कोविड-19 की ऐलोपैथिक दवाओं के साथ साथ जड़ी बूटियों एवं मसालों के विभिन्न नुस्खों को प्रयोग करके देखना उचित होगा। अगर गंभीर रोगियों को नहीं, तो जो भी अन्य लोग क्वारंटीन किये गये हैं, उनके उपचार में आयुर्वेद को सम्मिलित करने का निवेदन है। @drharshvardhan@narendramodi
मेरी सोसाइटी डिवाइन ग्रेस के गार्ड द्वारा मुझे शाम तक गोली मार देने की धमकी दी गई है । यथार्थ चौकी इंचार्ज को बीटा थाने के SHO महोदय के नाम तहरीर दी है । उचित कारवाही करने और प्राण रक्षा की गुहार लगाता हूँ । सिक्योरिटी एजेंसी का क्रियाकलाप भी संदिग्ध है । इसकी भी जाँच की जाए 🙏
ग्रेटर नोएडा के ओमेगा 1 स्थित #द्विव्य_उपवन का बहुत ही बुरा हाल है । शीर्ष अधिकारी ध्यान दें । सप्ताह में केवल एक दिन किसी भी सेक्टर के किसी पार्क की बदहाली देख लें तो स्थिति में सुधार आने की संभावना है ।
@npclgrnoida@AKSharmaOffice@CMOfficeUP@myogiadityanath@OfficialGNIDA
Initially it was said that will be resolved by 12:30pm. All of sudden timing is no more in status and when asked status is below
Dear Customer, You are part of an existing area outage and will be resolved as per the defined SLA-NPCL.
Tender for the purchase of expensive BMW cars for its members does not augur well for the institution of Lokpal.
Simple living and high performance is the hallmark of an anti-corruption ombudsman. Where is the performance?
If you are fortunate to be appointed an umpire, be a Simon Taufel than a Steve Bucknor, no matter who appointed you. A Simon Taufel is always admired and respected.
सेवा विस्तार कमज़ोर सिविल सेवा को और कमज़ोर करता है। सेवा में रहते हुए, आप ग़लत काम के लिए 'ना' कह सकते थे। नतीजा तबादला होता था। परंतु, सेवा विस्तार के बाद नौकरी छोड़ने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं होता। 'जी-हुज़ूरी' करने वाले लोग अपने स्वार्थ के लिए जनहित से समझौता करते हैं।
Slapping for not knowing the local language is condemnable. But, outsiders too must make an effort to learn the local language.
It is the State's duty to open adequate number of free learning centers where outsiders can learn to read and speak the local language.
सूरजपुर–कासना रोड पर जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय के निकट #GNIDA द्वारा एक फुट ओवर ब्रिज(FOB) का निर्माण किया जा रहा है। कार्य तेजी से जारी है, जिसे अगले माह तक पूरा किया जाएगा। इससे पैदल चलने वाले राहगीरों को सुरक्षित सड़क पार करने में सुविधा मिलेगी।
#DevelopmentWork
The players are enabled to give their competitive best when the umpire is perceived fair. On the contrary, an unfaithful umpire will kill the match.
ECI is like the umpire in a cricket match. It must not only act fair, but must be perceived so by the contestants.
मैं ब्राह्मण क्यों नहीं हूं?
यह प्रश्न नहीं है, यह एक कुण्ठा है, जिससे इस देश का एक बहुत बड़ा वर्ग कुण्ठित है। इसमे सिर्फ हिंदू ही नहीं वरन् कुछ अन्य मजहब और रिलिजन के लोग भी शामिल है।
इस विषय पर कितने ही वीडियो, लेख, ट्विट, फेसबुक, इंस्टाग्राम सब जगह लिखे गए। सही-गलत के निर्णय दिए गए। लेकिन जो मूल समस्या (core issue) है उस पर किसी ने प्रकाश नहीं डाला। अब कोर इशू क्या है?- इसको समझने के लिए हमें लगभग 40 वर्ष पीछे जाना पड़ेगा।
स्वर्गीय कांशीराम जी का एक साक्षात्कार दैनिक जागरण में 1984-85 में छपा था। बहुत ही विस्तृत साक्षात्कार, लगभग पूरा एक पृष्ठ का। पत्रकार ने उनसे दलितों (अब यह शब्द अपना अर्थ खो चुका है, लेकिन फिर भी चूंकि प्रचलन में है तो मैं भी प्रयोग कर रहा हूं) की स्थिति, दलित सशक्तिकरण, दलितों के “बहुजन समाज” होने के बावजूद उनका सत्ता से दूर रहना, उनकी कठिनाइयां, कुंठाएं इत्यादि इन सभी विषयों पर बात की थी। उसमें जो सबसे मार्मिक प्रश्न था वह इस प्रकार था-
प्रश्न: आपको दलितों की कौन सी सोच सबसे अधिक उद्वेलित करती है और कष्ट देती है?
