सुप्रीम कोर्ट ही मोदी जी के SC/ST Act पर थोड़ी बहुत सेंसिबल बातें अलग-अलग निर्णयों के माध्यम से कर रहा है। 2018 का मास्टरस्ट्रोक हम सह ही रहे हैं। आज कहा है कि निजी कमरे में या घर में यदि ऐसा कुछ होता है तो उसे आप इस क़ानून के दायरे में नहीं ला सकते।
आज सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि केवल SC/St एक्ट लग जाने मात्र से किसी को एंटीसिपेटरी बेल नहीं देना, अनुचित है यदि प्राथमिक रूप से एक्ट का दुरुपयोग दिखे। यही बात जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने कुछ समय पूर्व कहीं थी।
एक अन्य निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जातिगत गाली/कार्य जब तक सार्वजनिक तौर पर ना हुआ हो, उसे इस एक्ट के दायरे में नहीं लाया जा सकता। एक निर्णय में केरल हाई कोर्ट ने कहा कि यदि केस संदिग्ध या राजनैतिक लक्ष्य साधने के लिए हो तब भी बेल दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट एवं अन्य हाई कोर्ट ने यह भी कहा है कि किसी SC/ST व्यक्ति को गाली मात्र देने से एक्ट नहीं लगेगा, जब तक कि गाली सार्वजनिक तौर पर, उसकी जाति से संबद्ध ना हो। कन्वर्ट लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने इसके प्रयोग की अनुमति नहीं दी है।
सेक्शन 18, जिसमें पूर्व बेल पर पूर्णतः रोक है, तभी लागू किया जा सकता है जब FIR में स्पष्ट हो कि जातिगत भेदभाव से प्रेरित हो कर अपराध हुआ है।
फिर भी, मैं सबसे यही कहूँगा कि बच कर रहें, कोर्ट हाथ पर हाथ धरे रह जाएगी यदि सरकार ने चाह लिया कि आप उनकी राजनैतिक रोटी फुलाने के लिए आग पर गर्म किए जा सकते हो।
“Why are you crying about the re-exam? It’s not like you’ll forget everything you studied in a few weeks. If you are a good student, you can study again and still score well.”
Well, that’s not how things work. Competitive examinations are not merely tests of knowledge, but also tests of timing, mental conditioning, emotional stability, and peak performance achieved after months or years of disciplined preparation. Serious students structure their entire routine around one examination date, carefully managing sleep, revision cycles, stress levels, mock tests, and mental sharpness to perform at their absolute best on that particular day.
When an exam is cancelled despite their honest effort, they are forced to recreate the same level of focus and intensity again, which is mentally exhausting and usually impossible with the same efficiency.
The hardest-working students are affected the most because they invest the greatest emotional and mental energy into preparation. After the first exam, many experience burnout, fatigue, reduced concentration, emotional numbness, and loss of momentum. Even if their knowledge remains intact, their sharpness may decline during the re-exam.
Most damaging of all, paper leaks weaken a sincere student’s faith in merit itself. When students realize that even years of hard work cannot protect them from systemic failures caused by others’ dishonesty, it creates frustration, helplessness, and distrust toward institutions.
This is why a leak-proof exam is non-negotiable, the bare minimum that can be done for hard working students.
NEET 2026 पेपर लीक पर यदि हम शिक्षा मंत्री जी और पूर्व NTA DG सुबोध कुमार सिंह की जातियाँ बता दें तो क्या कॉन्ग्रेसी दलाल कह दिए जाएँगे? पेपर लीक की घटना के बाद उन्हें सस्पेंड नहीं किया, थोड़े दिन हटा कर रखा फिर, इनके रहमोकरम से सुबोध जी छतीसगढ़ चला रहे हैं।
