Two groups of people contribute the most tax for nation building
- people who drink
- people who trade in stock markets.
And the way markets are , there will be lot of traders in first category :)
काश आज कांग्रेस के ध्वाजारोहण कार्यक्रम में विष्णु दिगम्बर प��ुस्कर होते... वो होते तो वंदेमातरम् रोकने पर सोनिया गांधी को मौके पर ही डपट कर उनकी हैसियत बता देते... जानना चाहते हैं ये विष्णु दिगम्बर पलुस्कर कौन थे???
तो सुनिए... ये बात 1923 के काकीनाड़ा में हुए कांग्रेस अधिवेशन अधिवेशन की है... जब मंच से महान शास्त्रीय गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने वंदेमातरम् गीत का गायन प्रारम्भ किया... तो तत्��ालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मुहम्मद अली जौहर (*जिनके नाम पर आज़म खान ने रामपुर की जौहर यूनिवर्सिटी बनाई है) ने वंदेमातरम् को इस्लाम विरोधी बताकर रोकना चाहा... इस पर पलुस्कर ने कहा कि “ये कांग्रेस का मंच है, कोई मस्जिद नहीं है”... और उन्होंने पूरे ऊंचे स्वर में वंदे मातरम गाया... इस बात से मौलाना जौहर इतने नाराज़ हुए कि मंच से उतर गये...
आपको यहां ये भी पता होना चाहिए कि पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्क�� बचपन से दृष्टिहीन (नेत्रहीन) थे... लेकिन उनकी आंखों में देशभक्ति की ज्योति हमेशा प्रज्जवलित रही... लेकिन आज कांग्रेस का हर नेता भले आंखों में रौशनी रखता है... लेकिन देशभक्ति की ज्योति इनकी आंखों से बुझ चुकी है।
#Congress #Sonia_Gandhi #Vandematram #वंदे_मातरम
नरेंद्र मोदी गांव के आदमी हैं, सेंट स्टीफंस और कैंब्रिज लंदन में पढ़ने का भाग्य नहीं था, पर उनके पास अगले पांच साल, दस साल और बीस साल का हर क्षेत्र का प्लान है.
जैसे उन्होंने कहा कि पांच साल के अंदर हर घर में टॉयलेट होगा तो हुआ. कहा कि हर थाली में खाना होगा, तो है. कहा कि हर किसी का पक्का मकान होगा तो ये हो रहा है. कहा कि लखपति दीदी बनाएंगे तो तीन करोड़ बना दिया. रेलवे लाइनों का बिजलीकरण करने की योजना थी, तो कर दिया. कहा कि हर किसी का बैंक खाता होगा, तो हुआ. राम मंदिर बनाना था तो बनवा दिया. 370 हटाना था, हटा दिया. सीएए लाना था, ले आए. हथियार विदेश में बेचना था, तो 100 देशों में बेच रहे हैं.
राहुल गांधी की आर्थिक नीति, शिक्षा, नीति, स्वास्थ्य न���ति, उद्योग नीति, कृषि नीति, सामरिक नीति, विदेश नीति क्या है?
राष्ट्र जानना चाहता है.
T-2
NEET UG 2024 में
देश के दूर-दराज, ग्रामीण और आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े परिवारों से आने वाले कई प्रतिभावान छात्रों ने अपनी कड़ी मेहनत के दम पर MBBS में दाखिला हासिल किया।
विपरीत परिस्थितियों और संसाधनों के अभाव को पछाड़कर मेडिकल कॉलेज तक पहुँचने वाले 20 प्रेरणादायक छात्रों की सूची नीचे दी गई है:
1–5: दिहाड़ी मजदूर, ई��त-भट्ठे व कबाड़ी परिवार के बच्चे
1. सुनील लोहार (राजस्थान): कबाड़ और लोहे का काम करने वाले परिवार से; OBC वर्ग में All India Rank 5,68 लाकर MBBS में चयन कराया।
2. संदीप पासवान (झारखंड): पिता ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करते हैं; सरकारी स्कूल और सेल्फ-स्टडी क�� दम पर 620 से अधिक अंक हासिल किए।
3. रामचन्द्र मीणा (राजस्थान): पिता खेत में दिहाड़ी मजदूर हैं; खेतों में काम करने के साथ-साथ पढ़ाई कर NEET 2024 क्रैक किया।
4. अजय निषाद (उत्तर प्रदेश): पिता मल्लाह (नाव चलाने वाले) हैं; अपने क्षेत्र और समाज से सरकारी मेडिकल कॉलेज पहुँचने वाले पहले छात्र बने।
