RSS वह संगठन है जिसने अपनी पूरी पहचान चाल, चरित्र और चेहरे के नारे पर खड़ी की है। इसी के दम पर संगठन की ब्रांडिंग भी खूब की गई और मार्केटिंग भी ज़ोरदार हुई। एक ऐसे संगठन की छवि गढ़ी गई, जो त्याग, ईमानदारी और नैतिक श्रेष्ठता का उपदेश भी देता रहता है और कहता है कि वो उन पर अमल भी करता है।
संघ का वादा था कि वह राजनीति की अनैतिक सौदेबाज़ियों और राजनीतिक मजबूरियों से ऊपर उठेगा। मगर संघ ने जिस राजनीतिक दल बीजेपी को पाला-पोसा, वह आज भ्रष्टाचारियों को गले लगाने और राजनीतिक अनैतिकता को वैधता देने में सबसे आगे है। “वॉशिंग मशीन” आज बीजेपी की पहचान बन गई है।
लेकिन RSS के किसी व्यक्ति को इस राजनैतिक पतन की आलोचना करते कभी नहीं सुना गया। संघ द्वारा इस ज़ुबानी निंदा तक नहीं हुई। नैतिकता के स्वघोषित पैरोकार सत्ता मिलते ही अनैतिकता के चैंपियन बन गए।
भ्रष्टाचार की यह सड़ांध सिर्फ राजनैतिक गलियारों तक नहीं है। ये उन गर्भगृहों तक भी पहुँच गई है, जिनकी रक्षा का दावा संघ करता रहा है। हिंदू मंदिरों के प्रबंधन को लेकर चोरी और वित्तीय अनियमितता के आरोप मँडरा रहे हैं, राम मंदिर के चढ़ावे से लेकर बद्रीनाथ और महाकालेश्वर की मंदिर-अर्थव्यवस्थाओं तक पर सवाल उठ रहे हैं।
अपने चुनिंदा लोगों की देख रेख में मंदिरों के खज़ानों की संगठित लूट-खसोट पर RSS के भीतर न कोई नैतिक हिचकिचाहट दिखती है, न ही कोई सच्चा आक्रोश।
नैतिकता का मुखौटा तार-तार है, और उसके पीछे से जो चेहरा उभर रहा है, उसमें से लालच, छल और उसी ईश्वर के साथ धोखे की छवि उभर रही है, जिसमें विश्वास का दावा RSS की राजनीति का केंद्र बिंदु है।
मणिपुर सालों से जल रहा है, और आज फिर नफ़रत और हिंसा की आग में 20 घर राख हो गए।
दो सरकारों और राष्ट्रपति शासन के बावजूद संघर्ष गहराता ही जा रहा है। हज़ारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, अनगिनत परिवार उजड़ गए हैं - मणिपुर जिस असहनीय पीड़ा से गुज़र रहा है, उसकी कल्पना भी मुश्किल है।
यह मोदी सरकार की उस विभाजनकारी विचारधारा का नतीजा है, जो लोगों को धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और पहचान के नाम पर बाँटती है।
आज मणिपुर ही नहीं, पूरा देश प्रधानमंत्री से संवेदना के दो शब्द की भी उम्मीद छोड़ चुका है, कार्रवाई की बात तो दूर गई।
मणिपुर बेहतर का हक़दार है - और इसके लिए भारत जोड़ना ही एकमात्र रास्ता है।
पीएम मोदी के मित्रों के व्यवसाय सैकड़ों गुना बढ़ चुके हैं.
BJP की आय और बैंक बैलेंस भी सैकड़ों गुना बढ़ चुका है.
देश पर क़र्ज़ भी सैकड़ों प्रतिशत बढ़ चुका है…बढ़ता ही जा रहा है.
केंद्र सरकार पर कुल क़र्ज़ का इतिहास:
31 मार्च 2014 (जब 2014 में नई सरकार बनने से पहले)लगभग ₹56.7 लाख करोड़
31 मार्च 2026 (नवीनतम बजट अनुमान) लगभग ₹197.2 लाख करोड़
बढ़ोतरी: लगभग ₹140.5 लाख करोड़।
2014 की तुलना में केंद्र सरकार का कुल कर्ज लगभग 248% बढ़ा है, यानी यह लगभग 3.48 गुना हो गया है।
जब से मोदी ने सत्ता सम्हाली है तब से देश पर 248% कर्जा बढ़ चुका है!
