nothing is random over here.
Writer| Lyricist| Metadata.
Politics| Poetry| Peace.
bharat that is jambudvipa.
किसी किताब के बीच रखा फूल📍Dum spiro, spero🌸
कांग्रेस की यह राज्यसभा सूची पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात चुभती है, वह यह है कि इसमें ज़मीन की धूल कम है और दफ़्तरों की धूप ज़्यादा है। यह सूची कांग्रेस के अनुभव, कम्युनिकेशन, डेटा, संगठन और वफ़ादारी को तो जगह देती है, लेकिन उन लोगों की बेचैनी इसमें कहीं नहीं दिखती जो राज्यों में भाजपा के ख़िलाफ़ लगातार बोलते, लड़ते, सड़क पर उतरते, मुक़दमे झेलते, सामाजिक समूहों से संवाद बनाते और संगठन की बची-खुची नसों में रक्त की तरह दौड़ते हैं। कुछ नाम तो बहुत ही निराश करते हैं। लेखक इतिहासकार रामचंद्र गुहा का लेख कड़वा लगता तो है, लेकिन इस तरह के फैसले देखते हैं तो लगता है कि हालात अच्छे नहीं हैं।
मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम इस सूची का सबसे भारी, सबसे गरिमामय और सबसे निर्विवाद नाम है। वे कांग्रेस अध्यक्ष हैं, लंबा संसदीय अनुभव रखते हैं, कर्नाटक की राजनीति से उठे हैं और राष्ट्रीय विपक्ष की एकता में उनकी भूमिका है। पर समस्या खड़गे के नाम में नहीं, सूची की संरचना में है। कांग्रेस अध्यक्ष को राज्यसभा भेजना स्वाभाविक है, लेकिन उनके आसपास पार्टी ने जो चेहरे चुने हैं, उनमें ज़्यादातर “उपयोगी” लोग हैं, “उद्वेलित” लोग नहीं। यानी वे लोग हैं जो पार्टी के लिए प्रेसनोट लिख सकते हैं, टीवी पर बोल सकते हैं, डेटा पढ़ सकते हैं, संगठन-कार्यालय संभाल सकते हैं; लेकिन वे चेहरे बहुत कम हैं जिनके नाम से किसी ज़िले का कार्यकर्ता कहे कि हाँ, यह हमारा आदमी है, यह हमारी लड़ाई से निकला है। यह हार गया था तो भी इसने काम नहीं छोड़ा। यह पर्दे के पीछे भी काम करता रहा।
कांग्रेस के सीनियर नेता पवन खेड़ा का चयन इसी कम्युनिकेशन-राजनीति का प्रतीक है। वे मुखर हैं, भाजपा के विरुद्ध तर्क रखते हैं, कांग्रेस की मीडिया-लाइन को धार देते हैं। वे असम में हिमंता से सीधे भिड़ंत लेकर आए हैं। वे निश्चय ही राज्यसभा में उपयोगी होंगे। लेकिन यह भी सच है कि वे कर्नाटक की ज़मीन से उगे हुए नेता नहीं हैं। उन्हें राजस्थान से भेजना चाहिए था, जबकि वे मेवाड़ के हैं और उन्होंने साहसिकता वाले मेवाड़ी चरित्र को दिखाया भी है।
कांग्रेस ने राज्यसभा को फिर एक ऐसे मंच की तरह इस्तेमाल किया है जहाँ क्षेत्रीय परिश्रम की जगह राष्ट्रीय मीडिया-उपयोगिता को प्राथमिकता मिलती है। यह वही बीमारी है जिसने कांग्रेस को बहुत जगह कार्यकर्ता-आधारित दल से बदलकर अवसर-वितरण की संस्था बना दिया। कॉंग्रेस इस तरह अपने उन लोगों को निराश करती है, जो अपनी दोनों कुहनियों और घुटनों पर लेकर जिम्मेदारी का पहाड़ उठाते हैं।
मंसूर अली खान को अल्पसंख्यक और शिक्षित शहरी समुदाय के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। वे शिक्षा-जगत से हैं और बेंगलुरु सेंट्रल से चुनाव लड़ चुके हैं। पर राज्यसभा का प्रश्न सिर्फ़ प्रतिनिधित्व का नहीं, राजनीतिक तापमान का भी है। क्या वे कर्नाटक में भाजपा और संघ की वैचारिक राजनीति के विरुद्ध कोई गहरी, जन-संवादी आवाज़ बन पाए? या यह भी एक ऐसा टिकट है जिसमें सामाजिक संकेत तो है, लेकिन राजनीतिक करंट कम है?
