ज्ञान प्राप्त करने में समय, मेहनत, अनुशासन और कभी-कभी पैसा लगता है, इसलिए कुछ लोगों को यह महँगा लगता है।
लेकिन अज्ञानता (इग्नोरेंस) की कीमत अक्सर उससे कहीं अधिक होती है:
- ज्ञान नहीं होगा तो गलत निर्णय लोगे।
- गलत निर्णयों से आर्थिक, सामाजिक या व्यक्तिगत नुकसान हो सकता है।
- स्वास्थ्य, संबंध, करियर या जीवन के अन्य क्षेत्रों में बड़ी गलतियाँ हो सकती हैं।
- व्यक्ति दूसरों के भ्रम, धोखे या प्रचार का शिकार बन सकता है।
इसीलिए ज्ञान की कीमत पहले देनी पड़ती है, अज्ञानता की कीमत बाद में देनी पड़ती है और अक्सर वह कहीं अधिक होती है।
"खूट्यो सिन्दड़ा रो तेल, बिखर गयो सब निज खेल, बुझ गयी दिया की बाती..."
जब जीवन रूपी दीये का तेल समाप्त हो जाता है, तो संसार के सारे खेल, योजनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ और संबंध पीछे छूट जाते हैं। शरीर रूपी दीया बुझ जाता है।
इच्छा का जन्म अभाव से होता है। अभाव दुःख पैदा करता है इसलिए इच्छा और दुःख परस्पर जुड़े हैं।
मनुष्य का अधिकांश जीवन किसी न किसी कमी को भरने का प्रयास है। धन, ज्ञान, प्रेम, प्रतिष्ठा, शक्ति, सौंदर्य, सत्य हम जो कुछ भी खोजते हैं, वह किसी अनुभव किए गए अभाव की प्रतिक्रिया है।
कोई कला या क्रिएटिविटी हमें कुछ समय के लिए इच्छाओं और दुःखों से मुक्त कर सकती है।
समाज अक्सर यह मान लेता है कि मजदूरों का जीवन केवल दुख और संघर्ष से भरा होता है। लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है।
उनके पास भविष्य की आर्थिक सुरक्षा भले न हो, लेकिन वे भविष्य की चिंताओं में उतना नहीं जीते। उनका अधिकांश जीवन वर्तमान क्षण में बीतता है। उनका ध्यान आज के काम, आज की रोटी और आज के जीवन पर होता है।
हमने शिक्षा, ज्ञान, करियर, सफलता और भविष्य को बहुत बड़ा महत्व दे दिया है। इन्हीं के कारण तुलना, अपेक्षाएँ, असफलता का भय और मानसिक तनाव पैदा होते हैं। जबकि ज़मीन से जुड़े लोगों के पास इन मानसिक बोझों के लिए अक्सर समय ही नहीं होता।
दिनभर केवल जीवित रहने के लिए काम करना उन्हें वर्तमान में रखता है। उनके पास न ज़्यादा सोचने का समय होता है, न दूसरों से तुलना करने का, न सफलता को मापने के जटिल पैमाने होते हैं।
मानसिक शांति केवल धन, शिक्षा या सामाजिक सफलता पर निर्भर नहीं करती।
मनुष्य को डर क्यों लगता है?
भय मानव विकास की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण जैविक प्रणालियों में से एक है।
जब हमारी इंद्रियाँ किसी संभावित खतरे को महसूस करती हैं, तो जानकारी सबसे पहले मस्तिष्क के थैलेमस तक पहुँचती है। वहाँ से संकेत तुरंत अमिगडाला तक भेजा जाता है, जो मस्तिष्क का प्रमुख भय केंद्र है। अमिगडाला कुछ ही मिलीसेकंड में खतरे का आकलन करके शरीर की आपातकालीन प्रतिक्रिया सक्रिय कर देता है।
इसके बाद हाइपोथैलेमस, पिट्यूटरी ग्रंथि और एड्रिनल ग्रंथियाँ सक्रिय होकर एड्रेनालिन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोन छोड़ती हैं। इससे हृदय की धड़कन तेज हो जाती है, साँसें गहरी होने लगती हैं, मांसपेशियाँ तनाव में आ जाती हैं और पूरा शरीर खतरे से निपटने के लिए तैयार हो जाता है।
वास्तविक खतरे में यह प्रतिक्रिया जीवन बचाती है, लेकिन फोबिया में यही प्रणाली बिना किसी वास्तविक खतरे के बार-बार सक्रिय हो जाती है। मस्तिष्क एक झूठा अलार्म बजाता रहता है और व्यक्ति सुरक्षित वातावरण में भी स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है।
