोज सुनकर मुस्कुराते रहे, जबकि वह स्वयं दलित हैं। आज उनकी बेटी प्रिया सरोज हमारे लोकसभा क्षेत्र मछलीशहर से सांसद हैं। गांव के दलितों ने जब इसका विरोध किया तो आयोजकों ने माफी मांगी और गायक से माइक बंद करवा दिया।
वहीं, 2007 में जब बसपा की सरकार बनी, तो लोगों के बोल बदल गए। प्रेम से नहीं, डर से। अब दलितों में स्वाभिमान आ गया था। गांव में जो लोग हमा���े बुजुर्गों को "रे, बे, ते" कहकर और नाम ��िगाड़कर बुलाते थे, वही लोग सम्मान से नाम लेने लगे। अब वही यादव समुदाय के लोग बात-बात पर हंसते हुए तंज कसते थे कि, "अरे भाई, अब तो आप लोगों की सरकार है।" हालांकि अब ऐसा सुनकर बहुत गर्व महसूस होता था। यह सिर्फ मेरे बचपन की कुछ बातें हैं जो मुझे याद हैं। छात्रजीवन और आज का अनुभव बताने के लिए पूरी किताब लिखनी होगी।
लेकिन यह सब मैं आपको क्यों बता रहा हूं? इसलिए कि आप समझ सकें कि बहन जी और बसपा ने समाज को दिया क्या है। जिस रीलबाजी और हवाबाजी को आप संघर्ष समझते हैं, अपने बाप-दादाओं का नहीं तो कम से कम अपने बचपन का दौर याद करो और सोचो कि बहन जी ने उस समय कितना संघर्ष किया होगा। नफरत का आलम यह था कि नन्हे-नन्हे बच्चे तक उन्हें जातिगत गालियां देते थे। यह वह दौर था, जब सोशल मीडिया छोड़िए, समाज के अधिकांश घरों में पुराना हैंडसेट भी नहीं था। तुम्हें बहन जी के AC से दिक्कत है, तो जरा ईमान से बताओ, क्या अखिलेश यादव और राहुल गांधी छप्पर और घास-फूस की झोपड़ी में रहते हैं? या फिर अमित शाह ने चंद्रशेखर आजाद के टाइप-8 बंगले में AC की जगह फर्राटा पंखा लगवाया है?
ऐसा नहीं है कि बसपा में कमियां नहीं हैं। बसपा में अनेक कमियां हैं। इन कमियों के बारे में हम खुलकर लिखते भी हैं। इसलिए कई बार बसपा समर्थक भी मेरे बारे में बहुत अभद्र भाषा लिखते हैं, लेकिन हम इग्नोर करते हैं। हालांकि मैं बसपा का सदस्य भी नहीं हूं, लेकिन बसपा हमारी पार्टी है। हमारा घर है। अतः इन कमियों को लेकर मैंने कई बार बसपा के कोऑर्डिनेटरों को आगाह भी किया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप बहन जी के त्याग को गाली दें और उनका अपमान करें। वह हमारी आदर्श हैं, गुरूर हैं, हिम्मत हैं और स्वाभिमान हैं।
बसपा की गलती बस इतनी है कि उसकी कोई IT सेल नहीं है। पदाधिकारियों का मानो सोशल मीडिया से छत्तीस का आंकड़ा है। बसपा आज AI के युग में भी 90 के दशक में जी रही है। जिस दिन पार्टी और उसके पदाध���कारी सोशल मीडिया का महत्व समझ जाएंगे और ��ुवाओं से डायरेक्ट संपर्क बना लेंगे, उस दिन सारा पासा पलट जाएगा। उम्मीद है कि बहन जी एक दिन इस पर संज्ञान अवश्य लेंगी। बाकी बहन जी पर अनर्गल टिप्पणी करने वाले लोग या तो अबोध हैं या फिर मूर्ख। जिस दिन कभी शांति से बैठकर आत्मचिंतन करेंगे, उनका सारा भ्रम दूर हो जाएगा।
- सूरज कुमार बौद्ध
क्या लक्ष्मण यादव ने दलितों को धोखा दिया है?
