“Break the Cage” का संदेश देते हुए राहुल गांधी ने कहा—
“अगर मैं चाहता हूं कि आप इस शाम की सिर्फ एक बात याद रखें, तो वह ये है कि इस पूरी दुनिया में आप में से हर एक व्यक्ति अद्वितीय है।
आप खास हैं, आप सबसे अलग हैं और आप एक स्वतंत्र व्यक्ति हैं। आपके पास अपने जीवन के लिए अपना सपना और अपनी सोच है।”
— पुणे में छात्रों की गूंज कार्यक्रम में बोले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष @RahulGandhi
#Pune #BreakTheCage #RahulGandhi #ChhatronKiGoonj #Vishesh | @rajeev_dh
Women are the strength of India - its foundation, its present, and its future.
You belong to no one but yourself.
Be loud. Be proud. Fight for your space.
Smash the patriarchy!
#ChhatronKiGoonj
Modi “Ji”,
Trump repeated over 100 times that he had mediated the ceasefire between India and Pakistan during Operation Sindoor. Rahul Ji gave you a chance to call out his lie, but you chose not to snub Trump.
Now even Shehbaz Sharif is emboldened enough to repeat the same claim - that Trump made the ceasefire possible.
You were a no-show in Parliament.
At least come out now and show Trump and Shehbaz Sharif their true place.
India’s decisions are made in India - not in Washington, and certainly not in Islamabad.
10 Years. ₹31.53 Lakh !
An MTS employee started the 7th CPC on 01.01.2016 with ₹18,000 Basic + 0% DA.
By 31.12.2025, the pay reached ₹23,500 Basic + 58% DA.
Over the entire 10-year period, the total earnings from Basic Pay + DA came to around ₹31,52,970.
Now ask a simple question:
Can this realistically buy a dream home and a dream vehicle while managing family expenses and rising inflation?
For many Central Government employees, the answer is No.
The 8th Pay Commission should not merely revise salaries—it should restore affordability and financial security.
#8thpaycommission
PM Modi and Amit Shah - you cannot threaten Gen Z into silence.
First you broke their bones. Now you are filing FIRs and taking down their accounts.
You are India’s past. Be careful about how you treat India’s future.
शशि थरूर से बहुत लोग असहमत रहते हैं, मैं भी उनमें से हूँ, मगर हाल में उन्होंने अपने लेख में एक अच्छी बात कही है, जिस पर सभी को ग़ौर करना चाहिए। ये लेख लोकसभा की सीटें बढ़ाने को लेकर है। ये तो आप जानते ही हैं कि लोकसभा की सीटें फिलहाल 543 हैं जो कि 1972 से जमी हुई है 1971 की जनगणना के आधार पर है।
सरकार का तर्क है कि भारत की आबादी दोगुनी से ज्यादा हो गई है अब जनसंख्या के अनुपात में सीटें बढ़ानी चाहिए। लेकिन थरूर कहते हैं कि यह सिर्फ गणितीय तर्क है, इसके पीछे बड़ा संस्थागत खतरा छिपा है।
थरूर के मुख्य तर्क हैं-
दुनिया में कोई परिपक्व लोकतंत्र इतनी बड़ी विधायिका नहीं रखता-
थरूर लिखते हैं कि हर विकसित लोकतंत्र में संसद का आकार इतना ही रखा जाता है कि असली बहस, जांच और व्यक्तिगत भागीदारी संभव हो। 850 सीटों वाली लोकसभा दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक सदन से बड़ी होगी। इससे सदन “विचार-विमर्श का मंच” नहीं रहकर “अराजक कोलोसियम” बन जाएगा, जहां चुनिंदा लोग ही बोल पाएंगे और बाकी सिर्फ वोटिंग मशीन पर संख्या बनकर रह जाएंगे।
अमेरिका का उदाहरण-
अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स 1929 से 435 सीटों पर स्थिर है। तब अमेरिका की आबादी 12 करोड़ थी, आज 33.5 करोड़ से ज्यादा है। फिर भी सीटें नहीं बढ़ाई गईं, क्योंकि इससे विधायी प्रक्रिया ठप हो जाती। हर सांसद ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन मजबूत स्टाफ, कम्युनिकेशन और कमिटी सिस्टम से काम चलता है। भारत के सांसद भी ऐसा कर सकते हैं।
अगर संख्या बढ़ी तो व्यक्तिगत सांसद की भूमिका खत्म हो जाएगी-
एक सामान्य सत्र में समय बहुत सीमित होता है।
चार घंटे की बहस में पार्टी की ताकत के हिसाब से अधिकतम 15-20 सांसद ही बोल पाएंगे।
बैक बेंचर और छोटी पार्टियों के सांसद लगभग चुप रह जाएंगे।
ज्यादातर सांसद पूरे पांच साल में एक भी सवाल नहीं पूछ पाएंगे, प्राइवेट मेंबर बिल नहीं ला पाएंगे या गंभीर बहस में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। वे सिर्फ पार्टी के हुक्म पर हाथ उठाने वाले “खामोश प्लेस होल्डर” बन जाएंगे।
संसद की भूमिका और कमजोर होगी-
हाल के वर्षों में संसद के बैठने के दिन घट रहे हैं, बिल बिना स्टैंडिंग कमिटी की जांच के वॉयस वोट से पास हो रहे हैं और विपक्ष को किनारे किया जा रहा है। सैकड़ों अतिरिक्त सदस्यों से यह स्थिति और बिगड़ेगी। बड़ा सदन सरकार के लिए सुविधाजनक होता है, क्योंकि उसमें असली जांच-पड़ताल मुश्किल हो जाती है। संसद “रबडर-स्टैंप” या “नोटिस-बोर्ड” बन जाती है।
सत्तावादी मॉडल से समानता-
थरूर चेतावनी देते हैं कि 850 सीटों वाली लोकसभा चीन की पोलिटिकल कंसल्टेटिव कॉन्फ्रेंस या उत्तर कोरिया की सुप्रीम पीपुल्स असेंबली जैसी बन सकती है—बहुत बड़ी, भव्य दिखने वाली, लेकिन असली बहस या चुनौती देने में असमर्थ। ये सिर्फ “सहमति का नाटक” करती हैं।
बेहतर विकल्प-
सांसद का काम राष्ट्रीय कानून, विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और केंद्र सरकार की जवाबदेही है। वे स्थानीय काउंसलर या विधायक नहीं हैं।
स्थानीय मुद्दे (सड़क, पानी, कचरा आदि) राज्य विधानसभाओं और पंचायत/नगरपालिकाओं के हैं (73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत)।
जनसंख्या बढ़ने पर विधायकों (MLAs) की संख्या बढ़ाएं, लोकसभा को कॉम्पैक्ट और राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित रखें।
300 अतिरिक्त सांसदों पर खर्च (वेतन, आवास, यात्रा, पेंशन) बचाने के बजाय मौजूदा सांसदों के लिए उचित ऑफिस बिल्डिंग बनाएं।
कुल मिलाकर थरूर का कहना है कि असली प्रतिनिधित्व बहस की गुणवत्ता, विधायी कमेटियों की गंभीर जांच और स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाने में है—न कि एक विशाल, अव्यवहारिक सदन बनाकर लोकतंत्र को “खाली नाटक” में बदलने में। 850 सीटों वाली लोकसभा सरकार के लिए इको चैंबर बन जाएगी, न कि शासन का मंच।
धर्मेंद्र प्रधान भ्रष्टाचार और भारत की बर्बाद education system के प्रतीक हैं और हमेशा रहेंगे।
उसी system ने 26 बच्चों की जान ली, और लाखों युवाओं को सड़कों पर उतरने को मजबूर किया।
इस्तीफ़ा भी नैतिकता से नहीं - युवाओं के आक्रोश से डरकर देना पड़ा।
और आज उसी व्यक्ति को संसद में BJP माला पहना रही है। यह कोई सम्मान नहीं - लाखों बच्चों के भविष्य की बर्बादी का जश्न है।
देश का हर छात्र ये देख रहा है। और इसमें शामिल हर चेहरा याद रखेगा।
. @Wangchuk66 जी ने सिर्फ़ एक अनशन नहीं किया
उन्होंने देश को लोकतंत्र और अहिंसा की ताकत याद दिलाई।
यह दिखाया कि बिना गाली,
बिना हिंसा, बिना भड़काऊ भाषा के भी गलत के खिलाफ़ डटा जा सकता है।
उन्होंने सत्ता को भी एक संदेश दिया है,
जनता की आवाज़ सुनिए।
क्योंकि जनमत में ही सत्ता का हित छिपा होता है।
और देश को यह भी सिखाया कि
जब आवाज़ सच और जनहित के लिए उठती है!
