@airindia If you think multiple flies around my single seat is a common thing then imagine the total flies aboard. This type of indecency and unsanitation was not expected from air India. @AirIndia@DGCAIndia
@AirIndia On my Srinagar–Delhi flight, there are multiple flies around my seat. Sharing photos/videos as proof. This is highly unhygienic and disappointing. Please address this urgently and ensure better cleanliness. It is Very disappointing. I want fast action on it
@DGCAIndia
क्या आपने कभी कॉमिक्स पढा है?
बचपन से खूब कॉमिक्स पढ़ने के कारण, मेरी कल्पना शक्ति की मसल्स, काफी डेवलप हुई।।
प्राण के बनाये देसी कैरेक्टर- चाचा चौधरी, बिल्लू, रमन, पिंकी, ने मेरी सहज सुलभ हास्य प्रवृति को आकार दिया। मैं बचपन से ही चाचा चौधरी जैसा, कम्प्यूटर से तेज दिमाग वाला बनना चाहता था।
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डायमंड कॉमिक्स बालसुलभ मानवीय प्रवृत्ति को बढ़ावा देती। पर जब किशोर हो गए तो राज कॉमिक्स पढ़ते।
मेरा फेवरिट था सुपर कमांडो ध्रुव। राजनगर की गलियों में अपनी स्पेशल मोटरसाइकिल में गश्त लगाता ध्रुव, मानवता के दुश्मनों को रोज ही खाक में मिलाता।
और क्या ही मसल्स थी उसकी। नीली पैंट के ऊपर पीली चड्डी पहनकर जब ध्रुव निकलता तो संघियो की ऐसी तैसी कर देता।
सबसे बड़ी बात- वह अपना कोई स्पेसिफिक कोई हथियार लेकर नही चलता था। हिम्मत, मेहनत, ईमानदारी और पाठकों का आशीर्वाद उसका कवच थे।
वह आसपास के लकड़ी, पत्थर, बिजली के खम्बे वगैरह जो मिल जाये, उससे लड़ता। दुश्मन से हथियार छीनकर उसी से हथियार से उसको निपटाता।
तो मैं किशोरावस्था में सुपर कमांडो ध्रुव बनना चाहता था। स्किन टाइट नीली ड्रेस पर पीली चड्डी पहनकर घूमना कठिन था, पर मैनें हेयर स्टाइल एकदम ध्रुव की तरह थी।
और यह बात सिर्फ मैं ही जानता था।
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मधुमुस्कान के डैडीजी, पोपट चौपट, शक्तिमान, मोटू पतलू, घसीटा राम, पान सिंह, फौलादी सिंह वगैरह साथ साथ चलते रहे।
सुमन सौरभ की कहानियां, मूर्खिस्तान पढ़ते। कभी क्रिकेट सम्राट और विज्ञान प्रगति भी ले आते।
इतना पढ़ोगे तो सारे कॉमिक्स दुकानों का सारा कलेक्शन खत्म हो जाना था। तो हम पॉकेट बुक्स की तरफ मुड़े।
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यह एक नई दुनिया थी। मैनें राजन इकबाल के नॉवेल्स पढ़ना शुरू किया। बता दूं कि जिन नॉवेल्स के पीछे एस सी बेदी के वो शॉल की फोटो छपता था, सिर्फ वही असली नावेल होते थे।
यह बात स्वयं एससी बेदी ने शॉल वाली फोटो के साथ लिखकर बताई थी। मैं सिर्फ असली नॉवेल पढ़ता था। हालांकि सब सब असली नॉवेल पढ़ लिए, तो नकली भी पढ़ ही डाला।
इकबाल का फनी कैरेक्टर मुझे पसन्द था। इकबाल की एक गर्लफ्रैंड थी। दोनो झकलेट थे, और डायलॉग्स पढ़ने में मजा आता।।
फाइट में भी, राजन हवाई किक मारता, इकबाल जमीन पर फिसल कर दुश्मन की टांगो पे वार करता। उन्हें कैची बनाकर बेबस कर देता और मुक्कों से बेहाल कर देता। एक एक दृश्य फ़िल्म की तरह आंखों के सामने घट रहा होता।
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अब तक मैं ग्यारहवीं तक आ चुका था। कामनाएं जागृत हो चुकी थी। असली अक्कूम बककुम तो अंग्रेजी में मिलना था। हमने मिल्स एंड बून के नावेल को चुना।
एकदम सुपर रोमांटिक, डेढ़ सौ पेज की किताब में कहीं पे 6 पेज का लम्बा रसीला प्रेम दृश्य होता।सारी नावेल ही उस दृश्य के लिए लिखी होती।
इस तरह की नॉवेल्स ने मुझे अंग्रेजी पढ़ने को प्रेरित किया। दरअसल, 150 पेज आप अंग्रेजी डेढ़ दिन में खत्म कर लें, तो 900 पेज की किताब भी पढ़ने की हिम्मत कर सकते हैं।
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और मैंने मारियो पूजो, फ्रेडीक फोरसिथ, सिडनी शेल्डन, रॉबिन कुक, लुडलुम को पढ़ा। आगे जेफ्री आर्चर फेवरिट हुए। तब तक बने रहे, जब तक कि प्रिजन डायरी और हैरी क्लिफ्टन जैसा सरदर्द लिखना शुरू न कर दिया।
इस दौरान में घर मे पापाजी के लिए आने वाली उपलब्ध माया, इंडिया टुडे, रविवार, साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, हंस वगैरह पर भी हाथ साफ कर लेते।
दीदी हमारी गुलशन नंदा से प्रेमचंद तक सब पढ़ती, तो वह भी पढ़ लेते।
