साधनों के मध्य रहने वाले बहुधा साधना के महत्व को विस्मृत कर देते हैं। उनकी मति पर भ्रम का आवरण चढ़ जाता है। परिणामस्वरुप उनकी दृष्टि इस लौकिक जगत में विद्यमान अलौकिक शक्तियों को देख पाने में असमर्थ हो जाती है।
किसी के धर्म को खंडित करके अपने धर्म की रक्षा नहीं होती। धर्म को ध्वस्त और खंडित करने के प्रयास में व्यक्ति स्वयं ही ध्वस्त और खंड-खंड हो जाता है , क्योंकि धर्म पक्षपाती नहीं होता। किसी के धर्म पर किया गया प्रहार स्वयं की जड़ पर किए गए प्रहार के जैसा होता है..!
परमात्मा का जगत सरल रेखा में नहीं ,वृताकार है। इसमें न तो कोई किसी के आगे चल रहा होता है और न ही कोई किसी के पीछे। क्योंकि सभी एक-दूसरे के आगे पीछे चल रहे हैं इसलिए जो अग्रगामी है , वही अनुगामी है व जो अनुगामी है , वही अग्रगामी भी है।
कोई भी वृत्त तभी व्यवस्थित रूप से...
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मिथ्याचारी अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए सत्य का आश्रय लेते हैं। वे सत्य का रूप धारण करके संसार के समक्ष उपस्थित होते हैं , जिससे संसार को उनके सत्य होने का भ्रम उत्पन्न हो जाता है। इसलिए हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि सत्य के पक्ष में खड़े हुए लोग सदैव सत्य नहीं होते हैं।