बर्दाश्त कर लेने का इतना हौसला था कि
आज मैं सोचता हूँ तो हैरान रह जाता हूँ‚
कितना कुछ छीन लिया है मुझसे
इस बर्दाश्त कर लेने की आदत ने।
–• ओमप्रकाश वाल्मीकि
चालाक लोग इसका पूरा हिसाब रखते हैं
कि क्या-क्या बचाया‚
लेकिन यह कभी नहीं जान पाते हैं
क्या-क्या गंवाया।
वे पांव गंवा कर जूते बचा लेते हैं‚
और शान से दुनिया को दिखाते हैं।
—• मदन कश्यप