@GanguBhumihar@ARVIND35594406 Nope. You didn't say anything related to reservation.@ARVIND35594406 mentioned about reservation. Caste survey was notified in 2022 and survey was started in two phase starting from Jan 2023. EWS was implemented in 2019 and OBC reservation was implemented in 1992.
खान सर के विवादित बयान पर बीजेपी विधायक नीरज बबलू का पलटवार। नीरज बबलू ने कहा, "सबसे पहले वह अपने बाप का जीजा बन जाएगा, अपनी मां का जीजा बन जाएगा, बहन का भी जीजा बन जाएगा। खान ने जिस तरह का बयान दिया है, उसे बिहार में नहीं चलने देना चाहिए।" बीजेपी विधायक ने आगे कहा, "हमने पहले ही कहा था कि खानवा फ्रॉड है।"
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बहुत सारे क्षत्रियो को ये भ्रम है कि OBC आरक्षण से पहले ,वे राजनीतिक तौर पर या सरकारी नोकरियो में या बड़े पदों पर मजबूत थे। लेकिन OBC आरक्षण से कमजोर हुए है, तो आइये आज इसी पर बात ही कर ली जाए।
आजादी के बाद कैबिनेट मंत्रियों की संख्या सरकारों में:-
1947- 0
1952-0
1957-0
1962- 1 ( सत्य नारायण सिंह ,सूचना मंत्रालय)
1964- 1( राम सुभाग सिंह 4 दिन के लिए, फिर शास्त्री जी की सरकार में 1 साल के लिए)
1967- 2 ( करन सिंह ,दिनेश सिंह ,फिर दिनेश सिंह को हटाकर राम सुभाग सिंह,फिर इन्हें हटाकर सत्यनाराण सिन्हा)
1971- 1 ( करण सिंह)
1977-0
1979- 1 ( करण सिंह )
1980- 2 ( भीष्म नारायण सिंह,वीपी सिंह)
1985- 3 ( वीपी सिंह ,चन्द्रशेखर सिंह ,अर्जुन सिंह,फिर वीपी सिंह चन्द्रशेखर जी की जगह वीर बहादुर सिंह, दिनेश सिंह )
1989- 0
अब OBC आरक्षण के बाद:-
1990- 2 ( संजय सिंह, कल्याण सिंह कालवी)
1991- 2 ( दिनेश सिंह, अर्जुन सिंह)
1996- 1 ( जसवंत सिंह, बाजपेयी जी की सरकार)
1996- 1( रघुवंश प्रसाद सिंह,HD देवगौड़ा की सरकार)
1998- 1( जसवंत सिंह)
1999- 1-3 ( जसवंत सिंह ,1 साल के लिए राजनाथ सिंह,2 साल के लिए राजीव रूडी )
2004- 4 ( आजादी के इतने साल बाद जाकर पहली बार 5 साल के लिए रघुवंश बाबू, अर्जुन सिंह केबिनेट मंत्री ,बाकी 2 नाम शंकर सिंह बाघेला, सिंह,सन्तोष मोहन देव )
2009- 3-5 ( चंद्रेश कुमारी कटोच, वीरभद्र सिंह, हरीश रावत, जितेंद्र सिंह, किशोर देव)
2014- 5-6 ( पहली बार आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व मिला और बडे पद मिले)
(राजनाथ सिंह, नरेंद्र तोमर, राधा मोहन सिंह,वीके सिंह,जितेंद्र सिंह, राजीव रूडी ,राजीव रूडी (7) रक्षा रहे )
2019- 5-6 ( राजनाथ सिंह,आरके सिंह, गजेंद्र शेखावत, जितेंद्र सिंह, नरेंद्र तोमर, अनुराग ठाकुर )
2024-3 ( राजनाथ सिंह, गजेंद्र शेखावत, जितेंद्र सिंह)
अब आइये नौकरियो में:-
आंर्मी चीफ - महराज श्री राजेन्द्र सिंह जडेजा ( 1955, 36 दिन)
वीके सिंह( 2010 में ,2 साल 60 दिन)
विपिन रावत (2016,3 साल)
एयरफोर्स चीफ-
राकेश भदौरिया ( 2019,2 साल)
नवल स्टाफ चीफ -2
विजय शेखावत- 1993-1996
माधवेन्द्र सिंह- 2001-2004
अब आते है सुप्रीम कोर्ट ओर इलहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पर:-
सुप्रीम कोर्ट -
1- भुहनेश्वर प्रसाद सिन्हा ( 1959-64)
2-कमल नारायण सिंह ( 1991 ,17 दिन)
3-टीस ठाकुर ( 2015, 1 साल 31दिन)
इलाहाबाद हाईकोर्ट-1
शिव कीर्ति सिंह ( 2012 ,1 साल )
1- कमल नारायण सिंह
अब आइए मुख्यमंत्री पर ,OBC आरक्षण 1990 से पहले पूरे भारत मे 5 साल CM रहने वाले क्षत्रिय CM:-
1- अर्जुन सिंह ( मप्र)
2- वीर भद्र सिंह ( हिमाचल)
आज तक भारत रत्न- 0
अब ये बताओ भाई ,जब पहले क्षत्रियो का राजनीति में वर्चस्व था। फिर क्यों नहीं केबिनेट मंत्री बन रहे थे?
