जो लोग मेरा बनाया स्क्रीनशॉट लेकर खुद का Breaking News बना रहे हैं, उनके लिए मैं ओरिजिनल दे देती हूं👇
वो क्या हुआ ना कि collage बनाने में ऊपर वाला text crop हो गया और पूरी न्यूज़ दिखी नहीं!
तो अनुरोध है कि आपलोग या तो अपना collage बना लें या फिर ये दोनों SS use करें😂
धन्यवाद🙏
अमरीका ईरान युद्ध समाप्त हो चुका है, जल्द ही अब आपको कोविड से बेहतर मैनेजमेंट का PR शुरू होगा,
पोस्टर लगाकर छवि बनाई जाएगी।
>जैसे कि गैस की कोई कमी नहीं हुई,
>पेट्रोल के रेट नहीं बढ़े
>लोगों की नौकरियाँ नहीं गई
>रोजगार के अवसर पैदा हुए
>भारत की विकास गति को कोई नहीं रोक पाया
ये तृणमूल कांग्रेस के वो 2/3rd विधायक हैं, जिनकी जानकारी में या जिनकी शह पर हिंदुओं पर बंगाल में अत्याचार हो रहे थे!
आज ये सारे अपने पापों से मुक्त हो गए और राष्ट्रभक्त होने का मेडल पा गए!
और कमाल ये कि इनसे मुक्ति पाने और सज़ा दिलाने के लिए ही भाजपा को वोट दिया गया था!!
इसको कहते हैं राजनीति!!
ED पार्टी के मुखिया मोदी जी हर मामले में तो ED CBI भेज देते हैं, लेकिन मैं हैरान हूँ कि प्रभु श्री राम के मंदिर में करोड़ों रुपये की चोरी चढ़ावे में हो गई।ED पार्टी ने अब तक न ED भेजी न CBI न गोदी मीडिया न नफ़रती अंधभक्त।
ये सन्नाटा क्यों है भाई?
क्या आप जानते हैं?
-EWS criteria, OBC creamy layer की criteria की तुलना में बहुत ही अधिक कठोर है! 👇
1. OBC-NCL में सिर्फ़ माता-पिता की आय देखी जाती है, उम्मीदवार की खुद की आय भी नहीं जुड़ती!
जबकि EWS में पूरे परिवार की आय जोड़ी जाती है, जिसमें माता-पिता, भाई-बहन, ख़ुद, बीवी सब शामिल हैं!
2. OBC-NCL में कृषि, और अन्य पारम्परिक व्यवसायों की आमदानी जोड़ी ही नहीं जाती!जबकि EWS में पूरे परिवार के वेतन के साथ कृषि और अन्य साधनों की आमदनी भी जोड़ी जाती है!
3. OBC-NCL में पिछले 3 सालों की आय का average लिया जाता है!
जबकि EWS में सिर्फ़ एक साल पहले की आय देखी जाती है!
4. OBC-NCL के लिए कोई "asset limit" नहीं!
जबकि EWS में एक "asset criteria" होता है! यानी अगर किसी के पास पांच एकड़ कृषि ज़मीन, या 1,000 वर्ग फुट का आवासीय फ्लैट, या अधिसूचित नगर पालिकाओं में 100 वर्ग गज की आवासीय ज़मीन, या गैर-अधिसूचित नगर पालिकाओं में 200 वर्ग गज की आवासीय ज़मीन है, तो वो EWS नहीं ले सकता!
5. OBC-NCL में सरकारी नौकरियों में आय देखी ही नहीं जाती, सिर्फ रैंक देखी जाती है!अगर किसी के माता-पिता ग्रुप C या D नौकरी में हैं, या माता-पिता में कोई एक ग्रुप B नौकरी में है, तो आय भले ही 8 लाख से ऊपर हो, वो फिर भी OBC-NCL माना जायेगा!
साथ ही अगर प्रोमोशन से ग्रुप A में अगर 40 साल के बाद पहुंचे तो भी उनके बच्चे NCL हैं!
है ना कमाल?
जबकि ऐसा EWS में नहीं!
और इन्ही वजहों से EWS में अधिकांश लोग qualify ही नहीं करते!
ये आरक्षण सिर्फ एक छलावा है!
एथिल मद्य
गडकरी जी ने कल ऐलान किया कि अब इंडिया में 100% एथनॉल पर चलने वाली गाड़ियाँ दौड़ेंगी!