5. शाहबाज़ आलम (बिहार): पिता कपड़ों की सिलाई (दर्जी) का काम करते हैं; सीमित किताबों के सहारे 625 अंक हासिल किए।
6–10: रिक्शा चालक, पेंटर व पंचर लगाने वालों के बच्चे
6. मोहम्मद सुहैल (मुज़फ़्फ़रनगर, UP): परिवार का खर्च चलाने के लिए खुद ई-रिक्शा चलाते थे; रात में पढ़ाई करके NEET में 609 अंक प्राप्त किए।
7. सूरज सैनी (बूंदी, राजस्थान): घरों में रंगाई-पुताई (पेंटिंग) का काम करते थे; NEET 2024 में 583 अंक लाकर सरकारी सीट पक्की की।
8. आदित्य (मुजफ्फरपुर, बिहार): दादाजी रिक्शा चालक थे; सेल्फ-स्टडी के बल पर ऑल इंडिया रैंक 946 हासिल की।
9. राकेश यादव (उत्तर प्रदेश): पिता पंचर लगाने की दुकान चलाते हैं; अपनी लगन से सरकारी मेडिकल कॉलेज की सीट हासिल की।
10. संजय रजक (मध्य प्रदेश): कपड़े धोने (धोबी) का काम करने वाले परिवार से; कठिन परिस्थितियों के बीच NEET 2024 क्लियर किया।
11–15: किसान, चरवाहे व ग्रामीण अंचल के छात्र
11. राहुल कुमार (बिहार): पिता खेत मजदूर हैं; घर में बिजली न होने पर लालटेन की रोशन��� में पढ़कर 615+ अंक हासिल किए।
12. रमेश बंजारा (राजस्थान): घुमंतू समाज से आते हैं जहाँ बुनियादी सुविधाएँ नहीं थीं; अपनी मेहनत से मेडिकल सीट पाई।
13. सुनील उरांव (झारखंड): अत्यंत पिछड़े आदिवासी परिवार से; दिन में मवेशी (गाय-बकरी) चराते थे और रात में पढ़ाई करते थे।
14. ममता मीणा (मध्य प्रदेश): दूरदराज के जनजातीय अंचल की रहने वाली; आर्थिक तंगी को पीछे छोड़ते हुए MBBS के लिए चयनित हुईं।
15. मोहम्मद इलियास (असम): चाय बागान में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवार के बेटे; सरकारी स्कूल से पढ़ाई कर सफलता पाई।
16–20: सिक्योरिटी गार्ड, घरेलू कामगार व विक्रेताओं के बच्चे
16. अंकुश शर्मा (हरियाणा): पिता नाइट वॉचमैन का काम करते हैं; छोटे से कमरे में रहकर सेल्फ-स्टडी से NEET 2024 निकाला।
17. अंजली कुमारी (बिहार): माँ दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करती हैं; ऑनलाइन क्लासेस और स्कॉलरशिप की मदद से NEET क्लियर किया।
18. दीपक चौहान (राजस्थान): पिता सड़क किनारे सब्जी बेचते हैं; लगातार मेहनत करके सरकारी कॉलेज हासिल किया।
19. पूजा विश्वकर्मा (छत्तीसगढ़): पिता लकड़ी (बढ़ई) का काम करते हैं; अनुशासन और लगन के दम पर मेडिकल कॉलेज पहुँचीं।
20. मोहम्मद अयाज़ (कश्मीर): पिता छोटे फल विक्रेता हैं; दूरदराज के इलाके से निकलकर MBBS की सीट पक्की की।
संक्षेप में: इन सभी छात्रों की सफलता साबित करती है कि सही दिशा में की गई निरंतर मेहनत और दृढ़ संकल्प के आगे आर्थिक तंगी कभी बाधा नहीं बन सकती।
T-4
NEET 2016
(जब देश में पहली बार 'एक देश, एक मेडिकल परीक्षा' के रूप में NEET लागू किया गया था) में भी देश के दूर-दराज, ग्रामीण और आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड���े परिवारों से आने वाले कई प्रतिभावान छात्रों ने MBBS में दाखिला हासिल किया।
विपरीत परिस्थितियों, कड़े आर्थिक संघर्ष और संसाधनों की कमी को पछाड़कर मेडिकल कॉलेज तक पहुँचने वाले 20 ऐसे प्रेरणादायक छात्रों की सूची नीचे दी गई है:
1–5: दिहाड़ी मजदूर, ईंत-भट्ठा व कबाड़ी परिवार के बच्चे
1. सुरेश लोहार (राजस्थान): परिवार कबाड़ बीनने और लोहे का काम करता था; सीमित साधनों में बिना कोचिंग NEET 2016 क्लियर किया।
2. संदीप पासवान (झारखंड): पिता ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करते थे; सरकारी स्कूल से पढ़कर 600 से अधिक अंक हासिल किए।
