किसान नेता दिग्विजय भाटी व मोहित जाटव के साथ पुलिस प्रशासन और एसएसपी अविनाश पांडे द्वारा किए गए बर्बरतापूर्ण व अशोभनीय व्यवहार की कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ। अन्नदाताओं के हक़ की आवाज़ उठाने वालों पर खाकी का यह तानाशाही रवैया लोकतंत्र में कतई स्वीकार्य नहीं है।
सरकार और प्रशासन तुरंत मामले का संज्ञान लेकर संबंधित अधिकारी के खिलाफ निष्पक्ष जांच और सख्त विधिक कार्रवाई सुनिश्चित करे। @AzadSamajParty किसानों के मान-सम्मान की लड़ाई में दिग्विजय भाटी व मोहित जाटव के साथ मजबूती से खड़ी है।
अब क्या ही बोले 🤔🤔🤔🤔
लोकल चुनाव में युवाओं से उम्मीद है इस पोस्टर का जवाब जरूर दिया जाएगा ।
जोड़कर देखे -1.78 लाख + 51427 + 81023 +70031 =???
एक लाख का कैलेंडर जारी किया जिसमे से 81023 बाकी है बजट घोषणा का वर्गीकरण तक नहीं हुआ फिर भी आंकड़ा आर पार 🙏🙏🙏
बीजेपी का कोई भी नेता इस गणित को समझा दे तो मीडिया या ओपन डिबेट के लिए युवाओं की तरफ़ से हम तैयार है 🤔🤔🤔🤔🤔🤔
झूठ पर झूठ इस लेवल का भगवान सब देख रहा है
नए जिले बनने के बाद कई ऐसे कर्मचारी अपने ही मूल गृह जिले से नौकरी पाने के बावजूद प्रशासनिक पुनर्गठन के कारण दूसरे जिले के निवासी/कर्मचारी माने जाने लगे हैं।
विशेषकर तृतीय श्रेणी शिक्षक, राजस्थान पुलिस एवं अन्य भर्तियों में जिन अभ्यर्थियों ने अपने गृह जिले के आधार पर नियुक्ति प्राप्त की थी, उनके साथ मूल भावना के अनुरूप न्याय होना चाहिए।
👉 नए जिले बनने से किसी का मूल गृह जिला नहीं बदलना चाहिए।
👉 ऐसे सभी कार्मिकों को उनके मूल गृह जिले में वापस स्थानांतरित करने का अवसर दिया जाए।
👉 सरकार स्पष्ट नीति बनाकर इस समस्या का स्थायी समाधान करे।
नौकरी जिस गृह जिले के आधार पर मिली, पुनर्गठन के कारण वही गृह जिला छिनना न्यायसंगत नहीं है।
सरकार से विनम्र आग्रह है कि हजारों कार्मिकों की इस वास्तविक समस्या पर संवेदनशीलता से विचार कर मूल गृह जिले में वापसी का रास्ता खोला जाए।
@RESMA_7@RajCMO
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हर साल Mutual ट्रांसफर ।
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राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड, जयपुर द्वारा आयोजित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी सीधी भर्ती-2024 में चयनित अभ्यर्थियों को परिवहन एवं सड़क सुरक्षा विभाग में पदस्थापन/कार्यालय आवंटन किया गया है।
#विभाग : राजस्थान सरकार, परिवहन एवं सड़क सुरक्षा विभाग
#भर्ती: चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी सीधी भर्ती-2024
#आदेश: कार्यालय आदेश क्रमांक एफ1(31) परि/स्था/2025/10691
#दिनांक : 12.08.2026
#संबंधित पत्र: प्रशासनिक सुधार (अनुभाग-3) विभाग का पत्र क्रमांक पृ.3(1)प्रशा./अनु.-3/2024-07601, दिनांक 08.07.2026
आदेश में MBC श्रेणी में निम्न नाम दर्ज हैं:
✓ श्री रविकान्त सैनी - मेरिट क्रमांक 1158 | MBC | पदस्थापन: मुख्यालय (HQ)
✓ श्री विमल कुमार शर्मा - मेरिट क्रमांक 1376 | MBC | पदस्थापन: RTO Bharatpur (Enforcement)
सवाल सीधा है - #सैनी और #शर्मा को MBC श्रेणी में किस नियम/प्रावधान के तहत शामिल किया गया है ?
यदि यह document vertification के पश्चात #अंतिम_सूची है, तो यह राजस्थान सरकार के MBC संबंधी नियमों एवं पात्रता मानदंडों की स्पष्ट #अनदेखी है। ऐसी स्थिति में पूरी सूची की तत्काल #निरस्त करें एवं नियमों के अनुसार #पुनरीक्षित किया जाना चाहिए।
योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों और आरक्षण व्यवस्था के साथ किसी भी प्रकार की अनियमितता स्वीकार्य नहीं है।
संबंधित विभागों /जिम्मेदारों को स्पष्ट करना चाहिए कि इन दोनों एवं और भी अन्य अभ्यर्थियों को MBC श्रेणी में शामिल करने का कानूनी/नियमगत आधार क्या है? - और इस क्रिया से जो MBC के geunine अभ्यर्थी थे उनकी वरीयता कब और कैसे सही की जाएगी ?