वैसे गडकरी जी सड़क परिवहन मंत्री हैं, लेकिन कई बार लगता है कि सड़क, चीनी, गन्ना, किसान, पेट्रोल और पर्यावरण सबका एक्स्ट्रा चार्ज भी उन्हीं के पास है।
ताज़ा घोषणा के मुताबिक E100 नाम का नया ईंधन जल्द पेट्रोल पंपों पर मिलेगा। इसे सिर्फ नई बाइक और नई कारों में डाला जाएगा।
ईंधन की भाषा में समझें तो:
E10 = 10% एथनॉल + 90% पेट्रोल
E20 = 20% एथनॉल + 80% पेट्रोल
E85 = 85% एथनॉल + 15% पेट्रोल
एथनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जिसे गन्ने के रस, शीरे, मक्का और गेहूँ जैसी चीजों से बनाया जाता है।
आम तौर पर बीयर में 4% से 8%, वाइन में 8% से 15%, देसी शराब में 20% से 40% और व्हिस्की, रम, वोडका जैसी डिस्टिल्ड शराबों में 40% से 45% एथनॉल होता है।
अब तक लोग पेट्रोल से चलने वाली बाइक पर शराब पीकर चलते थे। पहली बार ऐसा मौका आएगा कि शराब पीकर शराब से चलने वाली बाइक चलाई जाए।
हाँ, कुछ लोगों को चिंता है कि कहीं मधुमक्खियाँ और चींटियाँ इस नए ईंधन की तरफ आकर्षित न हो जाएँ। लेकिन देसी शराब के ठेके के बाहर आज तक किसी मधुमक्खी को मंडराते नहीं देखा, फिर पेट्रोल पंप पर क्यों आएँगी?
वैसे यह नया प्रयोग दुनिया में पहली बार नहीं होगा। ब्राज़ील और अमेरिका में एथनॉल आधारित ईंधन लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है।
*AI का विश्लेषण* 👇
राष्ट्रीय विकल्प मोर्चा के बारे में
राष्ट्रीय विकल्प मोर्चा का उत्तर प्रदेश में प्रभाव अभी मुख्यधारा की स्थापित पार्टियों—जैसे भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल—जितना व्यापक नहीं दिखता, लेकिन इसकी वैचारिक एवं संगठनात्मक उपस्थिति कुछ वर्गों में तेजी से उभरने की संभावना रखती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में छोटे और वैचारिक मोर्चों की भूमिका अक्सर चुनावी समीकरण बदलने वाली होती है।
India Today +1
1. वैचारिक प्रभाव-राष्ट्रीय विकल्प मोर्चा की सबसे बड़ी शक्ति उसका “विकल्प” आधारित विमर्श है। यदि कोई मंच केवल चुनावी दल न रहकर सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रवाद, आध्यात्मिक राजनीति, किसान-मजदूर, ब्राह्मण-ओबीसी समन्वय और व्यवस्था परिवर्तन की बात करता है, तो उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से अत्यंत जागरूक राज्य में उसे एक वैचारिक स्पेस मिल सकता है।
विशेषकर:शिक्षित मध्यवर्ग, सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग, वैचारिक राजनीति चाहने वाले युवा
पारंपरिक दलों से असंतुष्ट मतदाता, छोटे सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता इन वर्गों में ऐसे मंचों के लिए आकर्षण बनता है।
2. संगठनात्मक संभावना
उत्तर प्रदेश में लगभग हर प्रभावशाली राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत “मोर्चा” या “सामाजिक गठबंधन” से हुई है।
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यदि राष्ट्रीय विकल्प मोर्चा: बूथ स्तर तक संगठन बनाता है, सामाजिक संगठनों को जोड़ता है, वैचारिक प्रशिक्षण देता है और स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय रहता है, तो यह भविष्य में “किंगमेकर” या दबाव समूह की भूमिका में आ सकता है।