इस प्रक्रिया में हिप्पोकैम्पस पुरानी यादों और अनुभवों के आधार पर खतरे का अर्थ निकालता है, जबकि प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स तर्क और विवेक से स्थिति का विश्लेषण करता है। यदि अमिगडाला अत्यधिक सक्रिय हो जाए और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स उसे पर्याप्त रूप से नियंत्रित न कर पाए, तो भय वास्तविकता से कहीं अधिक शक्तिशाली महसूस होने लगता है।
हर बार जब व्यक्ति डरकर किसी परिस्थिति से बचता है, तो मस्तिष्क यह सीख लेता है कि यह चीज़ वास्तव में खतरनाक है। इससे भय की स्मृति और मजबूत होती जाती है तथा एक फियर लूप बन जाता है, जिसमें भय, बचाव और स्मृति एक-दूसरे को लगातार मजबूत करते रहते हैं।
अच्छी बात यह है कि मानव मस्तिष्क न्यूरोप्लास्टिक है। अर्थात् वह जीवनभर स्वयं को बदलने और नए तंत्रिका मार्ग बनाने में सक्षम है। सही समझ, धीरे-धीरे भय का सामना, संज्ञानात्मक पुनर्गठन, श्वास तकनीकें, माइंडफुलनेस और नियमित अभ्यास के माध्यम से इस भय चक्र को तोड़ा जा सकता है
प्लेटो का मानना था कि कोई भी व्यक्ति जन्म से दार्शनिक राजा नहीं होता। लगभग 50 वर्ष की कठोर शिक्षा, परीक्षा और अनुभव के बाद ही यह तय होता है कि वह शासन करने योग्य है या नहीं।
जैसे जहाज़ का कप्तान बनने के लिए प्रशिक्षण चाहिए, वैसे ही राज्य चलाने के लिए भी वर्षों की शिक्षा चाहिए।
आदर्श राज्य में भविष्य के दार्शनिक राजा को बचपन से ही एक बहुत लंबी और कठोर शिक्षा से गुजरना चाहिए। इसका उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि चरित्र, बुद्धि और सत्य-प्रेम का निर्माण करना है।
ऐसा शासक तैयार करना जिसे सत्ता से प्रेम न हो, बल्कि सत्य और न्याय से प्रेम हो।
प्लेटो के अनुसार मुख्य विषय
- संगीत और कला
- शारीरिक शिक्षा
- अंकगणित
- समतल ज्यामिति
- ठोस ज्यामिति
- खगोलशास्त्र
- हार्मोनिक्स (संगीत का गणितीय अध्ययन)
- तर्कशास्त्र
- राजनीति और प्रशासन
प्लेटो के दार्शनिक राजा जो केवल ही राज्य चलाने का हकदार है उसकी यह यात्रा पाँच स्तरों की है जिसमें:
- चरित्र (Character)
- अनुशासन (Discipline)
- तर्क (Reason)
- प्रज्ञा (Wisdom)
- निःस्वार्थ सेवा (Selfless Rule)
होगा वही देश का राजा बन सकता है।
प्लेटो के अनुसार
- चरित्र के बिना ज्ञान खतरनाक है।
- ज्ञान के बिना सत्ता अंधी है।
- और सत्य के बिना शासन अन्याय बन जाता है।
न्याय दर्शन की भावना के अनुसार आदर्श शासक में ये गुण होने चाहिए:
सत्यनिष्ठ, तर्कशील, विवेकी, प्रमाणवादी, निष्पक्ष, न्यायप्रिय, बुद्धिमान, प्रज्ञावान, धैर्यवान, संयमी, आत्मसंयमी, विनम्र, निर्भीक, निडर, धर्मनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, दूरदर्शी, विचारशील, जिज्ञासु, संशयशील, निर्णयक्षम, उत्तरदायी, निष्काम, लोभमुक्त, राग-द्वेष से मुक्त, पक्षपातरहित, करुणामय, लोकहितैषी, ईमानदार, चरित्रवान, अनुशासित, धैर्यशील, संवादशील, शास्त्रज्ञ, अनुभवसंपन्न, स्मृतिशाली, मेधावी, विवेकसंपन्न, सत्यशोधक, कुतर्क-विजेता, प्रमाण-परीक्षक, न्यायनिर्णायक, इन्द्रियनिग्रही, अहंकाररहित, स्वार्थरहित, सहिष्णु, उत्तरदायित्वपूर्ण, नैतिक, सदाचारी, लोककल्याणकारी।
जीवन यात्रा... 🚶🏻♂️
🌿 आयुर्वेद में यदि किसी फल को 'अमृत' कहा गया है, तो वह आँवला है!
@nmpb और @moayush के मानकों के अनुसार, आँवला केवल एक फल नहीं, बल्कि प्रकृति का सबसे बड़ा 'रसायन' (Rejuvenator) है।
आइए जानते हैं इसके अद्भुत लाभ और उगाने की विधि 🧵👇
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