सरकार कुछ नहीं करेगी क्योंकि सरकार चुनाव जीत रही है। वही एक मात्र मापदंड बचा है अब गवर्नेंस का। आपको कट्टर समर्थक बता देंगे कि मोदी जी की लोकप्रियता अखंड और अक्षुण्ण है, इसलिए ये सब बात जो भी कर रहा है वो सोरोस का एजेंट है।
इसके बाद आप कुछ बोल नहीं सकते। नए DG भी कुछ बढ़िया नहीं ही कर रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान जी मंत्रालय चलाने की जगह हर वह कार्य करते हैं जो मंत्री का नहीं है। मोदी जी की कौन सी विवशता है कि इस व्यक्ति को ढोया जा रहा है, समझ में नहीं आता।
पेपर लीक थम नहीं रहा। माफिया को हाई कोर्ट बेल नहीं देती तो सुप्रीम कोर्ट से मिल जाता है। कंपनी ब्लैकलिस्ट होती है, फिर कुछ समय बाद उसे ही काम मिल जाता है, या मालिक नई कंपनी बना कर काम ले लेता है।
आप इस सरकार में अपवाद रूप में ही कभी सुनोगे कि किसी अधिकारी को निलंबित किया गया या निकाला गया। मंत्री तो रहने ही दीजिए। और ये लोग शिक्षा को डिकोलोनाइज़ करने निकले थे। &% हो रहा है डिकोलोनाइज़।
जब मैंने कहा था कि धर्मेंद्र प्रधान को अपमानित करके (कहा तो मैंने कुछ और ही था) कैबिनेट से निकाला जाना चाहिए, तो कई लोगों को (UGC के कारण मेरे सरकार विरोध में होने से) समस्या हो गई थी।
इस नकारे मंत्री के कार्यकाल में NEET 2026 रद्द हो गई। इनसे पेपर लीक रुक नहीं रहा, DU में सवर्ण सहायक प्रोफेसरों को चिह्नित करके निकाला जा रहा है, VC वामपंथी लेख लिख रहे हैं, नई शिक्षा नीति लागू हो रही है पर पन्नों में ब्राह्मण ब्रिटिश को न्योता दे कर बुलाता दिखाया जा रहा है, NCERT में आज भी डिस्टॉर्टेड इतिहास पढ़ाया जा ही रहा है, फिर यह व्यक्ति क्या एक प्लेस होल्डर मात्र है?
हर 58 मिनट में एक छात्र आत्महत्या करता है। उसका कारण स्ट्रेस है, चिंता है, असफलता है, तंत्र द्वारा उसकी परीक्षा लेना है। निर्धन छात्र पैसे ले कर नए नगर में परीक्षा देने जाता है, प्लेटफार्म पर अख़बार बिछा कर सोता है, सड़क किनारे जल पीकर परीक्षा देता है कि एक दिन परिणाम आने पर उसकी चिन्ताएँ समाप्त हो जाएँगी, पर तंत्र उसे तड़पाता रहता है।
धर्मेंद्र प्रधान एक निकृष्ट और नकारा नेता है, उस से भी गया०बीता मंत्री। ऐसे लोगों को कोई घर का गराज संभालने ने दे, ये देश की शिक्षा घंटा सँभालेगा? @narendramodi जी, यदि UGC के 118 दिन बाद आपकी सरकार ने सवर्णों को औक़ात दिखा दी हो, और आपका ईगो शांत हो गया हो कि क्या उखाड़ लिया, गुजरात निगम और असम-बंगाल चुनाव जीत गए, तो प्लीज़ इस निकम्मे धर्मेंद्र प्रधान को विदा कीजिए।
यदि, चुनाव के आँकड़े ही आपके लिए एक मात्र मोटिवेशन हैं और देश की शिक्षा गर्त में जाते अच्छी लगती है, तो फिर कोई बात नहीं, UP चुनाव के लिए रैलियाँ कीजिए।
श्री मोहन जी भागवत से अनुरोध है कि आप एक 13वाँ ज्योतिर्लिंग भी स्थापित करें नीले पत्थर का। बंगाल में तो 'SC/ST ने जिताया' है, तो अब पंचतीर्थ के पश्चात् इतना तो कर हो सकते हैं।
'भारत माता' स्वयं मातृभूमि हैं, देवी हैं, उनको दुर्गा बनाने का कोई अर्थ नहीं। 'वंदे मातरम्' में ही उन्हें दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती कहा गया है। मैं कहता हूँ भागवत बौरा गया है तो लोग कहते हैं कि मेरी भाषा ख़राब है।
नहीं मंडल, तू दीमक है भाजपा का। तुमने स्पष्ट लिखा कि बंगाल के सवर्ण और मुस्लिम साथ रहे हैं। तुमने स्पष्ट बताया है कि बंगाल और सवर्ण और OBC अवसरवादी हैं जिन्होंने समय देख कर पाला बदला है।
बंगाल के कुलीन ब्राह्मणों को संदेशखाली के बलात्कारी शाहजहाँ के समकक्ष कहना, सत्ता की गोदी में बैठ कर, उन ब्राह्मणों-कायस्थों-वणिकों-क्षत्रियों पर थूकने जैसा है।
वह भी तब जब बंगाल ने एकमुश्त वोट हिन्दुत्व के नाम पर दिया है। इस जातिवादी अजेंडा का परिणाम तुम शायद न भोगो, पार्टी को तुम भोगवाकर जाओगे।
