हफ्ते के अंत तक अचानक से मन करता है कि भाग जाऊं कहीं बहुत दूर, अपनी बाइक उठाऊं कुछ कपड़े ले निकल जाऊं कहीं भी जितनी दूर जा सकता हूं उतना, जहां सब अनजान हों, जहां मैं चिंतामुक्त हो सकूं कुछ एक क्षण हीं पर सुबह आंख खुलती है तो बस जीविका कमाने तक ही भाग पाता हूं...!!!
मुझे साहित्य की ज्यादा समझ नहीं हैं ना ही वर्तनी का ज्ञाता मैं, मुझे नहीं आती तुकबंदी ना कहानियों किस्सो का अच्छा प्रवक्ता मैं, मेरे हिस्से नहीं है कोई कागजात जो मेरे लेख को सैद्धांतिक तर्क का दर्जा प्रदान करे परंतु इन सब से परे मेरा प्रेम मेरी सभी कहानियों को प्रमाणित करता है !
मेरे जीवन में प्रेम वैसे ही आया जैसे किसी दूर दराज के गांव से जा गुजरता है कोई हवाई जहाज, और मेरी खुशी उतनी ही क्षणिक रही जैसे उस गांव में उस बालक की रही होगी जिसने पहली बार उसे देखा था...!!!