मैं हूँ खुदा नशे का, जवानी शराब है,
फिर भी तेरा हुस्न ही पहली शराब है।
महफ़िल में पीने आये हैं तो पीजिए मगर,
पहले यह पूछ लीजिए किसकी शराब है।
मुझको बुला रहे हो तो यह भी बताईये,
कमरे में कितने लोग हैं, कितनी शराब है।
क्या तमाशा है कि सब मुझको बुरा कहते हैं,
एक वो है कि जिसे मुझसे सिधारा नहीं जाता।
और सब चाहते हैं मेरी तरह का होना,
और मुझसे मेरा चेहरा ही संभाला नहीं जाता
एक गली थी जिससे हम निकले
ऐसे निकले कि जैसे दम निकले
उस की आँखों में कोई अश्क न था
हम ही घर से पलक भिगो निकले
अब तो मंज़िल पे रुक के देखते हैं
रास्ते में कहाँ कहाँ निकले
वो जो निकले थे सर-कशी की धुन में
ज़ौक़-ए-सज्दा लिए वो सर निकले