@sauravyadav1133 भाई साहब, बुरा ना मानें तो एक बात कहूं – शूगर का विज्ञान थोड़ा समझ लें। चीनी की जगह खजूर इस्तेमाल करने से कोई चीज़ शूगर फ्री नहीं हो जाती। प्लीज़... इस भ्रम में ना रहें। हालांकि, आपने लिखा है कुछ हद तक.. फिर भी।
सादर
दि इंडियन एक्सप्रेस के विकास पाठक को सुनना अच्छा लग रहा हैः
न्यूज़रूम जब एक संज़ीदा क्लासरूम जैसा असर पैदा करने लग जाय तो हम दर्शक अपने आप उस प्लेटफॉर्म पर आकर ठहर जाते हैं. विकास पाठक की आवाज़, अंदाज़ और विषयों को लेकर गहरी समझ कुछ ऐसा ही असर पैदा कर रही है.
इंडियन एक्सप्रेस हिन्दी ने दो सप्ताह पहले राजनीतिक विषयों पर केन्द्रित साप्ताहिक शो “साम दाम दंड भेद” शुरु किया है. शो के प्रस्तोता तो सौरभ द्विवेदी हैं लेकिन उन्होंने जिन विशेषज्ञों को जुटाया है, वो हम पर उनसे कहीं ज़्यादा असर कर रहे हैं. इसका एक कारण उनकी समझ, अनुभव के साथ-साथ अब तक डिज़िटल प्लेटफ़ार्म न के बराबर दिखना हो सकता है. इंडियन एक्सप्रेस के डिप्टी एसोसिट एडिटर विकास पाठक एक ऐसी ही प्रभावशाली शख़्सियत हैं.
पाठक शो के दौरान विषयों पर अपने विचार रखने के साथ-साथ ये भी बताते हैं कि इन पर कौन-कौन सी किताबें पढ़ें. जब वो किताबों के नाम के साथ पढ़े जाने के तर्क दे रहे होते हैं तो मुझे बत्रा सिनेमा, मुखर्जीनगर की सीढ़ियों या फिर टेफ्लाज़,जेएनयू में बैठकर अपने जूनियर्स को घंटों समझाने-पढ़ाने का दृश्य याद हो आ रहा है. जो संस्कृति अब छात्रों के बीच से विदा लेने की स्थिति में हो, वो वापस डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म पर लौट जा रही हो, इससे सुखद स्थिति क्या हो सकती है !
पाठक कोई दुर्लभ या भारी-भरकम किताब नहीं बता रहे होते. विषय आधारित वो किताबें बता रहे होते हैं जो पढ़नेवाली टेबल पर होनी ही चाहिए. ऐसे लेखक-विद्वान की किताबें जो अब भले ही चलन से बाहर हो या कर दिए गए हों लेकिन यदि कोई विषय के प्रति गंभीर है तो उनके लिए अनिवार्य पाठ है.
पाठक के बताने के अंदाज़ में ख़ास तरह की सादग़ी किन्तु रोचकता है जो हमें बांधे रखती है. पत्रकारिता से लेकर समाज विज्ञान के छात्रों के लिए इन्हें सुनना एक ज़रूरी काम है. वे इन्हें सुनते हुए महसूस कर सकेंगे कि किसी भी विषय की समझ कैसे बनती है और कैसे अपनी भाषा और शैली में उसे दुनिया के आगे पेश की जाती है !
@drsureshpant मराठी में भी दोहों या किसी के स्वागत में पढ़ी जाने वाली कविताओं को उखाना कहा जाता है। ये सिर्फ सुनने में एक जैसे हैं या इनका संबंध भी है...