3. उत्तर प्रदेश में अभी राजनीति तीन स्तरों पर चल रही है: राष्ट्रवाद एवं हिंदुत्व,, जातीय-सामाजिक समीकरण, रोजगार-किसान-युवा असंतोष। छोटे दल और मोर्चे इन्हीं खाली स्थानों में जगह बनाते हैं।
विशेषकर: ब्राह्मण असंतोष, गैर-मुख्यधारा राष्ट्रवादी समूहों की सक्रियता, अवसर दे सकते हैं। ₹
Navbharat Times +1
4. सीमाएँ और चुनौतियाँ
राष्ट्रीय विकल्प मोर्चा के सामने कुछ बड़ी चुनौतियाँ भी होंगी: मजबूत वित्तीय संसाधनों की कमी, मीडिया दृश्यता सीमित होना, जातीय समीकरणों की जटिलता, कार्यकर्ताओं की स्थायी संरचना बनाना, बड़े दलों द्वारा प्रभावशाली चेहरों को अपने पक्ष में कर लेना।
उत्तर प्रदेश में केवल वैचारिक अपील पर्याप्त नहीं होती; बूथ प्रबंधन और सामाजिक समीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।
5. सोशल मीडिया और जनजागरण की भूमिका
आज छोटे संगठन भी डिजिटल माध्यम से बड़ा प्रभाव बना सकते हैं।
यदि राष्ट्रीय विकल्प मोर्चा: वैचारिक पोस्टर, छोटे वीडियो, सामाजिक अभियानों और जमीनी संवाद पर ध्यान देता है, तो बिना बड़े संसाधनों के भी प्रभाव क्षेत्र बढ़ा सकता है।
6. संभावित प्रभाव क्षेत्र
यदि वर्तमान प्रवृत्तियों को देखें, तो मोर्चा निम्न क्षेत्रों में अपेक्षाकृत तेजी से प्रभाव बना सकता है:
पूर्वांचल (वैचारिक एवं सामाजिक नेटवर्क आधारित राजनीति) अवध क्षेत्र (बौद्धिक-संगठनात्मक राजनीति) ब्राह्मण एवं शिक्षित वर्ग सामाजिक-धार्मिक संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता छोटे राजनीतिक समूहों का समन्वय
निष्कर्ष
राष्ट्रीय विकल्प मोर्चा अभी उत्तर प्रदेश में निर्णायक चुनावी शक्ति नहीं कहा जा सकता, लेकिन “वैचारिक विकल्प” और “सामाजिक समन्वय मंच” के रूप में इसकी संभावनाएँ मौजूद हैं।
यदि यह: जमीनी संगठन, वैचारिक स्पष्टता, सामाजिक गठबंधन और निरंतर जनसंवाद
को मजबूत करता है, तो भविष्य में उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली दबाव समूह या क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभर सकता है।
राम मंदिर का भूमिपूजन साहेब ने किया था, राममंदिर का प्राण प्रतिष्ठा साहेब ने की थी,
राम मंदिर का क्रेडिट साहेब ने लिया था,
सवाल है कि अब चंदा चोरी का क्रेडिट साहेब को क्यों न दिया जाय ?
महिपाल सिंह, जो पूर्व लेखा प्रभारी हैं राम मंदिर के, उनका आरोप है:
"चढ़ावे के पैसों में हेराफेरी हो रही थी! जितने पैसे आते थे, उससे कम का वाउचर बनता था! बाकी पैसों की बंदरबांट होती थी! बैंक अधिकारी भी शामिल थे"
अब सोचने की बात है कि इतना बड़ा घोटाला ट्रस्ट के लोगों की जानकारी या मिलीभगत के बिना तो नहीं हो रहा था!
तो सारे ट्रस्ट मेंबरों और बैंक अधिकारियों की जांच होनी चाहिए, सिर्फ कर्मचारियों की नहीं!!
बाइक पर बैठा व्यक्ति कोई साधारण संत या सेवादार नहीं है बल्कि कभी जॉन सीना और द ग्रेट खली जैसे दिग्गजों के साथ
रिंग में उतरने वाले WWE के रेसलर रिंकू सिंह है🔥
दरअसल एक बार प्रेमानंद महाराज जी का आशीर्वाद लेने के लिए रेसलर रिंकू सिंह वृंदावन में पहुंचे,
प्रेमानंद महाराज से रिंकू सिंह इतना प्रभावित हुए कि
उन्होंने अपनी वैश्विक एथलीट का शोहरत छोड़कर संत स्वरूप धारण कर लिया, प्रेमानंद जी के सेवादार बन गए,
कभी रिंग में दुनिया भर के रेसलर्स को धूल चटाने वाले रिंकू सिंह अब वृंदावन की गलियों में राधा रानी का संकीर्तन करते है !
