भरत तिवारी अपराधी नहीं था।
भरत तिवारी RTI एक्टिविज्म के नाम पर प्रशासन का दलाल भी नहीं था।
भरत तिवारी को बाहुबली बनने का ख़्वाब भी नहीं था।
भरत तिवारी नैसर्गिक ब्राह्मण हृदय का लड़का था। जो स्वयं लोअर मिडल क्लास से आने के बावजूद ख़ुद से ग़रीब तबके के लिए चिंता में मारा गया।
जो हरकत किया वह कोई सनकी ही कर सकता है। जिसके हृदय को नफ़ा-नुकसान का इल्म हो जाए वो क्यों उन्हीं अनुसूचित जाति के लोगों यादवों, चंद्रवंशियों के लिए क्रांतिकारी बनने की क्यों सोचेगा। जिनके जातीय संगठन उसे अपने घोषित दुश्मन की तरह देखते हैं।
जब एसडीएम से मिट्टी भरवाने को लेकर उसका विवाद हुआ तो स्वयं उसके बाप ने पहले जाकर थाने में गुहार लगाई कि उसे पकड़ लो तो थाना ने पहले उसके बाप को ही बैठा लिया।
लगातार आवेदन देने और प्रशासन से टकराने के वजह से प्रशासन आलरेडी उसका इतना उत्पीड़न कर चुका था कि मजबूरी में उसे असलहा खरीदना पड़ गया।
अपने कई वीडियो में वह पहले भी कह चुका है कि उसे मौत की चिंता नहीं है लेकिन इन लोगों को वापस बाढ़ में से निकालकर फिर से बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र में ही बसाया जाएगा तो उसके लिए लड़ते हुए मरना उसे कबूल है। आखिर में वह लड़ते हुए ही मारा गया।
उसकी आखिरी इच्छा थी कि उसके शरीर का अंगदान कर दिया जाए। पहली प्राथमिकता भारतीय सेना , दूसरा भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था और तीसरे ग़रीब लोग थे। उसकी यह इच्छा अधूरी ही रही।
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वह तो मर गया लेकिन राष्ट्रीय मीडिया के कंटेंट क्रिएटर्स को नंगा कर गया। जो सरकार के विज्ञापनों से पेट पालते हुए हजारों जमानियाँ गांव और लाखों बिहारी अस्थाई विस्थापितों की ओर देखना भी गँवारा नहीं समझते।
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वह तो मर गया लेकिन पक्ष-विपक्ष दोनों ओर के नेताओं को नंगा कर गया जो गरीब-गरीब जपकर अपने कोठी-बंगलों की लड़ाई लड़ते हैं।
यह भी बता गया कि शाहपुर में विश्वेश्वर ओझा के घर राकेश ओझा जैसा हिज़ड़ा पैदा हो गया है, जो दोषी पुलिसकर्मियों और SDM पर 302 के मुकदमें भी नहीं लिखवा सकता।
झारखंड के आदिवासी इलाकों में चर्च की बढ़ती संख्या पर मेरे बयान से काफी हंगामा हुआ। अपना धर्म बदल चुके कई लोग इस बात से परेशान हैं कि मैने सिर्फ चर्च की बात की, मंदिरों की नहीं। चलिए, आज इस मुद्दे पर विस्तार से बात करते हैं।
झारखंड के अधिकतर गांवों में आदिवासी-मूलवासी एक साथ रहते हैं। हमारे गांवों में हजारों सालों से जाहेरस्थान/ सरना स्थल/ देशाउली/ मांझी थान है और सनातन समाज के मंदिर भी, जिनमें मूलवासी पूजा करते हैं। आदिवासी- मूलवासी दोनों समुदाय एक दूसरे के पूजा स्थलों में सिर झुकाते हैं, एक-दूसरे के पर्व - त्योहारों में शामिल होते हैं और दोनों सबकी आस्था का सम्मान करते हैं।