लक्ष्मण यादव कह रहे हैं कि संविधान बचाने की लड़ाई अकेले सपा लड़ रही है। बसपा और चंद्रशेखर कहीं नहीं हैं।
आप वही महाशय हैं ना जो आजमगढ़ में यादव लड़की से प्रेम करने पर दलित युवक दुर्गेश की हत्या को आत्महत्या एवं संदिग्ध मौत बताते हुए लंबा-चौड़ा वीडियो बनाए थे? जबकि यादवों द्वारा दलित युवक को दी जाने वाली धमकियों एवं वीभत्स हमले के कई वीडियो भी वायरल थे। बेटे की हत्या के चलते कुछ दिन बाद दुर्गेश के पिता की भी हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। जाति का मामला आते ही आपका सारा सामाजिक न्याय कोमा में क���यों चला जाता है?
ऐसे ही, जब SC-ST उप-वर्गीकरण का मामला आया, तो आप और आपके आका लच्छेदार बातों का जलेबी बनाते हुए भाजपा के साथ खड़े रहे। मथुरा में जब आपके सजातीय यादवों ने दलित समुदाय की दो सगी बहनों की शादी में निर्मम हमला किया था, तो आपकी चालाकी पूरे समाज ने देखी थी। यहां तक कि बेटियों के पिता ने पगड़ी तक रख दी थी, लेकिन हमलावरों ने उनकी शादी तुड़वाकर ही दम लिया। उसके बाद हमने उसे राष्ट्रीय मामला बन���या और बेटियों को न्याय दिलाया। तब कहां चली गई थी आपकी संविधान बचाने वाली लड़ाई?
ये महाशय यह नहीं बताएंगे कि दलितों पर सिर्फ भाजपा के लोग ही नहीं, बल्कि स्वयं इनके सजातीय लोग भी दमन करते हैं। मुलायम सिंह यादव ने तो बाकायदा 2012 विधानसभा चुनाव के अपने घोषणा पत्र में लिखा था कि सपा की सरकार बनने पर SC-ST Act के तहत दर्ज हुए सभी मामलों को रिव्यू कराया जाएगा। सपा की सरकार बनने पर अखिलेश यादव सरकार ने अपनी ���ातीय कुंठा के चलते रिव्यू के नाम पर दलितों पर उल्टा कार्रवाई की। जांच अधिकारियों पर दबाव डालकर मामलों को प्रभावित किया ��वं दलितों पर होने वाले अत्याचार को नजरअंदाज किया। लक्ष्मण यादव जी, अगर आपने मैनिफेस्टो न पढ़ा हो, तो कहिए हम आपको भेज दें। हमारे पास हार्ड कॉपी पड़ी हुई है। अपने आकाओं के पाप का कारनामा पढ़ लीजिएगा।
यह बसपा के संघर्षों का परिणाम है कि यूपी सहित समस्त देश में दलित हर रोज समता, स्वाभिमान एवं संविधान के मूल्यों के लिए लड़ रहा है। आप संविधान और भाजपा का नाम लेकर दलितों को डराना क्यों चाहते हैं? क���या दलितों ने सपा के जातिवादी आतंक का राज नहीं झेला है? मत भूलिए कि सपा के राज में दलितों का सांस लेना भी दुभर था। हमें डराइए मत। और हां, यूपी में सपा की सरकार बनने का मतलब है दलितों पर बेतहाशा दमन एवं शासन-प्रशासन का खुला पक्षपात।
खैर, मुझे लक्ष्मण से कोई शिकायत नहीं है। वह अपनी जाति के प्रति वफादार हैं। मुझे तो दलितों की समझ पर तरस आता है कि वे आज भी हीन भावना (inferiority complex) के शिकार हैं। कोई दलित उनके लिए अपना पूरा जीवन भी त्याग दे, तो उन्हें फर्क नहीं पड़ता। लेकिन कोई उनसे ऊंची जाति का व्यक्ति अपना नाखून भी काट दे, तो वे उसकी महिमा गाने लगते हैं और उनके मुंह से "जय भीम" का नारा सुनते ही कपड़ा उतारकर नाचने लगते हैं। दलितों ने लक्ष्मण यादव जैसे जातिवादी इंसान को मंच, माइक, अवसर एवं शोहरत दी है। उन्हें उसकी सजा तो मिलनी ही चाहिए।
