रुबाई -
कुछ लोग दुआ. बन के उतर जाते हैं,
कुछ. ख़्वाब निगाहों में ठहर जाते हैं,
तू भी.. मेरे दिल में यूँ.. बसा है जैसे,
कुछ नाम. ज़माने से अलग आते हैं।
#अशोक_मसरूफ़
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ग़ज़ल -
दिल की बस्ती में उजालों का सफ़र रहता है,
जब किसी याद का आँखों में असर रहता है।
धूप कितनी भी मुसलसल हो थकाती भी रहे,
पेड़ का काम मग़र लोगों का सर रहता है।
वक्त दरिया है, ठहरने की कहाँ आदत है,
जो भी ठहरा वही घाटे में मग़र रहता है।
लाख परदे हों निगाहों पे ज़माने भर के,
दिल का रिश्ता तो बिना शोर ख़बर रहता है।
जिसने सीखा है अँधेरों में भी हँसते रहना,
उसके चेहरे पे सदा नूर-ए-सहर रहता है।
दर्द जब हद से गुज़र जाए तो समझाता है,
आदमी टूट के भी कितना बिखर रहता है।
कुछ परिंदे कभी मंज़िल की तरफ़ उड़ते हैं,
कुछ के हिस्से में फ़क़त गर्द-ए-सफ़र रहता है।
हमने देखा है कि क़िरदार की दौलत वाला,
ताज बिन भी तो वो दिलदार निडर रहता।
#अशोक_मसरूफ़
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जब पाने और
न पाने में फर्क न रहे
किसी के होने का एहसास ही
खुशी दे जाए
तो समझो वो प्रेम है
प्रेम में किसी का
साथ होना नहीं
बस होना ही पर्याप्त है..।।
राधे राधे 🍀
छोटी ग़ज़ल -
शबनम ने रखी,रात की पेशानी पे शबनम,
ख़ामोश मोहब्बत की सदा लाती है शबनम।
सूखे हुए फूलों को भी जीना है सिखाती,
हर सुब्ह ही रुत लेके नई आती है शबनम।
जलते हुए लम्हों की तपिश कम सी हुई है,
सीने में ठहर भी कभी ये जाती है शबनम।
चुपचाप उतर��ी है ये अंधेरी शबों में,
टूटे हुए ख़्वाबों को भी थाम आती है शबनम।
मिट्टी की तड़प आज #ज़ुबाँ पा गई जैसे,
रोते हुए की भी है बुलाती ये है शबनम।
रह-रह के यही सोचता रहता है मिरा दिल,
क्या जाने कहाँ से तो ख़बर पाती है शबनम।
पेशानी - माथा
#अशोक_मसरूफ़
#गीतमाला #ज़ुबाँ
छज्जा और तुम-
पुराने घर का एक छज्जा था,
ज��ाँ शामें अक़्सर
धीरे-धीरे उतरती थीं।
नीचे गली में
बच्चों का शोर था,
दूर किसी घर से आती
चाय की ख़ुशबू।
तुम रेलिंग पर झुके हुए,
आसमान का रंग बदलते देखते रहे,
और मैं चुपचाप
तुम्हें देखता रहा।
उस वक़्त लगा,
सुकून किसी जगह में नहीं,
किसी साथ में छिपा होता है।
बरसों बाद भी,
उस छज्जे की याद नहीं आती,
तुम्हारी आती है।
शेर-
छज्जा वही है,शाम भी वैसी ही ढल रही,
बस एक तेरी कमी हर दृश्य में खल रही।
#���शोक_मसरूफ़
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माँ--
माँ अक्सर
घर की सबसे साधारण दिखने वाली शख़्सियत होती है,
मग़र उसकी अनुपस्थिति
सबसे पहले महसूस होती है।
वह हर कमरे में नहीं होती,
फ़िर भी पूरा घर
किसी न किसी तरह
उससे जुड़ा रहता है।
कभी रसोई की खुशबू में,
कभी दरवाज़े पर इंतज़ार में।
वह अपने हिस्से की थकान छुपाकर
सबके हिस्से की चिंता करती है।
उसकी दुआएँ
ज़्यादा दिखाई नहीं देतीं,
मग़र कई मुश्किल रास्तों पर
साया बनकर चलती हैं।
वह ख़ुद कम माँगती है,
मग़र सबके लिए बहुत कुछ चाहती है।
उसकी ख़ुशी का रिश्ता
अ��़्सर अपनी ख़ुशी से नहीं होता।
समय बीतता रहता है,
बच्चे बड़े हो जाते हैं।
मग़र माँ की नज़र में
वे उतने ही रहते हैं।
शायद इसी लिए
माँ सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं होती,
वह उस पेड़ की तरह होती है
जिसकी छाँव का एहसास
धूप में निकलने के बाद समझ आता है।
#अशोक_मसरूफ़
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“मोहब्बत का एहसास”
जैसे
...सर्द सुबह में उतरती सुनहरी धूप
जैसे
...सूने आँगन में चिड़िया की चहक
जैसे
...सूखी मिट्टी पर पहली बारिश
जैसे
...उदास चेहरे पर लौटती मुस्कान
जैसे
...बिना माँगे मिल जाए ��ोई दुआ
वैसी ही होती है
मोहब्बत,
जो जीवन को चुपचाप
ख़ूबसूरत बना देती है।
#अशोक_मसरूफ़
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रूबाई -
तेरी बातों में अजब प्यार की ख़ुश्बू है कहीं,
मेरी.. रूहों में उतरती... हुई जादू.. है कहीं,
एक.. मुद्दत से जिसे... ढूँढ रहा था ये दिल,
तेरी.. सूरत में वही ख़्वाब है मेरा भी कहीं।
#अशोक_मसरूफ़
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