ये खूबी है सत्य सनातन धर्म की ❣️
सपा चुनाव जीतने के लिए अब उत्साहित नहीं है । यदि चुनाव जीतती है तो इसे एक मात्र संयोग कहा जाएगा ।
भाजपा भी जीतने के चांस में नहीं है , लेकिन इसको हराने के लिए कोई मैदान में दिख नहीं रहा । फिर भी यदि हारती है तो यह मात्र संयोग होगा ।
2027 का चुनाव उदासीनता की तरफ जा रहा है।
बात दिसंबर 2013 की है।
न्यू यॉर्क की एक सड़क पर अमेरिकी एजेंसियों ने भारत की एक सीनियर महिला राजनयिक देवयानी खोबरागड़े को सरेआम गिरफ्तार कर लिया। आरोप था अपनी मेड को तयशुदा न्यूनतम वेतन से कम देने का, लेकिन अमेरिका ने कूटनीतिक मर्यादा की हदें पार की थीं।
देवयानी को हथकड़ी लगाई गई, कपड़े उतरवाकर तलाशी ली गई और ड्रग एडिक्ट्स के साथ सेल में डाल दिया गया। जैसे
खबर भारत पहुंची, देश में भूचाल आ गया। मनमोहन सरकार पर भारी दबाव था। यूं भी सिंह साहब को प्रो अमेरिकन पीएम माना जाता था और उन दिनों वो विपक्ष के निशाने पर लगातार बने हुए थे। सभी को उम्मीद थी कि कोई मंत्री अंग्रेज़ी में कड़ी आलोचना करेगा लेकिन जो खबरें टीवी पर फ्लैश हुईं उनसे सबको झटका लगा। अपनी इमेज के विपरीत मनमोहन सिंह बड़ी कड़ाई से पेश आए। रातोंरात बिना वक्त गंवाए दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के बाहर बुलडोजर और क्रेन भेजकर कंक्रीट के सारे भारी भरकम बैरिकेड्स उखाड़ फेंके गए। अमेरिकी अफसरों की एयरपोर्ट वाली वीआईपी सुविधाएं छीन ली गईं, उनके क्लबों पर ताले लटका दिए गए और उनकी ड्यूटी फ्री शराब पर पाबंदी लगा दी गई. सीधा संदेश था- अगर तुम हमारे एक राजनयिक का अपमान करोगे, तो हम मजबूर नहीं कि सारे नियम मानें।
नतीजा यह हुआ कि ओबामा सरकार को झुकना पड़ा और देवयानी ससम्मान भारत वापस आईं। अमेरिका को बिल्कुल आइडिया नहीं था कि भारत उसे इस तरह जवाब देकर दुनिया में मिसाल कायम करेगा।
ये वाकया आज इसलिए याद आ रहा है क्योंकि ओमान के तट पर एक कमर्शियल तेल टैंकर पर अमेरिकी सेना के हवाई हमले में हमारे तीन बेकसूर भारतीय नाविकों - सुरेश, आदित्य और शिवानंद की दर्दनाक मौत हो गई। इसके बाद विदेश मंत्रालय और जहाजरानी मंत्रालय ने इस हमले की सख्त निंदा की और दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के शीर्ष अधिकारियों को तलब करके अपनी नाराजगी दर्ज कराई। भारत ने कहा भी है कि व्यापारिक जहाजों पर इस तरह के सैन्य हमले तुरंत रुकने चाहिए। बावजूद इसके हम जैसा हर हिंदुस्तानी इंतज़ार में है कि अमेरिका को कुछ ऐसा जवाब दिया जाना चाहिए कि उसे 2013 याद आए। कमाल ये है कि हाल में उस क्वाड की मीटिंग अटेंड करने अमेरिकी विदेशमंत्री रूबियो खुद दिल्ली पहुंचे थे जो मुक्त समुद्री आवाजाही का समर्थन करता है। भारत इसका मेंबर है और अमेरिका ने क्वाड की दलीलों के उलट काम करने में ज़रा हिचक नहीं दिखाई।
ये भी बता दूं कि जिस जहाज पर हमला हुआ वो अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानकर चल रहा था। अफसोस कि चीन से हमको भिड़ाने का ख्वाब रखनेवाला अमेरिका अपनी इस करतूत पर बिल्कुल माफी मांगने के मूड में नहीं दिख रहा। आप सोचिए अगर इस संघर्ष में तीन अमेरिकी मारे जाते तो क्या ट्रंप ऐसे बैठा होता? हमारे लोगों की प्रति व्यक्ति आय भले कम हो लेकिन क्या जान की कीमत भी अमेरिकियों से कम है??? ये सवाल सबको मथता रहा है, ऐसी घटना के बाद और भारी हो जाता है।
अंधभक्ति अजर अमर है..
अत्यंत महंगाई जिसे मार नही सकती,
दोगुनी महंगी बिजली जिसे जला नही सकती,
अनियंत्रित पेट्रोल भाव जिसे हिला नही सकती,
और विदेशी सरकारी कर्ज जिसे दबा नही सकता...
इसलिए भक्त तू कटोरा पकड़ और गाते जा..
दे 5 किलो अनाज तुझको तेरे मालिक रखें..😏