मीनाक्षी नटराजन का नाम अपेक्षाकृत बेहतर है। वे विचारशील हैं, पूर्व सांसद हैं, युवा कांग्रेस-NSUI से निकली हैं, महिला चेहरा हैं और राहुल गांधी की शुरुआती राजनीतिक-वैचारिक टीम से जुड़ी रही हैं। मध्य प्रदेश जैसे राज्य में, जहाँ कांग्रेस लगातार भाजपा की संगठनात्मक मशीनरी से जूझ रही है, उनका चयन एक गरिमामय संदेश देता है। लेकिन यहाँ भी सवाल है कि क्या कांग्रेस ने किसी ऐसी महिला को चुना जो अभी ज़मीन पर भाजपा के विरुद्ध सक्रिय संघर्ष का केंद्रीय चेहरा हो? मीनाक्षी नटराजन सम्मानित नाम हैं, पर कांग्रेस को अब सम्मानित नामों से आगे जाकर संघर्षरत नामों की भी खोज करनी होगी।
सबसे अधिक सवाल राजस्थान पर उठता है। नीरज डांगी को एक बार राज्यसभा भेजना संगठनात्मक संतुलन के तौर पर समझा जा सकता था। लेकिन रिपीट करना राजनीतिक रूप से हैरतअंगेज़ है। राजस्थान में कांग्रेस के पास भाजपा के ख़िलाफ़ मुखर रहने वाले, सड़क पर लड़ने वाले, किसान, दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और महिला नेतृत्व के कई संभावित चेहरे हो सकते थे। किसी दलित महिला को भेजा जा सकता था। किसी ओबीसी महिला को भेजा जा सकता था। किसी ऐसे नेता को भेजा जा सकता था जिसने भाजपा शासन की नीतियों पर लगातार आवाज़ उठाई हो। किसी ऐसे ज़मीनी कार्यकर्ता को भेजा जा सकता था जिसके पास पद कम और संघर्ष ज़्यादा हो। लेकिन पार्टी ने एक बार फिर यथास्थिति को चुना।
राजस्थान में यह टिकट कांग्रेस की कल्पनाशक्ति की कमी का टिकट लगता है। यह संदेश देता है कि पार्टी को ज़मीन की बेचैनी से ज़्यादा आंतरिक समीकरणों की शांति प्रिय है। भाजपा के विरुद्ध जो लोग मुखर रहे, उन्हें संदेश गया कि लड़ो तुम, टिकट हम अपनी सुविधा से देंगे। यह कार्यकर्ता-मानस को घायल करने वाली राजनीति है। कांग्रेस बार-बार कहती है कि वह संविधान, सामाजिक न्याय, महिला प्रतिनिधित्व और वंचितों की आवाज़ की पार्टी है; लेकिन जब राज्यसभा जैसी जगह आती है तो वही पुराना सुरक्षित, संतुलित, कम-जोखिम वाला चयन सामने आ जाता है।
प्रवीण चक्रवर्ती का चयन कांग्रेस की डेटा-राजनीति का चयन है। वे पढ़े-लिखे, नीति और डेटा की दुनिया से जुड़े चेहरा हैं। पर कांग्रेस को यह भी देखना चाहिए कि डेटा-विश्लेषण और चुनावी विजय में बहुत दूरी होती है। ऐस लोगों को राज्यसभा भेजना ही क्यों चाहिए? आपकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी तो ऐसे लोगों को बरसों बरस ऐसा सपना ही लेने नहीं देती। इसलिए कांग्रेस को सिर्फ़ एक्सेल-शीट, मेनिफेस्टो और नैरेटिव से नहीं, बूथ, जाति-संरचना, स्थानीय नेतृत्व, महिला समूहों, किसान आंदोलनों और युवा असंतोष की धड़कनों से भी चलना होगा। डेटा उपयोगी है, लेकिन वह जनता की जगह नहीं ले सकता।
प्रणव झा का टिकट भी संगठन-कार्यालय की राजनीति का टिकट है। वे संचार और संगठन से जुड़े रहे हैं। पर झारखंड जैसे राज्य में जल-जंगल-जमीन, आदिवासी प्रश्न, विस्थापन, खनन, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता के इतने बड़े प्रश्न हैं कि वहाँ से कांग्रेस किसी अधिक सार्वजनिक, संघर्षशील और प्रतीकात्मक चेहरे को भेज सकती थी। यहाँ भी पार्टी ने अंदरूनी उपयोगिता को सार्वजनिक राजनीति पर प्राथमिकता दी।
यह सूची बताती है कि कांग्रेस भाजपा से लड़ना चाहती है, लेकिन अपने ढाँचे को बदलना नहीं चाहती। वह संविधान की बात करती है, पर टिकट-वितरण में सामाजिक साहस कम दिखाती है। वह महिलाओं की भागीदारी की बात करती है, लेकिन राजस्थान जैसे बड़े राज्य में किसी महिला को आगे नहीं करती। वह दलित-ओबीसी राजनीति की बात करती है, लेकिन जब अवसर आता है तो सुरक्षित संगठनात्मक नाम सामने रखती है। वह कार्यकर्ताओं से सड़क पर संघर्ष चाहती है, पर राज्यसभा में अक्सर उन्हीं को भेजती है जिनकी उपयोगिता दिल्ली दरबार, मीडिया-कक्ष, डेटा-टेबल या गुटीय संतुलन में अधिक होती है।