@mukesh1275 कठिन परिस्थितियों में काम करना ज़िंदगी के सबसे करीब कर देता है। “मैं बचे हुए लोगों को देखती हूं और मुस्कुराती हूं कि तुम बच गए हो” यह बताता है कि त्रासदी कितनी भयानक थी, कि वह मौत का सैलाब था, उसमें जिंदा रहने की गुंजाइश कितनी कम थी।
100 से ज़्यादा रेस्क्यू मिशन कर चुकी नेपाल की पहली महिला हेलीकॉप्टर कैप्टन प्रिया अधिकारी-
“यह भूकंप के दौरान चलाए अभियान से एकदम अलग है क्योंकि छोटी सी घाटी में सारा बचाव कार्य चल रहा है। सोचिए 20 हेलीकॉप्टर एक ही घाटी में लोगों को बचा रहे हैं ।”
A lot is being said on Ashwin Vs me heated chat on Rishabh Pant. Some fellows have used selective clips which can easily be manipulated for certain narratives. You judge yourself by watching whole video. For me, such contrasting opinions are always fun in any shows. More so if it involves a former player.
अगर मैं अनुवादक न होता तो अपनी भाषा के रेंज से कभी परिचित नहीं हो पाता- इकोनोमिक सर्वे, राजनीति शास्त्र की कोई किताब, उपन्यास सब अलग तरह के भाषा प्रयोग की चुनौती पेश करते हैं. साथ में, यह दबाव लगातार बना रहता है कि पठनीयता न भंग हो पाए. लेकिन जब मैं कहानियां लिखता हूँ तो अपनी भाषा की गुंजलक में खुद को कैद कर लेता हूँ, जिसे तोड़ पाने में खुद भी डर लगता है. हिंदी के विद्वान लोग कहते हैं कि अनुवाद दोयम दर्जे का काम है. मुझे गर्व है कि मैं अपनी भाषा में दोयम दर्जे का लेखक हूँ!
@rajeevranjanMKH मामला अदालत में गया.. 75 वाले ने कहा कि ये आदमी अब 10 रुपये का नहीं रह गया है... 6 रुपये भी वापस कर दें तो हम तैयार हैं... इसके चक्कर में 25 जो बैंकों को चुकाने थे उसकी वैल्यू 50 पैसे की ही रह गई... सबकुछ नियम से हुआ है.. नियम जैसा कागज में लिखा है...
@rajeevranjanMKH सर, ऐसे समझें कि आपको 25 रुपये लोन चाहिए.. आपने अंदर काम करने वाले लोगों से 75 रुपये ले लिये और बैंक से 25 रुपये लिये.. जब बात चुकाने की आई तो आपने कहा पहले मैं तो वापस कर ही नहीं सकता.. फिर जिनसे आपने 75 लिये थे उन्होंने कहा कि पहले हमारे वापस करो फिर 25 वाले को देना... (1/N)
@Theatultiwari अतुल भाई, मैं आपको जानता नहीं हूं, और ये हैंडल मैंने बनाया ही है उन लोगों के लिए जिनको मैं जनता हूं पर मुंह पर गरिया नहीं सकता। आप जो कर रहे हैं, किसी दिन मौका मिला तो किसी अनजान व्यक्ति तरह ही गले लग कर धन्यवाद देना चाहूंगा। इस मीडियोकर आदमी का सलाम... हर शब्द जैसे मेरे ही हों..
@TheTribhuvan उस किताब की कीमत पता है आपको? माफ कीजिएगा, अगर किताब सच में हिंदुस्तानी लोगों के लिए है तो कीमत मनरेगा के एक दिन की मजदूरी से कम होनी चाहिए। ध्यान दें मैंने मनरेगा कहा है।
सादर धन्यवाद
@dranuj_k सर, बहुत सम्मान के साथ आपको थोड़ा और समाज शास्त्र पढ़ना चाहिए। आप बहुत प्यारे डॉक्टर हैं, बहुत सम्मान है मन में जो काम आप करते हैं उसके लिए। लेकिन समाज शास्त्र के बारे में आपकी राय बहुत इनेक्डोटल लगती है, एविडेंस बेस्ड नहीं।
सादर शुभकामनाओं सहित