संस्कृत बोली का जन्म कब, कैसे और कहाँ पर हुआ?
संस्कृत भाषा किस भाषा से टकरा कर बनी और बोली के रूप में गायब कब और कैसे हुई?
भाषा बनने के लिए लिखित रूप में किस लिपि का प्रयोग किया और इसके एविडेंस क्या है?
संस्कृत बोली या भाषा इसपर आजके हिंदू ब्राह्मणों का कब्जा कबसे है?
@ChapraZila Jab obc/sc/st ke hisse ki sari jameen general warg ke pass hai. To wo bechare kaha upale pathe. Iss bridge banane me kitna bhrastachari hui hogi us pr to video nhi banaye.
@HarshBh78359620@nehafolksinger Jo bhi baat aapne kahi hai . Science journey yt channel pr saboot ke sath sabit kro.nhi to WhatsApp university knowledge hi mana jayega.
क्या राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस मनाना उचित है ?
क्या योगदान है इनका भारतीय समाज में शिक्षा योगदान में ?
जबकि भारत में आधुनिक शिक्षा की मशाल देश की आधी से ज़्यादा आबादी के लिए माता सावित्री बाई फूले ने जगाई।
#TeachersDay#सर्वपल्ली_राधाकृष्णन
@umda_panktiyaan *12,212 नहीं, 13,212 लिखा जाएगा*
इसमें यही सबसे बड़ी गलती होती है।
समझो ऐसे:
- बारह हजार = 12,000
- बारह सौ = 1,200
- बारह = 12
अब जोड़ो: 12,000 + 1,200 + 12 = *13,212*
लोग गलती से इसे *12,12,12* या *121212* लिख देते हैं, जो गलत है।
प्रिय धम्म मित्रों,
जीवन में अनेक बार हम एक अदृश्य बाढ़ के बीच खड़े अनुभव करते हैं—विचारों की, भावनाओं की, परिस्थितियों की। हम अक्सर यह सोचते हैं कि या तो हमें पूरी शक्ति से संघर्ष करना चाहिए या फिर सब कुछ छोड़कर स्थिर हो जाना चाहिए। किन्तु धम्म का मार्ग कभी-कभी इन दो छोरों से परे होता है। आज का चिंतन भगवान बुद्ध के एक अत्यंत सूक्ष्म और गहन संवाद पर आधारित है, जो हमें जीवन की बाढ़ को पार करने की कला सिखाता है।
मुख्य उपदेश:
ऐसा मैंने सुना है। एक समय भगवान श्रावस्ती में जेतवन में अनाथपिंडक के उपवन में रह रहे थे। फिर, जब रात का एक बड़ा हिस्सा बीत चुका था, तो असीम सौंदर्य वाला एक देवता, जिसने पूरे जेतवन को प्रकाशित कर दिया, भगवान के पास आया। पास आकर, उसने भगवान को प्रणाम किया, एक तरफ खड़ा हो गया और उनसे कहा:
"हे शास्ता, आपने बाढ़ को कैसे पार किया?"
"मित्र, न रुककर और न ही जोर लगाकर मैंने बाढ़ को पार किया।"
"लेकिन ऐसा कैसे, शास्ता, कि न रुककर और न ही जोर लगाकर आपने बाढ़ को पार किया?"