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पापाजी के जूते पॉलिश और स्कूटर पोछाई से मिलने वाली पॉकिट मनी, सब इन किताबो के किराए, या खरीद में भस्म हो जाती।
बाद में कैसेट खरीदने और गाने भरवाने खर्च भी बढ़ गया। सब्जी खरीदी के मुनाफे, या एग्जाम देने जाने के लिए मिले ट्रेन टिकट के पैसे-(जो WT जाकर गबन कर लिये जाते) वह भी इसमें लुट गए।
सच है, बेईमानी की कमाई टिकती नही।
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और बहुत पैसा बर्बाद भी हुआ। नशा इतना था, की शौक में बहुत फालतू कैरेक्टर भी पढ़ डालते- जादूगर मेंड्रेक और वेताल, जो इंद्रजाल कॉमिक्स में आते। नागराज और डोगा..
ये अजीब कैरेक्टर थे। बांकेलाल भी बकवास ही था, पर मजेदार था। हिहिहि।
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पर सबसे स्टूपिड आइडिया तुलसी कॉमिक्स में अंगारा था।
वह बायलोजिकल नही था।
अंगारा – एक विलक्षण प्राणी था। वह गोरिल्ले के शरीर मे लोमड़ी का दिमाग, हाथी की स्किन, गैंडे की खाल, गिद्ध की आंखे और शेर का दिल प्रत्यारोपित करके बनाया गया था।
व्हेल के मुंह मे बैठकर समुद्री सफर करता, कभी उसका बाज कंधे से पकड़ हवाई यात्रा करवाता। वह पशु अधिकारों के लिए मनुष्यो से लड़ता। जानवर उसका साथ देते।
ऐसा कहीं होता है भला?
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मुझे यकीन नही हुआ। जब तक कि मोदी जी ने शपथ न ले ली।
खैर!!!!
तो क्या आपने कभी कॉमिक्स पढा है?
❤️
जमानत मिलते ही जो दाढ़ी बड़ा कर ढोंग रच रहें थें असली #आप_पार्टी_क्षत्रिय_संजय_सिंह ने पूरे सफेद दाढ़ी में प्रेस कॉन्फ्रेंस में सफेद नमक चाप दिए
जय श्री कृष्णा जय श्री राम
@aajtak
200 रु. की कीमत तुम क्या जानो, खान बाबू !!!
उन दो सौ की कीमत पूरा देश चुका रहा है, देश पर किश्तें खत्म होने नही हो रही। गड्ढे में फँसा एक पूरा समाज, और खोदकर खाई में धंस गया। बस,
200 की खातिर ...
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साहबान, 1978 का दौर था। मुकद्दर का सिकंदर रिलीज हुई थी। इससे इंस्पायर्ड होकर इंदौर में रहने वाले एक खान साहब ने, "सलामे इश्क मेरी जां' कर लिया।
फिर कबूल कबूल कर लिया। मने पकी उम्र में दूजा ब्याह किया। वकील थे, दौलतमंद थे, 4 अफोर्ड कर सकते थे।
कुछ समय दो बीवियों को साथ रखा, और फिर चख चख से तंग आकर पहली को तलाक दे दिया।
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बीवी शाहबानो भी कोई फक्कड़ गरीब न थी। बड़ा मायका था, दौलत की कमी उनको भी न थी।
वकील साहब ने अपनी 62 साल की बीवी को 100-50 रुपये मासिक खर्चा देने का अहद किया था। कुछ दिनों तक दिया भी.. फिर डिफाल्ट कर गए।
बीवी, वकील की बीवी, खार खाई थी।100 -50 रुपये के लिए 10 साल सुप्रीम कोर्ट तक लड़ने का माद्दा था।
कहने का मतलब यह, कि मानवीय जरूरत से ज्यादा, मियां बीवी के ईगो का मुद्दा था।
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शाहबानों ने CRPC -125 के तहत इंदौर कोर्ट में नालिश कर दी। लोकल कोर्ट ने फैसला बीवी के हक में दिया। 200 रुपये मासिक तय किये।
वकील साहब का ईगो हर्ट हुआ। फैसला CRPC रुट से था, ये जरा गड़बड़ था।
सम्विधान कहता है कि शादी, उसका विच्छेद, उत्तराधिकार, हर्जे खर्चे, पर्सनल लॉ से तय होगा, IPC-CRPC से नही। वकील को लूप होल दिखा, हाईकोर्ट गए।।
हाईकोर्ट भी बीवी के पक्ष में, पतिदेव सुप्रीम कोर्ट गए। 10 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी शाहबानों के पक्ष में फैसला दिया।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दूजा महत्व होता है। तमाम केसेज में साइटेशन और रेफरेंस। में यूज होता है। ये "स्टैंड अलोन" केस नही रह गया था।
आने वाले दौर में इस नजीर को, पर्सनल लॉ के दूसरे सामाजिक प्रावधानों पर सुपरसीड करने के लिए होता।
ये खतरे की घण्टी थी।
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सो मियां-बीवी ईशु, नेशनल इशु बना। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने, फैसले को अपने "संवेधानिक अधिकार" में हस्तक्षेप माना।
धरना, प्रोटेस्ट, आवेदन, निवेदन, धनाधन सब। मगर आम नजर से देखें, तो सारे मुल्ला मौलवी, बेचारी स्त्री के अधिकार के हरण में जुटे दिखते।
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अब सरकार सम्विधान प्रदत्त अल्पसंख्यक अधिकार प्रोटेक्ट करे, या स्त्री अधिकार?