70 सालों 2014 से पहले के सभी प्रधानमंत्रियों ने मिलकर लगभग ₹58 लाख करोड़ का कर्ज लिया, जबकि अकेले पीएम मोदी ने ₹140 लाख करोड़ का कर्ज लिया है !
यानि पिछले 14 प्रधानमन्त्री मिलकर भी जितना कर्ज़ नहीं ले सके, पीएम मोदी ने उतना कर्ज़ अकेले ही ले लिया!
दोनों हाथों से देश की बर्बादी का इंतज़ाम कर रही है BJP.
आज मोदी सरकार ने VB-GRAMG और इस योजना के तहत श्रमिकों को मिलने वाली दैनिक मजदूरी की दर नोटिफाई कर दी है। मोदी सरकार के इस नए कानून के अन्यायपूर्ण स्वरूप से अलग, श्रमिकों के लिए निर्धारित मजदूरी भी अनुचित रूप से बेहद कम है -अधिकांश मामलों में केवल 300 रुपये प्रतिदिन।
2024 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान @INCIndia ने अपने श्रमिक न्याय अभियान के तहत MGNREGA सहित सभी श्रमिकों के लिए 400 रुपये प्रतिदिन की राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी की गारंटी दी थी। मोदी सरकार द्वारा गठित डॉ. अनूप सत्पथी की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने भी वर्ष 2019 में 375 रुपये प्रतिदिन की राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की सिफारिश की थी। सप्तगिरि उलाका की अध्यक्षता वाली ग्रामीण विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने भी लगातार MGNREGA श्रमिकों के लिए अधिक मजदूरी की सिफारिश की है।
नोएडा जैसे औद्योगिक केंद्रों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शनों और ऐसे समय में, जब ग्रामीण मजदूरी में ठहराव को देश की आर्थिक वृद्धि में एक प्रमुख बाधा के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है, यह नोटिफिकेशन भारत के श्रमिकों का अपमान भी है और आर्थिक दृष्टि से एक अविवेकपूर्ण नीति भी।
भारत के श्रमिकों के लिए न्यायसंगत न्यूनतम मजदूरी वही होगी, जो डॉ. सत्पथी की सिफारिशों को अपनाए और उसके बाद से बढ़ी महंगाई को भी समायोजित करे।
आज एक बहुत दुखद दिन है, क्योंकि मोदी सरकार ने मनरेगा योजना को खत्म कर दिया है।
मनरेगा को खत्म कर सरकार ने देश के तमाम गरीबों को एक झटका दिया है, क्योंकि ये 'मांग आधारित' रोजगार देने वाली योजना थी।
: ग्रामीण विकास और पंचायती राज से जुड़ी Parliamentary Standing Committee के चेयरमैन @saptagiriulaka जी
📍 दिल्ली
आज मोदी सरकार ने VB-GRAMG और इस योजना के तहत श्रमिकों को मिलने वाली दैनिक मजदूरी की दर नोटिफाई कर दी है। मोदी सरकार के इस नए कानून के अन्यायपूर्ण स्वरूप से अलग, श्रमिकों के लिए निर्धारित मजदूरी भी अनुचित रूप से बेहद कम है -अधिकांश मामलों में केवल 300 रुपये प्रतिदिन।
2024 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान @INCIndia ने अपने श्रमिक न्याय अभियान के तहत MGNREGA सहित सभी श्रमिकों के लिए 400 रुपये प्रतिदिन की राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी की गारंटी दी थी। मोदी सरकार द्वारा गठित डॉ. अनूप सत्पथी की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने भी वर्ष 2019 में 375 रुपये प्रतिदिन की राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की सिफारिश की थी। सप्तगिरि उलाका की अध्यक्षता वाली ग्रामीण विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने भी लगातार MGNREGA श्रमिकों के लिए अधिक मजदूरी की सिफारिश की है।
नोएडा जैसे औद्योगिक केंद्रों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शनों और ऐसे समय में, जब ग्रामीण मजदूरी में ठहराव को देश की आर्थिक वृद्धि में एक प्रमुख बाधा के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है, यह नोटिफिकेशन भारत के श्रमिकों का अपमान भी है और आर्थिक दृष्टि से एक अविवेकपूर्ण नीति भी।
भारत के श्रमिकों के लिए न्यायसंगत न्यूनतम मजदूरी वही होगी, जो डॉ. सत्पथी की सिफारिशों को अपनाए और उसके बाद से बढ़ी महंगाई को भी समायोजित करे।