इसके अलावा दिउड़ी मंदिर, रंकिणी मंदिर जैसे कई मंदिर हैं, जहाँ आदिवासी समाज के पाहन पुजारी की भूमिका में होते हैं, और सनातनी लोग भी वहाँ पूजा करते हैंं। ठीक उसी प्रकार, हम भी उनके पर्व-त्योहारों में शामिल होते हैं। लेकिन एक दूसरे के धार्मिक स्थलों एवं परंपराओं का यह परस्पर सम्मान हमारी आस्था, हमारी जीवन शैली को कभी नहीं बदलता।
हम आदिवासी पेड़ के नीचे बैठ कर पूजा करने वाले लोग हैं, और जन्म से लेकर शादी-विवाह एवं मृत्यु तक, हमारी बिल्कुल स्पष्ट जीवनशैली है। बच्चे के जन्म, नामकरण, विवाह समेत जीवन के सभी महत्वपूर्ण पड़ावों पर, हमारी सामाजिक प्रक्रियाएं मांझी परगना/ नायके/ पाहन/ मानकी/ मुंडा/ पड़हा राजा आदि पूरी करवाते हैं। जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर हम जाहेरस्थान/ सरना स्थल/ देशाउली/ मांझी थान जाकर मरांग बुरु/ सिंगबोंगा की पूजा करते हैं।
हजारों सालों के इस सामाजिक सह-अस्तित्व में हम लोग एक-दूसरे के हर सुख-दुख के साथी बने, यथासंभव सहयोग किया, लेकिन उन्होंने कभी हमें हमारी आस्था या जीवनशैली बदलने के लिए मजबूर नहीं किया। अभी धर्मांतरण की रफ्तार देख कर लगता है कि अगर उन्होंने ऐसा किया होता, तो शायद हमारी संस्कृति बहुत पहले खत्म हो गई होती।
हजारों सालों के हमारे इतिहास में, आपको ऐसा कोई भी मूलवासी/ सनातनी नहीं मिलेगा, जिसने किसी मदद, सहायता या सहयोग के बदले, अथवा हमें लालच/ धमकी देकर हमारे लोगों का धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश की हो। वे कभी स्वयं को आदिवासी नहीं बताते। वे लोग आरक्षण समेत हमारे समाज को मिले अन्य अधिकारों को छीनने अथवा उसमें अतिक्रमण करने भी प्रयास नहीं करते, तो फिर उनसे कैसा बैर?
दूसरी तरफ, इस क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों ने 1845 में धर्म प्रचार शुरू किया, लेकिन मात्र 180 वर्षों में इन्होंने हमारी परंपराओं एवं धार्मिक आस्था पर चोट पहुंचाई, आरक्षण पर कब्जा किया, भाषाओं/ लिपियों का विरोध किया तथा हमारे अस्तित्व को मिटाने की हर संभव कोशिश की। हमारे लाखों लोगों का धर्मांतरण कर के इन्होंने ऐसे हालात बना दिये हैं कि सिमडेगा समेत झारखंड के कई हिस्सों में हमारे जाहेरस्थानों/ सरना स्थलों पर ताला लग चुका है, क्योंकि वहाँ धर्मांतरण की वजह से पूजा करने वाला कोई नहीं बचा।
आदिवासी समाज की पहचान पारंपरिक जीवनशैली, विशिष्ट संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज एवं रूढ़िजन्य परम्पराओं से है, लेकिन ये लोग उसे मिटाने में लगे हुए हैं। ये लोग DNA की बात करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि इन्हीं मिशनरियों की वजह से दुनिया के कई हिस्सों में आदिवासी संस्कृति विलुप्त हो गई।
लैटिन अमेरिका की अयोरेओ जनजाति, केन्या की संबुरु जनजाति, ब्राजील की वाई वाई जनजाति, फिजी और पैसिफिक आइलैंड्स की जनजातियां धर्मांतरण के बाद अपनी मूल संस्कृति को भूल चुकी हैं। उनके पारंपरिक रीति-रिवाज, त्योहार, भाषा, नृत्य, पूजा-पाठ और सामाजिक संरचनाएं खत्म कर दिए गए। आप खुल कर क्यों नहीं कहते कि भारत में भी आपका असली मकसद यही है?
