एक दिन तुम पाओगे तुम्हारे बाल सफ़ेद होने शुरू हो गए हैं, दाँत हिलने लगे हैं
एक दिन पाओगे कि मौत सामने खड़ी है और तुम्हारे हाथ खाली हैं
मौत भी तुम्हें देखकर हँसेगी इतने साल तुझे दिए गए, तू जिया क्या? तूने किया क्या?
पूछो अपने आपसे, सुबह से शाम जो कुछ करते हो, वो कर क्यों रहे हो?
ज़्यादा से ज़्यादा 10 से 20 साल बचे हैं तुम्हारे पास जीने को
क्या इन्हें भी बस ऐसे ही गुज़ार देना है?
कोई कला सीखिए, कोई क्राफ्ट सीखिए अपने आप को शिक्षित कीजिए
अपनी उन्नति, अपनी तरक्की के लिए खर्च करना सीखिए। वो पैसे का सबसे ऊँचा सदुपयोग है
अपने लिए समय निकालना सीखिए और उसी समय में अध्यात्म की ओर बढ़िए।
~ आचार्य प्रशांत
आचार्य प्रशांत का Powerlifter और Commonwealth Medalist उत्तम रावत के साथ संवाद
- 43 की उम्र, फुल-टाइम जॉब और रात में ट्रेनिंग! Commonwealth में गोल्ड तक कैसे पहुँचे उत्तम रावत?
- “अगर 43 वाला settle होने की सोच सकता है तो 48 वाला क्या सोचे फिर?” आचार्य प्रशांत ने ऐसा क्यों कहा?
- “सफर में बने रहना ही मंजिल है, राह ही हमसफर है।” - आचार्य प्रशांत का उत्तम रावत को संदेश।
🎥 पूरा वीडियो यहाँ देखें: https://t.co/ZCejdEahlz
आप हँसते भी कैसे हो? ये भीड़ ने तय कर रखा है।
आत्मज्ञान का मतलब यही है कि मुस्कुराए, तो मुस्कुराने में भी सब कितना फ़र्ज़ी है, दिख गया। कि मेरी मुस्कुराहट भी पूरी फ़र्ज़ी है।
इसलिए नहीं कि मैं झूठ-मूठ मुस्कुरा रहा हूँ, इसलिए कि मुस्कुराहट की परिभाषा भी मेरी भीड़ की है। कुछ भी नहीं है अपना।
"एक सवाल है बस
जिसका उत्तर विज्ञान नहीं दे सकता
और उस सवाल का नाम है - प्यार!
"ये प्यार क्या चीज़ होती है,
किसको होती है?"
कामना का जवाब भी विज्ञान के पास है,
प्यार का जवाब नहीं है।"
~ आचार्य प्रशांत
सलीके से रहो... ऐसे कपड़े पहनो, ऐसे बोलो..
बहू ऐसी होनी चाहिए... बेटी ऐसी होनी चाहिए...
तुम्हें भी लगने लगता है- "शायद मुझे ऐसा ही होना चाहिए।"
अपने आप से पूछो- मैं कैसी होना चाहती हूँ?
समाज की स्वीकृति के लिए जीना.. अपना जीवन जीना नहीं है।
ऐसा सम्मान नहीं चाहिए जो स्वतंत्रता छीन ले..
लोगों की अपेक्षाओं से अपनी पहचान मत बनाओ...
समाज तुम्हें एक रूप देना चाहेगा.. तुम अपनी समझ से अपना जीवन चुनो।
~ आचार्य प्रशांत
यज्ञ समझकर खेलो || आचार्य प्रशांत
गीता में कृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोग चोर ही होते हैं। मुझे कुछ नहीं बचाना है। मैं कौन हूँ? वो हूँ जो यहाँ पर आया हूँ खुद को लुटाने के लिए, मिटाने के लिए, पूरी आहुति दे देने के लिए।
इसके बाद आमतौर पर देखा यह गया है कि ऐसे लोग जीवन के हर क्षेत्र में बहुत ऊपर जाते हैं।
खेलों में भी बहुत ऊपर जाते हैं। लेकिन ऊपर जाएँगे कि नहीं जाएँगे, परिणाम हमारी उम्मीदों के मुताबिक आएगा कि नहीं आएगा, हम उसकी बहुत फ़िक्र करते नहीं हैं।
इतना पक्का है, हारेंगे भी तो ऐसा हारेंगे कि जीतने वाले को भी हम पर नाज़ होगा। वो भी हमसे कहेगा, भाई!
एशियन खिलाड़ी का संघर्ष
हम चाहते हैं, देश के लिए मेडल आए, वहाँ पर तिरंगा फहराए। व्यक्तिगत रूप से भी हम चाहते हैं कि हम पहनें और लोग हमें जानें, वो सब ठीक है। अपनी भी इच्छाएँ हैं।
राष्ट्र के लिए भी हम चाहते हैं। पर उतना ही तो करेंगे न, जितना कर सकते हैं, और जितना कर सकते हैं, उतना तो करने का हमने पूरी ज़िंदगी अभ्यास किया है।
तो बताओ, आज ज़्यादा कैसे कर दें?