1. देश के SC, ST व OBC समाज के संवैधानिक/क़ानूनी अधिकारों आदि के मामले में, कांग्रेस भी गिरगिट की तरह अपना रंग बद��ने वाली यह पार्टी भी, महिला आरक्षण में, जो अब इन वर्गों की बात कर रही है, तो यही कांग्रेस पार्टी है जिसने अपनी केन्द्र की सरकार के रहते हुये किसी भी क्षेत्र में इनके आरक्षण के कोटे को पूरा कराने की कभी पहल नहीं की है।
2. तथा ना ही OBC समाज हेतु मण्डल कमीशन की रिपोर्ट के हिसाब से उन्हें सरकारी नौकरी व शिक्षा के क्षेत्र में 27 प्रतिशत आरक्षण को भी लागू किया, जिसे फिर BSP के अथक प्रयासों से पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी.पी. सिंह की सरकार में अनततः लागू किया गया था, जो सर्व���िदित है।
3. इसी प्रकार, यू.पी. में पिछड़े मुस्लिमों को OBC का लाभ देने के लिए, पिछड़ा वर्ग आयोग की जुलाई 1994 में ही आई रिपोर्ट को भी सपा सरकार ने ठण्डे बस्ते में डालकर इसे लागू नहीं किया था, जिसे फिर यहाँ बी.एस.पी. की दिनांक 3 जून सन् 1995 में पहली बनी सरकार ने इसे तुरन्त लागू किया, जो कि अब यही सपा अपना रंग बदलकर अपने राजनैतिक स्वार्थ में इनकी महिलाओं को अलग से आरक्षण देने की बात कर रही है।
4. इस प्रकार, अन्य मामलों की तरह इस मामले में भी सपा जब सरकार में नहीं है तो अलग ��वैया अपना रही है, किन्तु जब सरकार में होती है तो अलग संकीर्ण जातिवादी व तिरस्कारी रवैया अपनाती है। अतः इन सभी वर्गों को ऐसी सभी छलावा एवं दोहरे चरित्र वाली पार्टियों से हमेशा सावधान रहना होगा, तभी कुछ बेहतर संभव हो पायेगा।
5. जहाँ तक महिला आरक्षण के लिए पिछली (सन् 2011) जनगणना के आधार पर परिसीमन करने का सवाल है, तो इस बारे में यही कहना है कि यदि इसे जिन भी कारणों से जल्दी लागू करना है तो फिर इसी जनगणना के आधार पर करना है और यदि वर्तमान में कांग्रेस पार्टी केन्द्र की सत्ता में होती तो फिर यह पार्टी भी बीजेपी की तरह ही यही क़दम उठाती।
6. कुल मिलाकर, कहने का तात्पर्य यह है कि देश में SC, ST व OBC एवं मुस्लिम समाज के वास्तविक हित, कल्याण व उनके भविष्य संवारने आदि के किसी भी मामले में कोई भी पार्टी गम्भीर नहीं रही है।
7. इसीलिये महिला आरक्षण के मामले में इन वर्गों को अभी जो कुछ भी मिलने वाला है तो उसे इन���ो फिलहाल स्वीकार कर लेना चाहिये और इस मामले में आगे अच्छा वक्त आने पर इनके हितों का सही से पूरा ध्यान रखा ज��येगा अर्थात् इन्हें किसी के भी बहकावे में नहीं आना है क्योंकि इनको खुद अपने पैरों पर खड़े होकर अपने समाज को आत्मनिर्भर एवं मजबूत बनाना है। यही सलाह है।
सीखो, कुछ इससे सीखो।
यह बन्दा बहनजी पर भड़क रहा है ओर अखिलेश को दुलार रहा है।
कारण?
सजातीय पक्ष।
यह पूरे दिन;..