तो उसके साथ खड़े होने वाले अपने आप जुड़ते चले जाते हैं।
यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।.....
यही कहलाता है लोकतंत्र।
जितने भी ऑनलाइन एग्जाम होते हैं यानी CBT (Computer Based Test), उनमें पेपर लीक होना लगभग नामुमकिन है।
कैसे होगा? पेपर तो exam time पर ही system में land होता है।
CBT में पेपर लीक नहीं, बल्कि cheating होती है।
System का remote access कराकर बाहर बैठे solver gang से live paper solve कराया जाता है। आज maximum CBT exams इसी बीमारी का शिकार हैं।
आज लगभग सब कुछ outsourcing और private companies के भरोसे चल रहा है। ज़रूरत है कि सरकार का अपना exam infrastructure हो या फिर सिर्फ़ उन्हीं credible agencies like TCS से exam कराए जाएँ जिनका track record मजबूत हो।
साथ ही एक Centre Affiliation Board होना चाहिए जो पूरे देश के CBT centres का audit करे, standards तय करे और उनकी accountability सुनिश्चित करे।
Paper leak और CBT cheating दोनों अलग-अलग समस्याएँ हैं।
मेट्रो बंद करो।
रास्ते बंद करो।
दुकानें बंद करो।
Internet बंद करो।
खाना बंद करो।
अपना हक़ मांग रहे छात्रों के ख़िलाफ़ सरकार ने ये क्रूर कदम उठाए।
बस एक चीज़ बंद नहीं कर पाए, मोदी जी - पेपर लीक।
The govt seems to have made full preparations to evacuate the youth at Jantar Mantar by force last night using para military forces, but seeing the enormous crowds there along with politicians & celebrities, it seems there was a rethink & they desisted.
This govt feels, it can ignore public opinion since they have the main institutions like the Judiciary, Media and ECI under their control. But they forget that public opinion affects many people in those institutions too. Moreover, history is littered with examples of how people overthrew dictatorial govts by revolutions when they ignored public opinion & used brute force on the people
मोदी जी, अहंकार छोड़िए।
छात्रों की गूंज सुनिए, उनकी 3 मांगें पूरी कीजिए।
- नाकाम शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से तत्काल इस्तीफा लीजिए।
- छात्रों पर बर्बरता करने वाले गुनहगारों की जवाबदेही तय कीजिए।
- छात्रों के साथ हुए हर अन्याय के लिए उनसे माफ़ी मांगिए।
मैं, कांग्रेस पार्टी और पूरा विपक्ष छात्रों और उनकी इन मांगों के साथ मजबूती से खड़े हैं।
देश का छात्र कह रहा है - “हमारा कोई भविष्य नहीं।”
और इस सरकार के मंत्री कह रहे हैं - “हमारी कुर्सी नहीं जाएगी।”
जिस देश में छात्र भविष्य खो दे और मंत्री कुर्सी न खोए - वहां न्याय है ही नहीं।