@BhajanlalBjp@DrPremBairwa@KumariDiya@RajGovOfficial@RajCMO
राजस्थान डांगावास नागौर दलित नरसंहार प्रकरण में जयपुर शहीद स्मारक पर 40 आरोपियों के बरी होने पर विरोध में अभी हज़ारों की संख्या में लोग जुटे हुए है।
सरकार तत्काल इस फैसले की अपील राजस्थान हाई कोर्ट में करे।
जमीन का कब्जा पीड़ित को देकर सभी SC/ST कोर्ट को फास्ट ट्रैक में बदले।
डांगावास जैसी गंभीर घटना पर OBC राजनीति के बड़े-बड़े चेहरों की चुप्पी सिर्फ खामोशी नहीं है, यह उस चयनात्मक सामाजिक न्याय का आईना है, जिसमें न्याय का पैमाना घटना की गंभीरता से नहीं, बल्कि आरोपी और पीड़ित की जातीय पहचान से तय होता दिखाई देता है।
जब जाति से राजनीतिक लाभ मिलता हो तो “सामाजिक न्याय” के नारे बुलंद होते हैं, प्रतीक गढ़े जाते हैं, “ठाकुर का कुआँ” याद आता है और इतिहास के पन्ने खोल दिए जाते हैं। लेकिन जब सवाल अपनी सुविधानुसार असहज हो जाए, तो वही सामाजिक न्याय अचानक मौन व्रत पर चला जाता है।
यह कैसी राजनीति है? क्या सामाजिक न्याय का अर्थ यह है कि अपनी जाति के खिलाफ अन्याय हो तो आंदोलन और दूसरी जाति के खिलाफ हो तो मौन?
क्या न्याय का सिद्धांत भी अब राजनीतिक सुविधा के हिसाब से आरक्षित हो गया है?
“ठाकुर का कुआँ” सिर्फ तब याद नहीं किया जा सकता जब उससे राजनीतिक भाषण में तालियां मिलें। अगर उस प्रतीक का इस्तेमाल जाति आधारित अन्याय के खिलाफ किया जाता है, तो फिर सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या अन्याय की पहचान आरोपी की जाति देखकर बदलेगी?
अपराधी की कोई जाति नहीं होती। उसका धर्म अपराध होता है।
और पीड़ित की जाति उसके दर्द की तीव्रता तय नहीं करती।
लेकिन हमारी राजनीति ने शायद न्याय का भी एक नया फॉर्मूला खोज लिया है आरोपी अपना हो तो ‘षड्यंत्र’, दूसरे का हो तो ‘सामाजिक अन्याय’; पीड़ित अपना हो तो ‘आंदोलन’, दूसरा हो तो ‘मौन’।
डांगावास के मामले में OBC नेताओं से किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष में खड़े होने की अपेक्षा नहीं थी। अपेक्षा इतनी भर थी कि वे न्याय की प्रक्रिया के पक्ष में खड़े होते। यदि निचली अदालत का फैसला गलत लगता है तो ऊपरी अदालत में मजबूती से अपील की मांग करते। निष्पक्ष सुनवाई की मांग करते। साक्ष्यों की स्वतंत्र समीक्षा की मांग करते। और सबसे महत्वपूर्ण यह कहते कि न दोषी बचे, न निर्दोष फंसे।
लेकिन शायद यह राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है कि न्याय की मांग करना आसान है, न्याय के सिद्धांत पर कायम रहना मुश्किल।
सच्चा सामाजिक न्याय तीन कारक पर टिका है
1. जिसके साथ अन्याय हुआ है, उसके साथ खड़े रहो।
2. जिसे गलत तरीके से फंसाया गया है, उसके लिए निष्पक्ष जांच मांगो।
3. और जो वास्तव में दोषी है, उसे उसकी पहचान नहीं, उसके अपराध के आधार पर सजा दिलाओ।
राजनीति यदि यह तय करने लगे कि किस अन्याय पर बोलना है और किस अन्याय पर चुप रहना है, तो फिर वह सामाजिक न्याय की राजनीति नहीं रह जाती; वह सिर्फ राजनीतिक चयनवाद बन जाती है।
और शायद डांगावास का सबसे बड़ा सवाल यही है
क्या सामाजिक न्याय सचमुच न्याय है, या फिर यह भी राजनीतिक मौसम देखकर बदलने वाला एक सुविधाजनक नारा भर है?
और इसी कसौटी पर डांगावास ने कई नेताओं की राजनीति को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है।
#तृतीय श्रेणी अध्यापक स्थानांतरण को लेकर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का बड़ा बयान
#मेरा कमेंट फाइनल , नीति को लेकर जो कह दिया वही होगा !!
50 हजार शिक्षकों की भर्ती की सौगात जल्द मिलेगी
@saten_08
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने टीचर्स को ट्रांसफर पॉलिसी लाने का आश्वासन दिया। इसके बाद जयपुर में दो दिन से चल रहा थर्ड ग्रेड टीचर्स का आंदोलन गुरुवार शाम खत्म हो गया।
ग्रेड थर्ड टीचर्स संघर्ष समिति के संयोजक सुनील महला ने कहा कि "शिक्षा मंत्री के साथ दूसरे दौर की वार्ता में सहमति बनी है। अगर, 1 जनवरी तक सरकार और शिक्षा मंत्री ने हमें जो आश्वासन दिया है, वह पूरा नहीं किया तो 1 जनवरी से ही टीचर्स आर-पार की लड़ाई पर फिर से सड़कों पर उतरेंगे।
फिर पहले हम शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेंगे। उसके बाद नए शिक्षा मंत्री से ही हमारा ट्रांसफर करवाएंगे।