धर्मांतरण कोई राजनैतिक मुद्दा नहीं, बल्कि हमारे समाज के अस्तित्व से जुड़ा मामला है। अगर धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, वीर सिदो कान्हू, वीर पोटो हो, वीर टाना भगत, वीर तेलंगा खड़िया एवं अन्य मार्गदर्शकों के दिखाए राह पर चलते हुए अगर हम लोग अपनी परंपराओं को नहीं बचाएंगे तो भविष्य में हमारे जाहेरस्थानों, सरना स्थलों, देशाउली आदि में पूजा करने वाला कोई नहीं बचेगा। हमारा अस्तित्व ही खत्म हो जायेगा। (Part 1/2)
Thank you @adgmeerut sir for the prompt action. Requesting @bulandshahrpol to kindly share an update or details of the action/investigation initiated against these individuals for public safety. Thank you."
@CMOofficeUP
@UPGovt
@bulanshahrpol
@digrangemeerut@adgzonemeerut
#बुलंदशहर : हथियारों के साथ व्यक्तियों के फोटो वायरल , हथियारों के साथ फोटो खींचकर वायरल करने का बनाया ट्रेंड , पुलिस/प्रशासन का नहीं दिखाई दे रहा शायद कोई खौफ ।
खुर्जा नगर कोतवाली क्षेत्र की जंक्शन चौकी क्षेत्र के बताए जा रहे सभी हथियार लिए व्यक्ति ।
@Uppolice@bulandshahrpol
नरेंद्र मोदी और पुतिन के प्रेस कोन्फ़्रेंस का एक विडिओ है। जहां पत्रकार पूछता है कि अमरीका-रूस के तनाव मे वह भारत का स्टैन्ड क्या देखते हैं। नरेंद्र मोदी कहते हैं कि अमरीका और रूस दोनों बहुत ताकतवर देश हैं , उनके मसले मे भारत वकील नहीं बन सकता है। जिसपे पुतिन प्रहसन करते हैं कि भारत सभ्यतागत रूप से इतना तहदार जवाब लेकर आएगा कि प्रेस कभी उसका स्टैन्ड पकड़ नहीं पाएगा। मगर नरेंद्र मोदी के व्यक्तव्य से साफ था कि उनके विदेश नीति का सिर्फ एक मकसद है भारत का राजनयिक , सामरिक और व्यापारिक लाभ। दुनिया मे क्या उथल-पुथल है, भारत उसपे स्टैन्ड लेने का लालच मे दिखास की बीमारी लेकर नहीं चल सकता है। उसके पास विकास का एक लक्ष्य है और डेढ़ अरब लोगों के पेट मे ईंधन पहुंचाने का दायित्व है।
जब युद्ध छिड़ा और स्ट्रैट ऑफ होरमुज के वजह से सप्लाइ चेन डिस्टर्ब हुआ तो पैनिक में लोग सीधे कुव्यवस्था फैलाने पर उतर आए। कुछ मेजर नहीं मिला तो गैस के लाइन मे ही लग गए। पिछले हफ्ते मैं पेट्रोल पम्प पे गया तो भारी कतार लगी हुई थी , सभी टंकी फुल करवा रहे थे। मुझे अंदर से यहीं अंदेशा था कि आम आदमी खुद से अपने लिए कुव्यवस्था तैयार करने मे लगा है। मेरी कार की टंकी फुल रहती है तो मैं थोड़ा-बहुत हिसाब किताब लगा के घर चला आया। मगर घर पे शांति से नहीं रहा जा रहा था कि कहीं वाकई पेट्रोल खत्म हो गया तो मेरी बाइक खाली ही है। जिन लोगों को मैं बेवकूफ समझ रहा , वहीं असली समझदार