निशिकांत दुबे के निम्न बौद्धिक और चारित्रिक स्तर से परिचित होने के बावजूद एक बार को विश्वास नहीं हुआ कि एक सांसद ये पोस्ट कर सकता है। दुबे जी की ये पोस्ट कई स्तरों पर निंदनीय और बेहद शर्मनाक है।
1. कामाग्नि जैसे शब्द का प्रयोग बुजुर्ग महिला के लिए जो इस दुनिया में नहीं अत्यंत घृणित कार्य है। ये लोग भारतीय संस्कृति के झंडाबरदार होने का ढोंग करते हैं।
2. पहली फोटो में फिडेल कास्त्रो हैं, ये फोटो 1983 में दिल्ली में हुए गुट निरपेक्ष सम्मेलन की है जिसके मंच से फिडेल कास्त्रो ने इंदिरा गांधी को अपनी बहन बोला था। सोच कर देखिए हम मेजबान थे, मेहमान ने हमारी प्रधानमंत्री को बहन बोला और उनके मरने के बाद एक पतित व्यक्ति भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं पर कैसी अश्लील दृष्टि डाल रहा है!
3. दूसरी फोटो में यासर अरफात हैं जिन्होंने कई मौकों पर इंदिरा गांधी को अपनी बड़ी बहन बताया था। इंदिरा जी की हत्या के बाद अंतिम संस्कार के समय भी अराफात भारत आए थे और रो रहे थे। डिग्री दुबे ने इस रिश्ते पर भी अपनी गन्दी नजर डाली है।
4. इंदिरा गांधी कोई सामान्य महिला रही होतीं तो भी दुबे की पोस्ट घटिया ही मानी जाती लेकिन वो तो भारत की पूर्व प्रधानमंत्री थीं जिन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े किए और जो देश के लिए गोली खा कर बलिदान हुईं। इतना कृतघ्न बना दिया है क्या संघियों ने इस देश को दुष्प्रचार से कि वो अपने पुरखों के लिए ऐसी नीच टिप्पणियां देख कर भी दुबे और इनकी पार्टी का साथ देगा? ये सवाल लोगों से है जो इनके और इनके जैसों का समर्थन करते हैं।
देश के लिए गोली खा कर मरने वाली पंडित जवाहर लाल नेहरू की लड़की इस देश से बेहतर सम्मान की हकदार है। निशिकांत दुबे को तो चुल्लू भर पानी भी मना कर देगा डुबाने से पर सोचना अब जनता को है कि राजनीतिक ठगी के लिए धर्म के नाम पर अधर्म और संस्कृति के नाम पर भारतीय संस्कृति का विनाश कब तक स्वीकार करती रहेगी वो ?
काश इसी तरह का पोस्ट राहुल गांधी जी को बदनाम करने वालो के ख़िलाफ़ भी आ जाता आपका पंडित जी तो लगता कि आप सचमुच में सत्य के साथ रहते हैं।
काश आप बताते आलू से सोना बनाने का बयान मोदी जी का था राहुल जी तो उसे जनता को बता रहे थे कि मोदी जी ऐसा कह रहे थे।
लेकिन आपकी ये पक्षकारिता ही पत्रकारिता को अविश्वसनीय बना रही है।🙏
@INCIndia कहाँ गयाब हैं महाराज @RahulGandhi ये मौका है सरकार को घेरने का E20,पेपर लीक, कितने मुद्दे हैं पर आप गायब हैं. बीजेपी होती विपक्ष मे तो सड़क पर बैठे रहते बड़े बड़े नेता.