"धार्मिक कर्मकांड ई मनोहर कहानियां सुनाएगा लेकिन शंकराचार्य के चरणों मे हाथ जोड़कर बैठे अखिलेश जी पर एक शब्द नही कहेगा। "
लेकिन में इसका सम्मान करता हूँ क्योंकि बन्दा अपना है इसलिए अखिलेश के प्रति कृतज्ञ है। बल्���ि उससे ज्यादा जाति ई बात आने पर यादव पक्ष के साथ खड़ा मिलेगा। ��क यादव परिवार ने एक चमार जाति के रेलवे कर्मचारी को केवल इसलिए मार दिया क्योंकि वो यादव परिवार की लड़कीं से प्यार करता ताज उसमे यह बन्दा कह रहा था कि खुद जहर खाया। मतलब स्थानीय पुलिस सच्चाई बता रही और यह 800 किलोमीटर दूर से बैठकर कहानी गढ़ रहा था।
फिर भी यह उन जाटवों से ज्यादा मनोबल रखता है जो बसपा की खराब हालत पर;
"अखिलेश को माईबाप बनाने में लग गए"
विकास कुमार जाटव
लक्ष्मण यादव जैसे लोगों से दलित समाज के युवाओ�� को विशेषकर सावधान की ज़रूरत है।
क्योंकि ये लोग दलितों के द्वार लगाए गए मंचों पर देवी देवताओं पर टिप्पणियाँ करेंगे और दलित समाज के युवाओं को भड़कायेंगे ताकि दलित समाज का युवा आवेश में आकर देवी देवताओं पर टिप्पणी करे और उन पर क़ानून के तहत मुकदमा दर्ज हो जेल जाए और भविष्य बर्बाद हो।
जबकि लक्ष्मण यादव अपने समाज के लोगों के बीच में जाकर देवी देवताओं पर टिप्पणी नहीं करेगा क्योंकि क्योंकि उस�� पता है की मेरा समाज बहकावे नहीं आएगा और न ही मेरी कोई बात सुनेगा।
बाकी लक्ष्मण यादव के चेहरे नेता देवी देवताओं का स्थान बनवा रहे हैं मगर ये ज्ञान अपने नेताओं को नहीं देगा, उसको सारा ज्ञान ��िर्फ दलितों को देना है ताकि समाज कोर्ट थाने में ही उलझा रहे।
जैसाकि सर्वविदित है कि समाजवादी पार्टी (सपा) का चाल, चरित्र और चेहरा हमेशा से ही दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं बी.एस.पी.-विरोधी तथा ’बह���जन समाज’ में जन्में महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के आदर-सम्मान का नहीं बल्कि जग-ज़ाहिर तौर पर इनके अनादर, अपमान व तिरस्कार का ही रहा है, इस बारे में मीडिया सहित इनका पीडीए (PDA) भी अच्छी तरह से जानता है।
साथ ही, ’बी.एस.पी. के जन्मदाता एवं संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी की जयंती पर सपा पीडीए दिवस मनायेगी’, जो कि यह सपा की समय-समय पर की जाने वाली विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाज़ी के सिवाय कुछ भी नहीं ���ै अर्थात् सपा का इस प्रकार का व्यवहार शुद्ध रूप से इन उपेक्षित वर्गों के वोटों का स्वार्थ हेतु केवल छलावा व दिखावा है, जैसाकि अन्य विरोधी पार्टियाँ भी इन वर्गों के वोटों के स्वार्थ की ख़ातिर अक्सर कई मौकों पर ऐसे ही दिखावा व छलावा आदि करती हुईं नज़र आती हैं।
वास्तव में दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग व बी.एस.पी.-विरोधी रवैये के साथ-साथ बहुजन समाज में जन्में महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के अनादर, अप���ान व तिरस्कारी रवैये तथा इन वर्गों के शोषण, अत्याचार व जुल्म-ज़्याद��ी आदि का लम्बा इतिहास है, जिसे कभी भी भुलाया जाना मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव लगता है।