क्यों नही 5 साल Cm बन रहे थे ? क्यों नही बड़े पदों पर थे?
क्यों नही आंर्मी चीफ, चीफ़ जस्टिस बन रहे थे?क्यों नही किसी को भारत रत्न मिला ?
ये सच है कि OBC आरक्षण से पहले सवर्णों का हर फील्ड में वर्चस्व था ।
लेकिन ध्यान रहे ,उन सवर्णों में क्षत्रिय कहीं नहीं थे।ये सवर्ण शब्द में ही खेल है। जहां बड़ी चालाकी से सत्य को छुपा दिया जाता है ।
क्षत्रियो की तो असल राजनीतिक ताकत ,प्रसाशनिक ताकत OBC आरक्षण के बाद बढ़ी है ।
क्षत्रियो की असल कमर तो जमींदारी एक्ट ओर सीलिंग एक्ट लगाने से टूटी है ।
जिसके जिम्मेदार नेहरू जी, सरदार पटेल जी, इंदिरा जी और यूपी में बल्लभ पंत जी ,चौधरी चरण सिंह जी है |
लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि क्षत्रिय इन सभी की जयंती धूम धाम से मनाएंगे ।लेकिन इनकी नजर में वीपी सिंह जी गद्दार है और उसी वीपी सिंह की सरकार को, बाहर से समर्थन देने वाले अटल जी महान हैं....
साभार:- Satendra singh
@ews_army आपकी बात से मैं सहमत हु कि इनको उस कदर याद नहीं करा जा रहा जितना होना चाहिए थे। मंडल कमीशन के जनक B P Mandal एवं VP Singh को उचित सम्मान देने में हम लोग कंजूसी करते आये है। राजपूत होते हुए जैसे पिछड़ों को आरक्षण दिये वैसे ही पिछड़ा होते हुए Modiji EWS लागू किये।
@AnkitRay9765@Decoding_Bihar तुम जैसो की वजह से एंटी यादव हो गया है पूरा बिहार। बाहर निकलो नकली गुरूर से। पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दो और ग्वारपन से बाहर निकलो।
गरीबों के मसीहा एवं विकास के भागीरथ पुरुष, यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में सेवा, सुशासन एवं गरीब कल्याण के 12 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में रांची के सुखदेव नगर दक्षिण मंडल में आयोजित प्रबुद्ध संपर्क कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री श्री बलवीर दत्त जी एवं प्रबुद्ध वर्ग के साथ संवाद किया।
साथ ही, केंद्र सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धियों, जनकल्याणकारी योजनाओं तथा विकसित भारत के संकल्प पर विस्तृत चर्चा की।
इनके द्वारा लिखित किताब इमरजेंसी का कहर और सेंसर का जहर जो कांग्रेस की क्रूरता एवं काली करतूतों को परिभाषित करती हैं, मुझे भेंट की।
विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में प्रबुद्ध समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
छुट्टी का अर्थ क्या है?
विदेश यात्राएँ भी, मंदिर दर्शन भी, लक्षद्वीप के समुद्र तट भी देखे गए, समुद्र के भीतर की तस्वीरें भी आईं।
अगर विदेश यात्रा, धार्मिक यात्रा, समुद्र तट पर जाना, प्रकृति के बीच समय बिताना, अच्छा भोजन करना और आराम करना भी छुट्टी नहीं है,
तो फिर मुझे लगता है इस देश में कोई भी छुट्टी नहीं ले रहा।
हर आदमी काम ही कर रहा है - कोई मनाली में काम कर रहा है, कोई गोवा में, कोई परिवार के साथ, कोई दोस्तों के साथ।
2014 से 2026 के बीच प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हुए। असली बहस यह है कि इन दौरों से भारत को कितना निवेश मिला, कितने रोजगार बने और व्यापार हितों को कितना लाभ हुआ?
देश का आम आदमी नहीं देखता कि नेता ने कितने घंटे काम किया, वह देखता है कि उसके जीवन में क्या बदला।
जिस युवा का पेपर लीक हो गया, जिस किसान को फसल का दाम नहीं मिला, जिस मरीज को अस्पताल में बेड नहीं मिला, जिस परिवार की नौकरी चली गई - उसे 18 घंटे और 20 घंटे के से क्या फर्क पड़ता है?
18 घंटे काम करने का काम का परिणाम क्या निकला? शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, न्याय और नागरिक सुरक्षा के मोर्चे पर देश कहाँ पहुँचा।
युवा पूछ रहा है कि डिग्री के बाद नौकरी कब मिलेगी?
आम आदमी भी अपनी नौकरी में भी 12-14 घंटे खटता है, मजदूर धूप में पूरा दिन काम करता है, किसान बिना रविवार के खेत में उतरता है।
सवाल यह नहीं कि किसने कितने घंटे काम किया। सवाल यह है कि उस काम का परिणाम क्या निकला।
अगर काम का पैमाना सिर्फ घंटे हैं, तो इस देश का सबसे बड़ा कर्मयोगी शायद वह मजदूर है जो रोज़ दो वक्त की रोटी के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देता है।