आप से ही उम्मीद है कुछ करिये, लड़िये उखाड़ फेकिये ये सरकार
🚨عوام کی ڈیمانڈ پر ایچ ڈی کوالٹی میں مکمل ستلج فلم ۔🚨
ایچ ڈی کوالٹی میں مکمل دوبارہ دیکھیے ۔
وہ فلم جس کو مودی نے انڈیا میں بین کیا ۔جس کو نیٹ فلیکس سے اتار دیا ۔
کیونکہ رجیم چینج والے سارے لوگ چاہتے ہیں عوام کے ساتھ جو ناجائز سلوک ریاست اور حکومت کرتی ہے وہ کوئی نہ دیکھے ۔
دیکھا جائے تو اس وقت برصغیر کے تمام ممالک میں یہی حالات ہیں جو ستلج میں دیکھائے گے ہیں ۔
کیا ہمارے پنجاب یا باقی صوبوں میںُ بھی ایسے حالات ہیں جو انڈیا کی پنجاب میں دیکھائے گے ہیں ؟
اس کا حل کیا ہے ۔۔۔
@MediaHarshVT इ टकले का अलग ही भसड़ रहता है, मुद्दा मत भटकाओ बे चादरमोद.. सवाल पूछो, कार ना चलाने का मतलब ये नहीं की वो बाहर नहीं निकले, और भी बहुत से साधन हैं. तुम्हारा अब्बा खुद बोले हैं कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट यूज़ करो वही करते हैं ये लोग. पर तेरी तरह दलाली नहीं करते बे कु त्ते
“…इथेनॉल का माइलेज 30 फ़ीसदी कम होता है…”
अनुराग सरावगी, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के बायोफ्यूल्स के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर
Video Credit : ANI https://t.co/WWxnk5ZztN
चित्रा जी,
आपने बहुत मासूमियत से लिखा कि “इस महिला को मैंने ट्विटर पर ब्लॉक कर रखा है।” यह बात पढ़कर लगा कि लोकतंत्र में अब ब्लॉक बटन भी एक तरह का वैचारिक बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स हो गया है, जिसे ठीक न लगे, उसे सीमा पार भेज दो!
लेकिन असली मज़ा तो आगे है।
आपने कहा कि वह आपको फॉलो करके आपकी खबरों के स्क्रीनशॉट लेती हैं, अपने अकाउंट पर चिपकाती हैं और आपको टारगेट करती हैं। रागिनी नायक कांग्रेस की प्रवक्ता हैं। उनका काम ही कांग्रेस के पक्ष में बल्लेबाज़ी करना है। वे कांग्रेस की जर्सी पहनकर मैदान में उतरती हैं, हाथ में बल्ला भी दिखता है और हेलमेट पर पार्टी का निशान भी। दर्शक जानते हैं कि यह बल्लेबाज़ निष्पक्ष अंपायर नहीं, टीम की खिलाड़ी है।
मुश्किल वहाँ शुरू होती है, चित्रा जी, जहाँ पत्रकारिता के कमेंट्री बॉक्स से वही शॉट लगने लगते हैं जो पार्टी के डगआउट से लगते हैं।
रागिनी कांग्रेस के लिए जो कर रही हैं, वह घोषित राजनीति है। आप भाजपा के लिए वैसा ही कुछ करती दिखें तो वह “पत्रकारिता” के नाम पर एक सुंदर-सा असंतुलन पैदा कर देता है। एक तरफ पार्टी प्रवक्ता है, दूसरी तरफ पत्रकार। दोनों की भाषा, दोनों का तेवर, दोनों का राजनीतिक निष्कर्ष लगभग एक जैसा हो जाए तो जनता बेचैन होकर पूछती है, मैच में कमेंटेटर कौन है और चीयरलीडर कौन?
रागिनी अगर मोदी सरकार, भाजपा या RSS पर हमला करती हैं तो दर्शक समझते हैं कि यह विपक्ष की पिच से निकली गेंद है। लेकिन जब कोई पत्रकार सत्ता के पक्ष में वही फुलटॉस खेलने लगे, जो प्रवक्ता खेलते हैं तो सवाल उठता है। पत्रकार का काम सत्ता से सवाल पूछना है, सत्ता के लिए सवालों को ब्लॉक करना नहीं।
और रही स्क्रीनशॉट वाली बात तो आजकल स्क्रीनशॉट भी लोकतंत्र का नया पंचनामा हैं। कभी वे सच खोलते हैं, कभी अधूरा सच बेचते हैं और कभी सिर्फ़ वैचारिक खीझ का फ्रेम बन जाते हैं। इसलिए हर स्क्रीनशॉट को अंतिम सत्य मानना भी ठीक नहीं, लेकिन हर आलोचना को “obsession” मान लेना भी पत्रकारिता की सेहत के लिए अच्छा नहीं।
चित्रा जी, सच में कहें तो रागिनी नायक विपक्ष की तरफ से ढोल बजा रही हैं। आप अगर सत्ता की तरफ से झांझ बजाएँगी तो फिर शोर तो होगा ही। फर्क बस इतना है—उनके गले में पार्टी का पट्टा है, आपके गले में पत्रकारिता का प्रेस कार्ड। जनता दोनों को देखकर यही कहती है—“वाह! एक ही धुन है, बस वाद्य अलग-अलग हैं!”
@NayakRagini