हंगामा क्यों है बरपा? नाम जो पूछ लिया है ?
ये क़ानून तो 2006 में ही बन गया था। सरकार थी मनमोहन सिंह जी की।
2011 में नियम बन गए कि सभी ढाबा और रेस्टोरेंट मालिकों को अपना नाम और लाइसेंस नंबर बड़े अक्षरों में लगाना होगा ताकि ग्राहक आसानी से देख सकें..
ये सभी प्रबुद्धजीवियों के ज्ञान चक्षु आज अचानक क्यों खुल गए हैं?
2011 के नियम को सख़्ती से पालन ही तो करवाया जा रहा है।
सवाल ये है कि ये सेक्युलर चश्मा 13 साल बाद काहे लगाया जा रहा है?