कार्यकर्ता मरते हैं तो उनको चुनावों में भुनाया जा सकता है। तब हिन्दुत्व की याद आती है। तब पूरे समाज को एक होने का ज्ञान दिया जाता है।
जीतते ही ‘बदला नहीं बदलाव’ के मौगेपन से आरंभ होती नीति, जातिवादी नीचपने तक उतर आती है।
परिणाम: कार्यकर्ताओं की हत्या और हिन्दुत्व के नाम पर एक होते समाज में अंबेडकर की एंट्री।
कर्नाटक के बंगलुरु से एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। 34 वर्षीय वेंकटरामन को छाती में पीड़ा हुई तो पत्नी ने बाइक पर बिठाया और एक प्राइवेट हॉस्पिटल ले गई। वहाँ से उसे बिना किसी प्राथमिक चिकित्सा के लौटा दिया गया क्योंकि वहाँ एक भी डॉक्टर नहीं था।
वहाँ से वह दूसरे हॉस्पिटल गई, जहाँ पता चला कि वह एक मायनर हार्ट अटैक था, लेकिन उसे वहाँ भी ट्रीटमेंट नहीं मिला। हॉस्पिटल के पास एक एम्बुलेंस भी नहीं था।
ऐसी स्थिति में पत्नी ने पुनः विवशता में, पति को बाइक पर बिठाया ताकि किसी तीसरे हॉस्पिटल में ले जाए। रास्ते में बाइक का एक्सीडेंट हो गया। पति सड़क पर गिरा रहा, वह आने-जाने वालों से सहायता के लिए पुकारती रही। कोई नहीं रुका।
अंततः पति की मृत्यु हो गई।
वेंकटरामन बच जाता यदि सरकार हॉस्पिटल को ले कर सजग होती, उसकी बनाई नीतियों का पालन होता। मैं जहाँ से हूँ, वहाँ के छोटे से छोटे क्लिनिक में भी रात में या तो डॉक्टर होता है, या वह पाँच मिनट में वहाँ पहुँच जाता है।
बंगलुरू जैसी जगह में रात में एक एम्बुलेंस तक का न मिलना बताता है कि प्रशासनिक अराजकता किस स्तर की है। और हाँ, जिस नगर में लोग मरते व्यक्ति के लिए भी न रुकते हों, वह संवेदनहीन नगर बेकार है।
हताहत इंदौरी ने नरक से गजल भेजी है -
यहां यमदूत बहुत पीट रहे हैं, जन्नत इसका नाम थोड़ी है।
चित्रगुप्त हिसाब कर रहे हैं, किसी हूर का निज़ाम थोड़ी है।
ओसामा है, कसाब है और अफजल भी है यहां, यह कोई खुदा या फरिश्तों का मुकाम थोड़ी है।
घूमते हैं हर तरफ़ लिजलिजे सूअर यहां, बहत्तर हूरों का जाम थोड़ी है।
भरे पड़े हैं तमाम भारत के गद्दार मेरे ही जैसे यहां, किसी मुल्क की शरीफ अवाम थोड़ी है।
मुल्क की गद्दारी पे सौ - सौ बार इंदौरी को "लानत" है, उसी की सज़ा मिली है, खिदमत का इनाम थोड़ी है।
- हताहत इन्दौरी सांप।
भंडारे में जाते हैं तो खाना ख़त्म मिलता है । बाहर आते हैं तो चप्पल गायब मिलती है। ये हाल है कांग्रेस का। डायनासोर आ सकता है, कांग्रेस वापसी नहीं कर सकती। ये कोई और नहीं, उद्धव शिवसेना के नेता आनंद दुबे ने आज तक चैनल पर कहा। live शो में ऐसा धोया कि कांग्रेस प्रवक्ता देखते रह गए, सुधांशु मुस्कुराते हुए मजे लेते रहे और अंजना ओम कश्यप को ऑफ़ स्क्रीन जाना पड़ा। हँसी रुक ही नहीं रही थी। @ocn_network
Sanghis are sharing this video claiming it’s hate speech against Hindus.
We ran a fact-check. For foolproof checking, we invented a new language called gulu-gulu ten mins ago, in which we decided that kafir will mean “hate” and mushrik will mean “violence.”
We applied the gulu-gulu translation to the video and found that the man is actually saying Muslims cannot be friends with hate and violence, and they should kill them, i.e. remove them from their lives, meaning, live with love and peace.
Verdict: Bigot Sanghis shared the video with misleading context. Shame on them. Donate to theskindoctor13@oksbi so we can continue doing such fact-checks.
Jackie began his career with minor roles but got his big break with Subhash Ghai's movie, Hero. He ruled over Bollywood in 80s and 90s, winning awards for Parinda, Rangeela, etc. He gradually shifted to character roles and his awesome screen presence is intact over the years.