वैसे सपा के इस जातिवादी इतिहास की शुरूआत ख़ासकर सन 1993 में सपा व बी.एस.पी. की गठबंधन से होती है जब गठबंधन सरकार तथा दलित एवं अन्य कमजोर वर्गों के लोगों पर अन्याय-अत्याचार रोकने की पहली शर्त के बावजूद तत्कालीन सीएम श्री मुलायम सिंह यादव ने अपना रवैया नहीं बदला और जिसके फलस्वरूप अन्ततः बी.एस.पी. को दिनांक 1 जून सन 1995 को सपा सरकार से अपना समर्थन वापस लेना पड़ा था और फिर उसके बाद दिनांक 2 जून सन् 1995 को लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस काण्ड कराकर मेरे ऊपर जो जानलेवा हमला कराया गया वह सब काली क्रूरता सरकारी रिकार्ड के साथ-साथ इतिहास के पन्नों में भी दर्ज है।
इसी प्रकार, बहुजन समाज में जन्में महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के अनादर, अपमान व तिरस्कारी रवैये की भी काफी लम्बी श्रंखला है, जिसमें सपा को सत्ता में बैठाने वाले ख़ासकर मान्यवर श्री कांशीराम जी के आदर-सम्मान से जुड़े मामले में उनके नाम पर नया ज़िला बनाने को सपा सरकार द्वारा बदल दिया गया था।
और जब बी.एस.पी. की सरकार ने कासगंज को ज़िला मुख्यालय का दर्जा व सम्मान देते हुये कांशीराम नगर नाम से नया ज़िला बनाया, तो यह वर्तमान सपा मुखिया श्री अखिलेश यादव के भी गले के नीचे से नहीं उतरा जिसे फिर सपा ने अपनी सरकार बनते ही अपनी घोर जातिवादी व द्वेषपूर्ण नीति एवं दलित विरोधी रवैया अपनाते हुये अन्य ज़िलों व संस्थानों आदि के नामों की तरह इसका नाम भी बदल दिया, जो कि बहुजन समाज के साथ विश्वासघात नहीं तो और क्या है?
इतना ही नहीं बल्कि सर्वसमा��� में से ख़ासकर ग़रीबों, दलितों, अन्य पिछड़े वर्गाें एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों आदि को साथ मिलाकर इन्हें सत्ता की मास्टर चाबी दिलाकर इन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के मिशन के लिये अपना पूरा जीवन इसी संघर्ष में लगा देने वाले मान्यवर श्री कांशीराम जी की दिली ख़्वाहिश के मुताबिक बी.एस.पी. की सरकार ने जब पूर्वांचल में वाराणसी के पास भदोही में महान संतगुरु के नाम पर संत रविदास नगर नाम से नया ज़िला ���नाया, तो उसे भी सपा सरकार ने अपनी जातिवादी व बी.एस.पी. विरोधी रवैया अपनाते हुये बदल दिया था।
साथ ही, मुस्लिम समाज को दिये गये वादे के मुताबिक मान्यवर श्री कांशीराम जी के नाम से नया उर्दू-फारसी अरबी यूनिवर्सिटी लखनऊ में आईआईएम के पास बनाया गया, जिसका भी नाम सपा सरकार ने बदल डाला और ��ब जिसे भाजपा सरकार ’लैंगवेज यूनिवर्सिटी’ के रूप में प्रचारित करती है।
सहारनपुर में भी मान्यवर श्री कांशीराम जी के नाम पर बनाये गये सरकारी अस्पताल का नाम भी सपा सरकार ने बदल दिया। क्या यही सब है सपा का मान्यवर श्री कांशीराम जी के प्रति आदर व सम्मान?
