वक़्त कभी उन्हें मुनासिब मिला नहीं
क्या करूँ अब मुझे भी अब उनसे गिला नहीं,
क़िस्मत की मार समझूँ या समझूँ उन्हें हरजाई
मुझे तो चीर देती है आज-कल उनके लफ़्ज़ों कि गहराई
बेहाल हूँ कि मुझसे अब तक वो सिला भी नहीं,
दुःख तो इस बात का है की इतनी ज़िलत पे भी तू
मुझे मिला नहीं.
-रिtika