~आचार्य प्रशांत
शरीर को दर्द, अहंकार को दुख होता है ~ नवभारत टाइम्स कवरेज
आचार्य प्रशांत से संवाद करने पहुँचे एशियाई खेलों के सॉफ्ट टेनिस पदक विजेता जय मीणा और कॉमनवेल्थ पावरलिफ्टिंग के पदक विजेता उत्तम रावत। खेल में जीत-हार, दबाव और प्रदर्शन को लेकर हुई चर्चा में आचार्य प्रशांत ने एक अहम बात कही, “हारेंगे तो ऐसा हारेंगे कि जीतने वाले को भी हम पर नाज होगा।”
पूरा लेख पढ़ें: https://t.co/aAolyyKbQl
गोवा में Weekend With Master के दौरान वेदांत संहिता सत्र की झलकियाँ ✨
26-27 सितंबर को गोवा में आयोजित Weekend With Master कैंप के दौरान सुबह की HIDP ऐक्टिविटीज़ के बाद वेदांत संहिता का एक विशेष सत्र हुआ। ऋभु गीता के चौथे अध्याय के 26वें श्लोक को समझाते हुए आचार्य प्रशांत ने बताया कि अद्वैत कोई दूर की या रहस्यमय बात नहीं है। इसकी शुरुआत खुद को देखने से होती है।
उन्होंने समझाया कि ‘मैं और मेरा’, ‘मैं और दूसरा’ जैसी सोच ही द्वैत है। इसलिए बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक बातों में जाने के बजाय सबसे पहले अपने ही जीवन को देखना जरूरी है।
सत्र में आचार्य प्रशांत ने यह भी समझाया कि हमारी असली परेशानी कोई बहुत बड़ी या रहस्यमय चीज़ नहीं है, बल्कि रोज़ की वही छोटी-छोटी बातें हैं जो हमें परेशान करती हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक बातें करने के बजाय पहले यह देखना चाहिए कि हमारी अपनी ज़िंदगी में क्या चल रहा है और हम किन चीज़ों से बंधे हुए हैं।
देशभर से आए प्रतिभागियों ने सवालों और बातचीत के साथ सत्र में उत्साह से हिस्सा लिया। गोवा के इस कैंप के बाद अब अक्टूबर में दिल्ली-NCR में लगभग हर सप्ताहांत Weekend With Master कैंप आयोजित होने जा रहे हैं, जहाँ ऐसे ही सत्रों और खुद को देखने की बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ेगा।
हिजाब पाबंदी को लेकर मचा बवाल। कपड़ों पर इतना ध्यान क्यों?
ज़िंदगी में करने के लिए कुछ सार्थक होता, तो कपड़ों के बारे में
इतना कोई क्यों सोचता? न अपने कपड़े के बारे में, न दूसरे के कपड़े के बारे में, इतना वक़्त किसके पास है?
और ये मुद्दा इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है कि हम इसको इतनी गंभीरता से लें।
विश्व की तो छोड़ ही दो, एशिया की top 100 में भी Indian Universities बहुत कम दिखाई पड़ती हैं
भारतीयों की क्या बुद्धि कम है?
नहीं, बुद्धि तो कम नहीं है
उन देशों ने शिक्षा में निवेश करा, उन्होंने public education system ज़बरदस्त बनाया
भारत ने शिक्षा में निवेश नहीं करा
शिक्षा पर यदि सरकार खर्चा बढ़ा दे, तो बहुत सारी चीज़ें हिंदुस्तान में बदल जाएँगी
पर सरकार भी budget में शिक्षा को उतना ही अनुपात देगी, जितना लोग शिक्षा को सम्मान देते हैं
हिंदुस्तानी को अभी तक भी शिक्षा का महत्त्व पूरी तरह समझ में नहीं आ रहा है
आम आदमी के मन में शिक्षा के लिए बहुत कम respect और dedication है
जब vote देने वाला आदमी शिक्षा को सम्मान देने लगेगा, तो budget बनाने वाली सरकार भी शिक्षा को उचित पैसा देने लगेगी
इस देश को एक वास्तविक रूप से शिक्षित पीढ़ी की ज़रूरत है
हम भारत को ही नहीं, हम पूरी दुनिया बदल देंगे।
~ आचार्य प्रशांत
यह लड़ाई धर्म और धर्म की नहीं, देश और देश की नहीं, बल्कि इंसान और इंसान की है
दुनिया में इतनी लड़ाइयाँ क्यों हो रही हैं? हज़ारों मौतें क्यों हो रही हैं? इन संघर्षों को केवल देशों, समुदायों या विचारधाराओं के बीच की लड़ाई समझना पर्याप्त नहीं है।
इंसान के भीतर ही कुछ ऐसा है, जो उसे दूसरे इंसान से भिड़ने के लिए मजबूर करता है।
इंसान के भीतर का संघर्ष ही बड़ा होकर राष्ट्रों और समुदायों के बीच का संघर्ष बन जाता है।
हिंसा इंसान के मन से शुरू होती है और इंसान के मन में ही समाप्त की जा सकती है।
मेरा Batchmate था, पढ़ाई पूरी होते ही वो चला गया था America
आया, मैंने कहा, "तुम्हें ऋषिकेश घुमाऊँगा।" वो बोला कि अच्छी जगह है, पर ऐसी जगह अमेरिका में हर 10 KM पर है
मेरा थोड़ा दिल-सा टूट गया, पर जो उसकी बात थी, वो अपनी जगह वाजिब थी
पश्चिम के जो अच्छे शहर हैं, उनमें अगर AQI 10 पार कर जाए, तो सरकार तक बात पहुँच जाती है
और उत्तर भारत में अगर 400 से नीचे हो जाए, तो हम कहते हैं, "आज हवा कितनी सुगंधित और साफ़ है!"
हवा साफ़ है, पानी साफ़ है। कैसे करा उन्होंने ये? उसके लिए ज्ञान चाहिए
और जुगाड़ बोलेगा, "पैसा कमा लेना कैसे भी, उसके लिए Pollution होता हो तो हो"
ये भारत है!
पैसा कमाना है मुझे, उससे Pollution होता हो तो हो!
~ आचार्य प्रशांत