"मित्र, जब मैं स्थिर हुआ, तो मैं डूब गया
लेकिन जब मैंने संघर्ष किया, तो मैं बह गया।
इसी तरह, मित्र, न रुककर और न ही प्रयास करके मैंने बाढ़ को पार किया।"
देवता:
"लंबे समय के बाद आखिरकार मैं देखता हूँ
एक ब्राह्मण जो पूरी तरह से शांत है,
जो न रुककर, न जोर लगाकर,
इस दुनिया—भर से आसक्ति को पार कर लिया है।"
तथागत से उस देवता ने ऐसा कहा। शास्ता ने अनुमोदन किया। फिर उस देवता ने यह सोचकर कि, "शास्ता ने मेरा अनुमोदन किया है," भगवान को सादर प्रणाम किया, उनकी परिक्रमा की और वहीं अंतर्ध्यान हो गया।
चिंतन:
इस संवाद में भगवान बुद्ध ने एक अत्यंत गहन सत्य को अत्यंत सरल शब्दों में प्रकट किया है। जीवन की बाढ़ अर्थात् तृष्णा, आसक्ति और अज्ञान का प्रवाह। जब कोई व्यक्ति इस प्रवाह के सम्मुख पूर्णतः स्थिर हो जाता है—अर्थात आलस्य, प्रमाद या भय के कारण प्रयास करना ही छोड़ देता है—तो वह डूब जाता है। दूसरी ओर, जब वही व्यक्ति केवल इच्छाशक्ति, अहंकार या बलपूर्वक संघर्ष के द्वारा परिस्थितियों को नियंत्रित करने का प्रयास करता है, तो वह बह जाता है।
यहाँ "न रुकना" का अर्थ है—धम्म के मार्ग पर सजगतापूर्वक निरंतर चलते रहना, किन्तु बिना किसी तनाव या आग्रह के। "न जोर लगाना" का अर्थ है—बिना अहंकारपूर्ण इच्छा, बिना "मैंने पार करना ही है" की जिद के, केवल कारण और परिस्थितियों को सहज रूप से जानते हुए। यही मध्यम मार्ग है—प्रतीत्यसमुत्पाद की वह सूक्ष्म समझ, जहाँ न तो शाश्वत दृष्टि से चिपकना है और न ही उच्छेद दृष्टि से। यह सजगता (Mindfulness) और प्रज्ञा (Wisdom) का वह संतुलन है, जहाँ व्यक्ति करता हुआ भी कर्तापन के अहंकार से मुक्त रहता है।
देवता के शब्दों में "ब्राह्मण" शब्द उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसने सभी आसक्तियों को पार कर लिया है। यह जाति से नहीं, आचरण और प्रज्ञा से ब्राह्मण है। ऐसा व्यक्ति संसार की तीव्र धारा में भी शांत रहता है—न अकर्मण्य रहता है, न व्यर्थ संघर्ष करता है। वह केवल सजगतापूर्वक, करुणापूर्वक और प्रज्ञापूर्वक उस क्षण में उपस्थित रहता है। यही वह स्थिति है, जहाँ से दुःख की धारा पार की जा सकती है।
इस उपदेश का सार हमारे दैनिक जीवन में कितना प्रासंगिक है। हम अपने संबंधों में, कार्यों में, साधना में या तो अत्यधिक कठोर हो जाते हैं या अत्यधिक ढीले। किन्तु बुद्ध का मार्ग हमें इन दोनों छोरों के बीच की उस जागरूक समझ की ओर इंगित करता है, जहाँ प्रयास है, परन्तु आसक्ति नहीं; निरंतरता है, परन्तु तनाव नहीं; स्वीकार है, परन्तु प्रमाद नहीं।
अब इसी चिंतन के आधार पर, शांत मन से स्वयं से पूछें:
क्या मैं अपने जीवन की चुनौतियों का सामना करते समय किसी एक छोर—अत्यधिक संघर्ष या अत्यधिक निष्क्रियता—में अटक तो नहीं गया हूँ?
क्या मैं बिना कर्तापन के अहंकार के, केवल सजगतापूर्वक अपने वर्तमान क्षण में उपस्थित रह पाता हूँ?
क्या मैं उस "मध्यम मार्ग" को पहचानता हूँ, जहाँ जीवन की धारा को न तो रोका जाता है और न ही अनियंत्रित रूप से बहने दिया जाता है?
आपका हृदय इन प्रश्नों पर जो अनुभव करे, उसे यदि उचित लगे, तो कृपया टिप्पणी में साझा करें। आपके मौन और आपके अनुभव दोनों ही इस धम्म-संवाद को समृद्ध करते हैं।
#धम्मचिंतन #मध्यममार्ग #सजगता #प्रज्ञा #शांति
नमो बुद्धाय।
@IndiaPostOffice India post walo scientific temperament ko increase kro. Itane bade sansthan me scientific temperament hai hi nhi. Ram Charitra manas padho. Aur science journey sir se yt pr live aao.
ओबीसी की जनसंख्या 51% जबकि पंचायत में आरक्षण मात्र 15 % और पंच में मात्र 12.59 %.
फिर भी ओबीसी हिंदू सूख में सो रहा?
जागो पिछड़ो जागो कम से कम अपनी जनसंख्या प्रतिशत अनुसार अपने राइट्स ले लो अन्यथा इतिहास में ये डार्क टाइम बनकर रह जाएगा।
भविष्य के ओबीसी बच्चे पूछेंगे की जब आधी से ज़्यादा जनसंख्या ओबीसी की थी तो क्या हमारे पुरखे कायर थे ? गुलाम थे? लोकतंत्र होने के वावजूद कुछ नहीं कर पाए?