केंद्र सरकार का प्रगतिशील, खुले दिमाग का एक मंत्री कौमी तमाशे के पुरजोर विरोध में था। आरिफ ने 1 घण्टे संसद में भाषण दिया।
कुरान, कानून, सम्विधान औऱ औरत के हकों हकूक पर शानदार तकरीर की। भाषण देकर बाहर आये, तो पता चला,
सरकार झुक गयी है।
प्रधानमंत्री ने फैसला पलट, सम्विधान को चुना। महिला के हक को दबाना कबूल किया।आरिफ ने इस्तीफा पटक दिया।
मनाने की बहुतेरी कोशिश हुई, वे न माने। आखरी कोशिश नरसिंहराव ने की। आरिफ के कंधे पर हाथ रखकर कहा-
"आरिफ, हम पॉलिटीशियन हैं, समाज सुधारक नही। अगर मुसलमान गड्ढे में रहना चाहते है, तो रहें। तो तुम क्यो जिद में अपना भविष्य खराब करना चाहते हो"
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तो अछूतों को "हरिजन" कह मुख्य धारा में लाने की कोशिश करने वाले गांधी की कांग्रेस, आज महज पॉलिटिशियन का जमावड़ा थी।
गांधी के मार्ग से हटने की सजा आने वाले वक्त में कहर की तरह मिलेगी, ये नरसिंहराव ने सोचा न होगा।
आरिफ पद त्याग चलते बने। "धर्मनिरपेक्षता" "कॉन्स्टिट्यूशनल राइट" को नया नाम मिला।
"तुष्टिकरण"
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रामशिला यात्राएं, दंगे वंगे तब चालू थे। इसी वक्त फैजाबाद कोर्ट का फैसला आया।
ताला खोला जाये।
जज साहब बाद में भाजपा विधायक बनने वाले थे। पर अभी तो शाहबानो मसले पर तुष्टिकरण की तोहमत झेलती कांग्रेस को लगा।
"बेनिफिट लिया जा सकता है"
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जन्मभूमि का ताला खोलो, शिलान्यास करो, मन्दिर बनवा दो। मुस्लिम पहले तुष्ट थे, अब हिन्दू भी तुष्ट। बल्ले, बल्ले..
ताला खुला, तो एक जिन्न हू-हू-हाहा करते हुए निकला। राजीव को वक्त न मिला।
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89 जीत जाते, तो मन्दिर वहां बनवाते, जहां खुद शिलान्यास किया था। लेकिन वीपी के बहाने सत्ता और चिराग का जिन्न भाजपा के हाथ लग गया।
जिनकी शपथ, "वहीं" बनाने की ली।
राजीव की शहादत से कांग्रेस सत्ता में लौटी, मगर जिन्न वापस न मिला। राव जब पूजा में बैठे, वो जिन्न अयोध्या में जमीन साफ करने लगा। बैठने और भजन करने के लिए पत्थर हटाने लगा।
पीएम की पूजा समाप्ति तक उसने फिर एक धक्का और दिया,
बाबरी मस्जिद तोड़ दिया।
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दंगे हुए, हजारों मरे। जिन्न पर चढ़कर गांधी के हत्यारे मकबूल हो गए। कांग्रेस की चूलें हिल गयी।
सेकुलरिज्म गाली हो गया, मुसलमान गद्दार और बाबर की संतानें हो गयी। सरकार, मिडीया, कोर्ट, धर्म, और हम सब नंगे हो गए।
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उन दो सौ रुपयों की कीमत तुम क्या जानो खान बाबू..