उत्तर : दलितों को हजार समझाने के बाद भी उनके मन से “विकसित” होने का मानदंड बदलता ही नहीं। सबसे अधिक जो बात मुझे उद्वेदित करती है और कष्ट देती है वह यह है कि हर दलित विकसित होकर ‘ब्राह्मण’ बनना चाहता है।
काशीराम जी एक अच्छे विचारक थे और उन्हें समाज की बहुत अच्छी समझ थी। उनका उत्तर बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने आगे कहा था कि दुर्भाग्य यह है कि सिर्फ दलित ही नहीं अन्य जातियां भी विकसित होकर ब्राह्मण ही बनना चाहती हैं। जब आपका लक्ष्य ही ब्राह्मण बनना है तो ब्राह्मणों की श्रेष्ठता तो आप खुद ही स्थापित कर रहे हैं। इसी भ्रम को, इसी मानदंड को, इसी सोच को मैं बदलना चाहता हूं’।
इटावा में जो घटना हुई उसके मूल में भी यही है। प्रश्न यह नहीं है कि कौन सी जाति कथा वाचन कर सकती है कौन नहीं कर सकती। आदिकाल से सभी जातियां कथा वाचन, भक्ति, पूजा करती आ रही हैं। हर जाति में महापुरुष हुए हैं, हर जाति में संत हुए हैं और बहुत महान संत और दार्शनिक हुए हैं, जिनका सम्मान ब्राह्मणों ने भी किया है। सभी को ईश्वर की आराधना करने और ईश्वर के गुणगान करने का अधिकार है। साधारण भाषा में कहें तो कथा-वाचन ईश्वर का गुणगान है।
परंतु असली प्रश्न यह है कि अपनी जाति को प्रकट करके यह क्यों नहीं किया जा सकता? किसी दलित को मुकुट मणि ‘अग्निहोत्री’ या किसी यादव को ‘तिवारी’ बनना आवश्यक क्यों है? जब तक यह कुण्ठा बाहर नहीं निकलती तब तक इनका पूर्ण विकास कभी नहीं हो सकता। और इस कुण्ठा से अधिकांश निकल ही नहीं पाते । यह आज से नहीं, आदिकाल से है। विश्वामित्र क्षत्रिय थे लेकिन उन्हें भी ब्राह्मण बनना था। शंबूक को भी ब्राह्मण बनना था। मुकुट मणि को भी ‘अग्निहोत्री’ (ब्राह्मण) बनना है। श्रेष्ठता के जो मानदंड ब्राह्मणों ने स्थापित किया अन्य उन्हें ही महानतम मानदंड मानते हैं तो फिर लड़ाई किस बात की है?
मायावती भी ब्राह्मणों की तरह ‘चरण छू’ में सबसे अधिक गौरव महसूस करती हैं। चंद्रशेखर ‘रावण’ है जिसे यह तक पता नहीं है कि वह ‘रावण’ बनने का प्रयास कर रहा है और रावण स्वयं ब्राह्मण था। रावण कोई साधारण ब्राह्मण नहीं था। उस युग में उसके समान धनवान, गुणवान, विद्वान, शास्त्रज्ञ, रणनीतिकार और कोई नहीं था। कर्नाटक में ब्राह्मण विरोधी गौरी “लंकेश” को भी “लंकेश” ही बनना था।
मुझे समझ नहीं आता की सारे ब्राह्मण-द्रोही ‘विकसित’ होकर ‘ब्राह्मण’ ही क्यों बनना चाहते हैं? यदि ब्राह्मणों के बनाए मानदंड ही सर्वश्रेष्ठ हैं तो फिर चुपचाप अपने घर में बैठो ना।
न तो ब्राह्मणों ने अपनी जाति चुनी है और ना आपने। इसमें दोनों का कोई गुण या दोष नहीं है। ना किसी की श्रेष्ठता प्रकट होती है और ना किसी की निम्नता। यह विधि का विधान है या संयोग है कि कौन कहां पैदा हुआ। या यदि पुनर्जन्म और धर्म ग्रंथो को माने तो यह कर्म/प्रारब्ध के अनुसार निर्धारित होता है यानी पूर्व जन्म के कर्म के अनुसार।
मेरी सोच यह है ब्राह्मण बनने की बचाए अपने को इतना श्रेष्ठ करो कि ब्राह्मण स्वयं आपका सम्मान करें। ऐसे अनेक उदाहरण है- माता अमृतानंदमई के चरण लाखों ब्राह्मण छूते हैं, जबकि उनका जन्म शूद्र वर्ण में हुआ था। गंगूबाई हंगल शास्त्रीय संगीत की महान गायिका थी जिनका जन्म भी शूद्र वर्ण में हुआ था। लेकिन जब इन्होंने गायन की ऊंचाइयों को प्राप्त कर लिया तो अनेकानेक ब्राह्मण इनको अपने घर बुलाकर भोजन कराते थे और सम्मान करते थे पैर भी छूते थे।तो भाई जाति छुपाकर अग्निहोत्री या तिवारी बनने की बजाय ब्राह्मण जैसे श्रेष्ठ गुणों का विकास करो। ब्राह्मण जाति नहीं सद्गुणों की श्रेष्ठता है। सद्गुणी बनिए, ब्राह्मण स्वतः हो जायेंगे
और हम यह समझते हैं कि जनमानस में नैरेटिव बने इसलिए पहले अफवाह बनाई गई और फिर खंडन हुआ। धुआं उठा है तो आग होगी। सड़क का बिजनेस ऐसा बढ़ चुका है कि देर सबेर दोपहिया वाहनों को टोल टैक्स वसूला ही जायेगा।
📢 महत्वपूर्ण
कुछ मीडिया हाऊसेस द्वारा दो-पहिया (Two wheeler) वाहनों पर टोल टैक्स लगाए जाने की भ्रामक खबरें फैलाई जा रही है। ऐसा कोई निर्णय प्रस्तावित नहीं हैं। दो-पहिया वाहन के टोल पर पूरी तरह से छूट जारी रहेगी। बिना सच्चाई जाने भ्रामक खबरें फैलाकर सनसनी निर्माण करना स्वस्थ पत्रकारिता के लक्षण नहीं है। मैं इसकी निंदा करता हूं।
@TV9Bharatvarsh
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