इसके अलावा, अपने इस दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग व बहुजन समाज विरोधी कृत्यों के साथ-साथ सपा का रवैया मुस्लिम विरोधी भी रहा है। कांग्रेस पार्टी की तरह ���ी सपा की सरकारों में भी काफी घातक साम्प्रदायिक दंगों में भारी जान-माल की हानि के साथ-साथ लाखों परिवार प्रभावित हुये हैं।
हक़ीक़त में सपा के भड़काऊ आचरण आदि के कारण बीजेपी को राजनीतिक रोटी संेकने का भरपूर मौक़ा मिलता रहा और इस प्रकार सपा व भाजपा दोनांे एक-दूसरे की ज़रूरत बनकर यहाँ जातिवादी व साम्प्रदायिक राजनीति करते रहे और जिसका परिणाम है यूपी में भाजपा का राज और उससे पीड़ित मुस्लिम व बह��जन समाज तथा साथ ही हर प्रकार से त्रस्त प्रदेश की करोड़ों आमजनता है।
कुल मिलाकर, सपा का दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग, मुस्लिम व बहुजन समाज विरोधी जो जातिवादी व साम्प्रदायिक रवैया शुरू से अभी तक भी रहा है तो यह किसी से छिपा नहीं है।
इसके साथ ही सपा, लोगों को इस बात का भी जवाब दे कि बहुजन नायक म���न्यवर श्री कांशीराम जी को उनके जीते-जी आदर-सम्मान देना तथा बहुजन एकता के लिये उनके योगदान की सराहना करना तो बहुत दूर, बल्कि उनके देहान्त के बाद एक दिन का भी राजकीय शोक घोषित करके उन्हें श्रद्धांजलि आदि क्यों नहीं अर्पित की गयी थी? सपा बहुजन समाज को जवाब दे।
अतः सपा के इन सब दलित विरोधी व जातिवादी कृत्यों को ध्यान में रखकर बहुजन समाज के लोगों को हमेशा सावधान रहना ��ाहिये, यही बी.एस.पी. की अपील है। धन्यवाद। जय भीम, जय भारत।
ब्राह्मण पंडित ने "छत्रपति शिवाजी" को शुद्र होने की वजह से मन्दिर में जाने नही दिया था।
यह क्लिप 1952 में मराठी मे बनी फिल्म "छत्रपति शिवाजी" से ली गई है।।
छत्रपति शिवाजी का नाम आदर से लिया जाता है और एक तरफ उन्हें मन्दिर में जाने नही दिया गया।
विकास कुमार जाटव
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी द्वारा देश के सरकारी व निजी विश्वविद्यालयों मे जातिवादी घटनाओं को रोकने के लिए जो नये नियम लागू किये गये है, जिससे सामाजिक तनाव का वातावरण पैदा हो गया है। ऐसे वर्तमान हालात के मद्देनजर रखते हुये माननीय सुप्रीम कोर्ट का यूजीसी के नये नियम पर रोक लगाने का आज का फैसला उचित
जबकि देश में, इस मामले में सामाजिक तनाव आदि का वातावरण पैदा ही नहीं होता अगर यूजीसी नये नियम ��ो लागू करने से पहले सभी पक्ष को विश्वास में ले लेती और जाॅच कमेटी आदि में भी अपरकास्ट समाज को नेचुरल जस्टिस के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती।
1.देश की उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी भेदभाव के निराकरण/समाधान हेतु विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी, द्वारा सरकारी कॉलेज एवं निजी यूनिवर्सिटियों में भी ’इक्विटी कमेटी’ (समता समिति) बनाने के नये नियम के कुछ प्रावधानों को सामान्य वर्ग के केवल जातिवादी मानसिकता के ही लोगों द्वारा इसे अपने विरुद्ध भेदभाव व षडयंत्रकारी मानकर इसका जो विरोध किया जा रहा है, तो यह कतई भी उचित नहीं है।
2. जबकि पार्टी का यह भी मानना है कि इस प्रकार के नियमों को लागू करने के पहले अगर सभी को विश्वास में ले लिया जाता तो यह बेहतर होता और देश में फिर सामाजिक तनाव का कारण भी नहीं बनता। इस ओर भी सरकारों व सभी संस्थानों को ज़रूर ध्यान देना चाहिये।
3. साथ ही, ऐसे मामलों में दलितों व पिछड़ों को भी, इन वर्गों के स्वार्थी व बिकाऊ नेताओं के भड़काऊ बयानों के बहकावे में भी क़तई नहीं आना चाहिये, जिनकी आड़ में ये लोग आएदिन घिनौनी राजनीति करते रहते हैं अर्थात् इन वर्गों के लोग ज़रूर सावधान रहें, यह भी अपील।