Twitter X पर मुस्लिम समाज के लौंडे मेरी बात गौर से sune
> ध्रुव राठी जर्मनी में रहते हैं,
>अभिजीत दिपके अमेरिका में रहते हैं,
>और अप्रीत शर्मा ऑस्ट्रेलिया में रहता है।
उर्दू नाम वाले. मैं भी कॉकरोच मैं भी कॉकरोच करने से बचे बिल आप के नाम फटेंगे, ज़मानत के लिये जज साहब तारीख़े बढ़ाएंगे और घरवाले परेशान होंगे be careful 🙏🏼 shear
क़ुरआन में बयान की गई हज़रत ज़ुलक़रनैन की कहानी सिर्फ़ एक वाक़िया नहीं, बल्कि इंसानी ज़िंदगी, ताक़त और इम्तिहान का गहरा पैग़ाम है !
मग़रिब में उन्हें एक ताक़तवर और तरक़्क़ी-याफ़्ता क़ौम मिली, लेकिन जब ताक़त के साथ ख़ुदा का ख़ौफ़ नहीं होता, तो वहाँ गुरूर और ज़ुल्म पैदा होता है ! ज़ुलक़रनैन ने वहाँ इंसाफ़ क़ायम किया, ज़ालिमों को सज़ा दी और कमज़ोरों का साथ दिया !
मशरिक में उन्होंने एक कमज़ोर और बेबस क़ौम देखी, जिनके पास न टेक्नोलॉजी थी, न मज़बूत इंफ्रास्ट्रक्चर ! उन्होंने उन्हें सिर्फ़ दुआ नहीं दी, बल्कि अमल सिखाया, लोहे और आग के ज़रिये दीवार बनवाई, यानी उन्हें अपने बचाव के क़ाबिल बनाया !
याजूज-माजूज और दीवार के बारे में अलग-अलग तफ़्सीरें हैं, लेकिन असली सबक़ ये है कि क़ुदरत का निज़ाम भी उन्हीं का साथ देता है जो खुद मेहनत करते हैं !
हज़रत ज़ुलक़रनैन ने उन कमज़ोर लोगों की मदद के लिए कोई तावीज़ नहीं दिया था, न ही कोई जादू की छड़ी घुमाई थी, और न ही सिर्फ़ दुआएँ की थीं ! उन्होंने उसी कमज़ोर और रोती हुई क़ौम से कहा था कि: “मुझे लोहे के तख़्ते ला कर दो” और फिर कहा “आग धधकाओ” !
ज़ुलक़रनैन ने उन्हें इंजीनियरिंग सिखाई, उन्हें मेहनत में डाला और उन्हीं मज़लूमों के हाथों से वह नाक़ाबिल-ए-तस्ख़ीर दीवार बनवाई ! उन्होंने उनके अंदर का डर ख़त्म करके उन्हें अमली तौर पर अपने बचाव के क़ाबिल बनाया !
ख़ुदा की मदद सिर्फ़ वहाँ उतरती है जहाँ बाज़ुओं में हरकत और दिमाग़ में शऊर हो ! “बेशक अल्लाह किसी क़ौम की हालत नहीं बदलता, जब तक वह खुद अपनी हालत न बदलें!” जिस दिन मशरिक के लोग अपनी खोखली जज़्बातियत से बाहर निकलकर, अपनी मआशियत, टेक्नोलॉजी और इत्तेहाद का “लोहा और तांबा” पिघला कर अपनी दीवार खुद बनाना शुरू कर देंगे, ख़ुदा की मदद उसी माइक्रो सेकंड में उनके साथ शामिल हो जाएगी !
ख़ुदा रोने वालों, शिकवे करने वालों और हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वालों की नहीं, बल्कि अमल के मैदान में उतर कर अपना लोहा मनवाने वालों की मदद करता है ! जब तक आप अपना लोहा खुद नहीं पिघलाएँगे, कोई ज़ुलक़रनैन आपकी दीवार बनाने नहीं आएगा !
ये सर पर टोपी, सफेद दाढ़ी वाला, 70 साल का शख़्स अपनी ज़वानी से लेकर बुढ़ापे तक, बल्कि अपने मरने के आखिरी सांस तक चिंखता रहा कि...निज़ाम बदलो ,,, निज़ाम बदलो
तुम्हारी नस्लें तबाह हो जाएगी
तुम्हारा ईमान तबाह हो जाएगा
लोगों को उस वक़्त बता रहा था जब मोबाइल ईजाद नहीं हुआ था,और ना ही इंटरनेट का कोई माहौल था 2G, 4G ना ही स्नेक विडियो
टिक टॉक, स्नैपचैट, फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम कुछ भी नहीं था
हां उस वक़्त औरत मार्च भी नहीं था सबसे बढ़कर ये के टीवी में चाय साबून के ऐड में औरत नहीं नाचती थी
तब ये शख़्स हमें बता रहा था कि तुम्हारे ईमान और इस्लाम को जिब्हा करने की तैयारियां की जा रही है🥺
बाहर निकलो इस निज़ाम को बदलो, मगर मजाल है कि किसी मुसलमान हुक्मरान के कान पर जूं तक रेंगी हों
डॉ इसरार अहमद (रह०) अल्लाह आप पर करोड़ों रहमतें नाजिल करें.. आमीन
क्या पहाड़ सिर्फ पत्थर हैं… या दूसरी दुनिया का 🌌 एक छुपा हुआ दरवाज़ा ?
क़ुरआन, इंजील और तौरात, एक ही सच की तरफ़ इशारा करते हैं… नबी… वही… चमत्कार… सब पहाड़ों से क्यों जुड़े हैं…?
क्या ये सिर्फ़ एक इत्तेफाक है… या कोई hidden gateway…? 👇
20 Ramzan ul Mubarak yaum e fatah Mecca 🕋
Fatah Mecca me kuffar par galba pakar rahmat e do Àlam ﷺ ne farmaya mai aaj tumhe wahi baat kahta huñ jo mere bhai Yusuf Àaihissalaam ne apne bhaiyoñ ke bare me kahi thi aaj meri taraf se +