साबित हो जाएंगे। फिर एकाध पेट्रोल पम्प वाले परिचित रिश्तेदारों को भी फोन घुमा लिया। उन्होंने कहा स्टॉक फूल है और लगातार सप्लाइ आ रहा , कोई टेंशन कि बात नहीं है। फिर भी रहा नहीं गया और रात 11 बजे जाकर बाइक कि टंकी फुल करवा आया। अब स्तिथि यह है कि सारे पेट्रोल पम्प सुनसान पड़े हैं क्योंकि लोग महीनों कि खपत एक दिन मे पूरा कराके चले गए है। अब सब के अंदर चैन आ गया है।
पेट्रोल का मामला तो सुलझ गया मगर गैस का मामला थोड़ा उलझ गया है। उसका एक कारण है , बकौल एक गैस अजेंसी व्यापारी पहले वे लोग खुद से किसी ग्राहक का बुकिंग कम्प्लीट कर देते थे। और उसका सिलेंडर मार्केट मे भेज देते थे। गैस के फुटकर व्यापारी थोक मे ऐसे सिलेंडर लेकर जाते थे और वहाँ से छोटे सिलेंडर वाले भरवाते थे , मगर जब कुव्यवस्था फैली तो सरकार ने ग्राहक से otp मिलने के बाद ही बुकिंग कम्प्लीट होने का नियम बना दिया। अब जो शुरू मे व्यापारी थोक मे सिलेंडर लोगों को दे चुके हैं , उनका स्टोरेज सरकार के पोर्टल मे खाली ही नहीं दिख रहा तो वो चाहकर भी नए स्टॉक का नंबर नहीं लगा पा रहे। और आम आदमी अपनी चालाकी मे कुव्यवस्था का शिकार हो गया है।
मेरे एक चाचा से बात हो रही थी , उन्होंने कहा कि उनके पास तीन सिलेंडर थे तीनों भरवा लिया हूँ। बहन इंडिया नहीं रहती , उसके घर भी दो सिलेंडर पड़े हैं , चाभी मँगवाया हूँ जाकर वो भी ले आऊँगा। पाँच सिलेंडर मे साल निकल जाएगा , ऊपर से गाँव के बघार में सूखा लकड़ी का जलावन एक टायर पड़ा हुआ है। कोई दिक्कत नहीं होगा। सुनकर जानपड़ा कि ईरान से आला जंग की तैयारी तो इनकी है। उप्र से एक आदमी पकड़ा गया , जिसने पच्चीस सिलेंडर इकट्ठा कर रखा था। ऐसे लोगों ने ऐसी कुव्यवस्था फैला दी कि शहरों में रहने वाले छोटे-सिलेंडर वाले छात्रों और ठेले-व्यापारियों के लिए रहना मुश्किल हो गया।
इसीलिए भारत कि महान जनता जो देशभक्त है , ईमानदार है , कर्तव्यनिष्ठ है , प्रज्ञावान है उनसे विनम्र निवेदन है कि कृपया वह थोड़ा धैर्यवान भी बने और संकट के स्वयं का लंका लगवाने के दिशा मे मेहनत न करे। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार संकट के समय मे अपना बेस्ट दे रहे हैं। किसी भी तरह का कुव्यवस्था सरकार के रवैये से आया हो अभी तक ऐसा नहीं दिख रहा है। अगर हम लोग mature बिहैव नहीं करेंगे तो भुगतेंगे जमीन पर हम ही , नरेंद्र मोदी या उनके मंत्री के दैनिक जीवन पर इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला।
आज भगत सिंह के फाँसी चढ़ने का दिन है। साथ ही नेहरू और गांधी से धक्का-पेल प्रश्न पूछने का भी दिन है, तुम लोगों ने भगत सिंह को फांसी चढ़ने से क्यों नहीं बचाया।