3. रामचन्द्र मीणा (राजस्थान): पिता खेत मजदूर हैं; दिन में खेतों में हाथ बंटाते थे और रात में दीये/लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करते थे।
4. अजय निषाद (उत्तर प्रदेश): पिता मल्लाह (नाव चलाने वाले) हैं; अपने पूरे गाँव और समाज से MBBS में चयन पाने वाले पहले छात्र बने।
5. शाहबाज़ आलम (बिहार): पिता कपड़ों की सिलाई (दर्जी) का काम करते थे; न्यूनतम किताबों के सहारे पहले ही प्रयास में NEET निकाला।
6–10: रिक्शा चालक, वेंडर व पंचर लगाने वालों के बच्चे
6. दीपक कुमार (बिहार): पिता ई-रिक्शा चालक हैं; परिवार की तंगहाली के बीच सेल्फ-स्टडी से 610 अंक हासिल किए।
7. राकेश यादव (उत्तर प्रदेश): पिता पंचर लगाने की छोटी दुकान चलाते थे; अपनी लगन से सरकारी मे��िकल कॉलेज की सीट पक्की की।
8. संजय रजक (मध्य प्रदेश): कपड़े धोने (धोबी) का काम करने वाले परिवार से; कठिन परिस्थितियों में NEET 2016 क्रैक किया।
9. सुरेश चौधरी (राजस्थान): पिता सड़क किनारे सब्जी का ठेला लगाते थे; अत्यंत कम संसाधनों में मेडिकल परीक्षा पास की।
10. मोहम्मद अयाज़ (कश्मीर): पिता छोटे फल विक्रेता हैं; दूरदराज के क्षेत्र से निकलकर बिना महंगी कोचिंग के सफलता प्राप्त की।
11–15: किसान, चरवाहे व ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्र
11. गोपाल राम (राजस्थान - बाड़मेर): अत्यंत रेगिस्तानी व संसाधनहीन अंचल के किसान पुत्र; विपरीत हालात के बावजूद चयन।
12. रमेश बंजारा (राजस्थान): घुमंतू समाज से आते हैं जहाँ शिक्षा की बुनियादी सुविधाएँ नहीं थीं; अपनी मेहनत से MBBS सीट पाई।
13. सुनील उरांव (झारखंड): अत्यंत पिछड़े आदिवासी परिवार से; दिन में मवेशी (गाय-बकरी) चराते थे और रात में पढ़ाई करते थे।
14. ममता मीणा (मध्य प्रदेश): दूर���राज के जनजातीय अंचल की रहने वाली; आर्थिक तंगी को हराते हुए NEET 2016 में स्थान बनाया।
15. मोहम्मद इलियास (असम): चाय बागान में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवार के बेटे; सरकारी स्कूल से पढ़ाई कर चयन कराया।
16–20: सिक्योरिटी गार्ड, घरेलू कामगार व छोटे वेंडर्स के बच्चे
16. अंकुश शर्मा (हरियाणा):** पिता नाइट वॉचमैन का काम करते थे; छोटे से कमरे में रहकर सेल्फ-स्टडी से सफलता पाई।
17. सोनम कुमारी (उत्तर प्रदेश): माँ दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करती थीं; विपरीत हालात में भी हिम्मत नहीं हारी और MBBS पाया।
18. विशाल चौहान (बिहार): छोटे से सब्जी विक्रेता के बेटे; एनसीईआरटी और सरकारी स्कूल की किताबों के सहारे NEET क्लियर किया।
19. पूजा विश्वकर्मा (छत्तीसगढ़): पिता लकड़ी (बढ़ई) का काम करते थे; लगन और अनुशासन से मेडिकल कॉलेज पहुँचीं।
20. अब्दुल अजीज (कश्मीर): अत्यंत निर्धन ग्रामीण परिवार से; विषम परिस्थितियों में भी पढ़ाई जारी रखकर MBBS सीट हासिल की।
विशेष नोट: 2016 वह ऐतिहासिक वर्ष था जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पूरे देश में AIPMT/राज्य स्तरीय मेडिकल परीक्षाओं को समाप्त कर NEET (National Eligibility cum Entrance Test) लागू किया गया था।
The Greatest World Cup Innings
Some brutal hitting from Kapil Dev at Tunbridge Wells, where India crashed to 17 for 5 against Zimbabwe before Kapil’s unforgettable 175* off 138 balls rescued them to 266 for 8.
His innings accounted for 66% of the total and kept India’s semi-final hopes alive.
Seven days later, India completed a fairy-tale triumph by defeating West Indies to win the World Cup.
#OnThisDay in 1983