राज्यसभा केवल “रिवॉर्ड सिस्टम” नहीं है। यह उच्च सदन है विचार, संघर्ष, संवैधानिकता और सामाजिक प्रतिनिधित्व का मंच। कांग्रेस अगर सचमुच भाजपा के केंद्रीयीकृत और आक्रामक राजनीतिक मॉडल का वैकल्पिक नैतिक प्रतिपक्ष बनना चाहती है तो उसे ऐसे लोगों को ऊपर लाना होगा जो जनता के बीच से आएँ, जो प्रदेशों में पार्टी की असली लड़ाई लड़ें, जो दलित, ओबीसी, महिला, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाजों के भीतर विश्वसनीय हों, और जिनके पास सिर्फ़ पार्टी-निष्ठा नहीं, जन-विश्वास भी हो।
इस सूची में कुछ योग्य लोग हैं, पर यह सूची साहसी नहीं है। इसमें दिमाग़ है, लेकिन धड़कन कम है। इसमें संतुलन है, लेकिन संघर्ष की चमक कम है। इसमें व्यवस्था है, लेकिन विद्रोह नहीं। और आज कांग्रेस को सबसे अधिक आवश्यकता उसी विद्रोह की है; अपने भीतर की जड़ता के विरुद्ध, अपने टिकट-वितरण की सुविधा-राजनीति के विरुद्ध और उस मानसिकता के विरुद्ध जिसमें ज़मीन पर लड़ने वाले लोग तालियाँ बजाते रह जाते हैं और राज्यसभा में वे पहुँच जाते हैं जो सत्ता-गलियारों में अधिक उपयोगी समझे जाते हैं। यह कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए बहुत महंगा सौदा है और यह उसकी राजनीति के दरवाज़ों को भीतर से दीमकों के हवाले कर रहा है।
@RahulGandhi@INCIndia@kharge@priyankagandhi
@DelhiJalBoard@p_sahibsingh sir, naam khrab krwa rhe hai DJB wale apke sath sath sahib singh ji ka bhi. Delhi ke gharo me kya pani ja rha hai. Uska jara bhi idea ho toh, atleast act. System ko tight karo.
Wrna kejriwal me kya khrabhi thi, entertainment to bna rhta tha kam se kam.
मोदी जी दो कार से गए, कपिल मिश्रा मेट्रो से, गडकरी बस से, यूपी विधायक रिक्शे से, हरियाणा मंत्री साइकिल से, सम्राट चौधरी पैदल... रेंगता हुआ कौन जा सकता है? एनी आइडिया?
Bro is Pradeep Gupta.
His Exit Poll were wrong in the Lok Sabha Elections, everyone saw his crying pictures on TV, We trolled him a lot.
But in this Election, he's the only pollster who understood Tamil Nadu correctly. He's the only one who predicted that Thalapathy Vijay's TVK would become the largest party in Tamil Nadu.
Credit where credit is due ✌️
#ElectionResults
तो आखिरकार देश की आधी आबादी का विधायिका में 33% आरक्षण का सपना एक बार फिर मोदी-शाह की कुटिल राजनीति की भेंट चढ़ ही गया।
(A thread)
#WomenReservationBill
तो आखिरकार देश की आधी आबादी का विधायिका में 33% आरक्षण का सपना एक बार फिर मोदी-शाह की कुटिल राजनीति की भेंट चढ़ ही गया।
(A thread)
#WomenReservationBill
तो आखिरकार देश की आधी आबादी का विधायिका में 33% आरक्षण का सपना एक बार फिर मोदी-शाह की कुटिल राजनीति की भेंट चढ़ ही गया।
(A thread)
#WomenReservationBill
तो आखिरकार देश की आधी आबादी का विधायिका में 33% आरक्षण का सपना एक बार फिर मोदी-शाह की कुटिल राजनीति की भेंट चढ़ ही गया।
(A thread)
#WomenReservationBill
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(A thread)
#WomenReservationBill
तो आखिरकार देश की आधी आबादी का विधायिका में 33% आरक्षण का सपना एक बार फिर मोदी-शाह की कुटिल राजनीति की भेंट चढ़ ही गया।
(A thread)
#WomenReservationBill
सत्तापक्ष ने अपनी चाल चल दी है और अपना फायदा सुनिश्चित कर लिया है, लेकिन इस पूरी राजनीतिक नूराकुश्ती में अगर किसी की हार हुई है, तो वह है भारत का लोकतंत्र। महिलाओं का प्रतिनिधित्व एक बार फिर से राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर कुर्बान हो गया है।
#WomenReservation
तो आखिरकार देश की आधी आबादी का विधायिका में 33% आरक्षण का सपना एक बार फिर मोदी-शाह की कुटिल राजनीति की भेंट चढ़ ही गया।
(A thread)
#WomenReservationBill
यह रणनीति सत्ताधारी पार्टी के लिए पूरी तरह से एक 'Win-Win' (चित भी मेरी, पट्ट भी मेरी) की स्थिति है। यदि वे अपने मनमुताबिक संशोधन पास करा लेते, तो परिसीमन उनके पक्ष में होता। और अब जब बिल गिर गया है, तो वे विपक्ष को 'महिला विरोधी' करार देकर चुनावी नैरेटिव सेट करेंगे।