पूछने में सबसे आगे नागपुरिया संघी और बहुजन रहते हैं। जबकि इनसे आजादी पे प्रश्न पूछो तो दोनों के पास सेम टेम्पलेट है , एक कहेगा कि हम हिंदुओं की रक्षा की सोच रहे थे और दूसरा कहेगा की हम बहुजनों की आजादी का सोच रहे थे।
सच्चाई यहीं है कि आजादी की लड़ाई सिर्फ कांग्रेस लड़ रही थी। अंबेडकर और मुस्लिम लीग को तो अंग्रेजों ने कांग्रेस से लड़ने के लिए खड़ा किया था। वहीं संघ और हिंदू संगठन इनके प्रतिक्रिया में उठ खड़े हुए थे। मगर इन सबका मकसद कांग्रेस से लड़ना था।
इसीलिए आज़ादी की लड़ाई में कहीं दूर-दूर तक यह नहीं दिखते हैं।
नेहरू के साथ समस्या थी कि वह धार्मिक नहीं थे। मगर जिस देश में बहुजन आज भी महिलाओं को डायन बताकर मैला पिला रहे हों , साई को पूज रहे हों , फ़िल्म स्टारों, ट्रम्प मोदी और सोनिया गांधी का मूर्ति लगा के पूज रहे हों। ११ - ५१ रुपया देकर शनि-मंगल दशा बदलवा रहे हों।
वहाँ अगर नेहरू जैसा आदमी धार्मिक दिखता तब तो ये और अंधविश्वासी हो गए होते। जो भी तरक्की दिख रही है , वह भी नहीं दिखती।
मनुस्मृति औरंगजेब के समय में लिखी गई थी, ये इस मूर्ख का मानना है। गौतम बुद्ध ‘क्षत्रिय’ कुल में जनमे थे, क्या यह किसी बौद्ध ग्रंथ में नहीं है? क्या ललितविस्तर सूत्र (तीसरी शताब्दी) में यह नहीं लिखा है:
“बोधिसत्व निम्न कुलों (जैसे चांडाल, बांसुरी या गाड़ी बनाने वालों, या मिश्रित जातियों) में जन्म नहीं लेते। वे केवल दो उच्च कुलों—ब्राह्मण या क्षत्रिय—में ही जन्म लेते हैं। जब संसार में ब्राह्मण कुलों का सम्मान/प्रभुत्व अधिक होता है, तो बोधिसत्व ब्राह्मण कुल में जन्म लेते हैं। जब क्षत्रिय कुलों का प्रभुत्व होता है, तो क्षत्रिय कुल में। गौतम बुद्ध के समय क्षत्रिय कुल प्रमुख था, इसलिए उन्होंने वहाँ जन्म लिया।”
वस्तुतः, बौद्ध ग्रंथों में जातिवाद चरम पर है। जहाँ हिन्दू ग्रंथों में ब्राह्मणों को सर्वकालिक उच्च स्थान प्राप्त है, बौद्ध ग्रंथ बताते हैं कि भविष्य में जो भी जाति वर्चस्व में होगी, बुद्ध उसी में उत्पन्न होंगे! स्पष्ट कहा गया है कि बोधिसत्व निम्न कुलों में जन्म ले ही नहीं सकते! इससे बड़ा जातिवाद क्या होगा?
कुछ दिन में भाजपा के इस मंडलीकरण की कृपा से हम लोग विष्णु को बुद्ध का अवतार मानने लगेंगे। ऐसे ही लोग जब सरकार को सलाह देते हैं, तब यूजीसी जैसी बकलोली निकल कर आती है।
आइटी सेल वाले इसे भी डिफेंड कर लेंगे और कहेंगे उनके परदादा तो बौद्ध ही थे, बाद में हिन्दू बने। दिलीप मंडल भाजपा में घुस कर, सरकारी पैसों पर, वामपंथी नवबौद्ध अजेंडा चला रहा है। भाजपा का सूचना तंत्र नपुसंकों की तरह ताली पीट रहा है।