''अब ये आंदोलन हिसाब लेने पर उतर आया है.''
दिल्ली के जंतर मंतर पर 23 दिन तक भूख हड़ताल पर रहीं आइसा लीडर नेहा ने बीबीसी से बात की है. देखिए ये पूरी बातचीत.
रिपोर्टर: सुमेधा पाल
शूट एडिट: रुबाइयत बिश्वास
अखिलेश यादव जी की गिरफ्तारी के बाद कुछ ही मिनट में रेड आर्मी ने पूरे प्रदेश को जाम कर दिया..
उधर दिल्ली में जिस बस में अखिलेश जी को गिरफ्तार करके पुलिस ले जा रही थी समाजवादियों ने उसको ही गिरफ्तार कर लिया था..😎
प्रयागराज में सड़कों पर समाजवादी पार्टी🔥
अखिलेश यादव जी के गिरफ्तारी के विरोध में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता सुभाष चौराहे पर इकट्ठा होकर प्रदर्शन कर रहे है।
मोदी सरकार ने राहुल गांधी और अखिलेश यादव को गिरफ्तार करके कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है।
राकेश टिकैत का साफ़ संदेश!
ट्रैक्टर भी तैयार हैं, किसान भी तैयार हैं। अगर ज़रूरत पड़ी तो जंतर-मंतर से ही बड़ा आंदोलन खड़ा होगा। आवाज़ दबेगी नहीं, और बुलंद होगी!
साहब... देखना नहीं, इसे करवा दीजिए! न्याय करवा दीजिए!" 13 साल के अमिताभ की बेबाक गुहार ने तहसील दिवस में सबका ध्यान खींच लिया।
लखीमपुर खीरी के तहसील दिवस में 13 वर्षीय कक्षा-8 के छात्र अमिताभ ने अकेले डीएम के सामने पहुंचकर अपने घर पर अवैध कब्जे की शिकायत की। बच्चे की बेबाक बात और हाजिरजवाबी ने सभी का ध्यान खींच लिया। डीएम ने जांच कर कार्रवाई के निर्देश देते हुए छात्र को पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह दी।
क्या आपको इकॉनोमिक्स जटिल लगती है? चिंता नहीं! इंडियन एक्सप्रेस में अर्थशास्त्र के विषयों को एक्सप्लेन करते हैं, उदित मिश्रा. हमने उनसे मांगी सलाह. क्या? कि तीन ऐसी किताबें बताइए सर जो हमें सरल, सहज और स्पष्ट तरीके से अर्थशास्त्र समझा दे. उन्होंने अपनी Book Recommendations दे दी हैं. सेम सवाल आपसे भी है, अब आपकी बारी?
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टी. एन. शेषन देश के मुख्य चुनाव आयुक्त थे। एक बार वे अपनी पत्नी और सुरक्षा दल के साथ उत्तर प्रदेश के दौरे पर जा रहे थे। रास्ते में उनकी पत्नी की नज़र एक पेड़ पर लटक रहे सुंदर बया के घोंसले पर पड़ी।
घोंसला इतना आकर्षक था कि उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“यह घोंसला मुझे ला दीजिए, घर सजाने के काम आएगा।”
शेषन साहब ने तुरंत अपने एक सुरक्षाकर्मी को घोंसला उतार लाने का निर्देश दिया।
सुरक्षाकर्मी ने पास ही भेड़-बकरियाँ चरा रहे एक किशोर को बुलाया और कहा,
“बेटा, यह घोंसला उतार दो। दस-बीस रुपये मिल जाएंगे।”
लेकिन लड़के ने बिना एक पल सोचे साफ़ इनकार कर दिया।
सुरक्षाकर्मी ने पैसे बढ़ाने की बात भी कही, पर वह टस से मस नहीं हुआ। आखिरकार उसने लौटकर सारी बात शेषन साहब को बता दी।
यह सुनकर शेषन साहब स्वयं कार से उतरे और उस किशोर के पास पहुँचे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
“अगर तुम यह घोंसला उतार लाओगे तो मैं तुम्हें दस नहीं, पूरे पचास रुपये दूँगा।”
लड़के ने फिर भी विनम्रता से मना कर दिया।
शेषन साहब ने हैरानी से पूछा,
“इतने पैसे भी नहीं चाहिए? आखिर क्यों?”
किशोर ने मासूमियत से घोंसले की ओर देखा और बोला,
“साहब, इस घोंसले में छोटे-छोटे बच्चे हैं। शाम को उनकी माँ उनके लिए दाना लेकर आएगी। अगर घोंसला ही नहीं मिलेगा, तो उसे कितना दुख होगा। चाहे आप जितने भी पैसे दे दें, मैं यह घोंसला नहीं उतारूँगा।”
उस अनपढ़ चरवाहे के इन सरल शब्दों ने देश के सबसे शक्तिशाली अधिकारियों में से एक टी. एन. शेषन को भीतर तक झकझोर दिया।
बाद में इस घटना का उल्लेख करते हुए शेषन साहब ने लिखा
“आज भी मुझे इस बात का अफसोस होता है कि एक उच्च शिक्षित आईएएस अधिकारी होने के बावजूद मेरे मन में वह संवेदना क्यों नहीं थी, जो उस अनपढ़ किशोर के मन में थी। उस दिन मेरी डिग्रियाँ, मेरा पद, मेरी प्रतिष्ठा और मेरा अहंकार—सब उस बच्चे की करुणा के सामने छोटे पड़ गए। उसने मुझे सिखाया कि बुद्धि, पद और धन तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ संवेदनशीलता भी हो।
- सोशल मीडिया से साभार