भारत के अधिकतर खाद्य पदार्थों – अन्नाज, फल, सब्जियां, मसाले, डेयरी आदि – के आयात पर विकसित देशों में प्रतिबन्ध लगे हुए हैं। क्योंकि भारत के व्यापारी, पॉलिसी मेकर और नौकरशाह MC हैं। और किसान अनपढ़ हैं।
सावधान।
एक इंस्टाग्राम अकाउंट बिना किसी अधिकार के भरतपुर के राजपरिवार के शाही राजचिह्न (Royal Crest) का दुरुपयोग कर रहा है। हमारे मत में यह हमारे परिवार की पहचान और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) का गंभीर दुरुपयोग है।
मैं अपने सभी फ़ॉलोअर्स से आग्रह करता हूँ कि कृपया इस इंस्टाग्राम अकाउंट पर जाएँ, इसे तुरंत Block करें और Impersonation तथा Misuse of Identity के आधार पर Report करें। ऐसे फर्जी अकाउंट्स को किसी भी प्रकार का समर्थन या महत्व न दें।
हम इस मामले में सभी उपलब्ध कानूनी उपाय अपना रहे हैं, जिनमें संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज कराना भी शामिल है।
यह बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए कि हमारे परिवार का नाम, इतिहास और शाही राजचिह्न किसी भी भेषधारी या फर्जी व्यक्ति के उपयोग के लिए नहीं हैं। आइए, मिलकर इस फर्जी अकाउंट को बंद करवाएँ।
@PoliceRajasthan@BharatpurPolice
@Jat_Ethnic युवा वर्ग नशे की लत‚ गलत संगत ‚ स्कूल दिनों में लड़ाइयाँ में पड़ते है जिससे पढ़ाई ध्यान हट जाता हैं
आज की हकीकत यही है 5 मिनट किसी चाय की थड़ी पर बैठकर आसपास का वातावरण देख लो
सब समझ आ जाएगा देश का युवा किस ओर जा रहा है...
खेत खले जदे खात नोखे,
औलाद खले जनो की नि होवे...
009 गैंग,
फलाना गैंग,
ढिमका गैंग,
कुत्ता गैंग,
घेटा गैंग...
गर्क।
वो दसवीं में था। उससे पहले उसका शैक्षणिक स्तर मध्यम था। खेल के मैदान में वो फुर्तिला और चटक रहता था।
मयूर स्कूल उन दिनों शिक्षा के क्षेत्र में, खासकर विज्ञान वर्ग के परिणामों की वजह से चर्चा में था। उसका दाखिला भी सोच-समझकर मयूर स्कूल में करवाया गया। भाई साहब की इच्छा थी— "मैं तो पढ़ नहीं पाया, पर मेरी औलाद पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाए, तो मुझे भी सुकून मिलेगा।"
इसी मनोइच्छा के चलते उन्होंने दिन-रात एक करके खेती के पैसों से अपने लाडले का दाखिला करवाया। लाडला भी पढ़ाई ही कर रहा होगा, इसी आशा में वे हर महीने फीस और दूसरा खर्च समय-समय पर देते रहे।
दसवीं की अर्धवार्षिक परीक्षा तक तो लाडला स्कूल जाता रहा और कभी-कभार छुट्टी में घर भी आ जाता। ज्यादा समय हॉस्टल में बीतने की वजह से दादा, दादी और माता श्री का प्यार ही बरसता। घर पर घी और गुड़ के गुलगुले-चूरमे मिलते और वापस हॉस्टल जाते समय मनमाने हिसाब से पॉकेट मनी भी मिल जाती।
उस पॉकेट मनी का किस रूप में उपयोग होता था, यह तो कौन जाने, सिवाय लाडले के।
दसवीं की अर्धवार्षिक परीक्षा के एक महीने बाद वो घर आया और उसने जिद की— मुझे मोबाइल और अच्छे कपड़ों के लिए पैसे चाहिए। घरवालों ने सोचा कि मोबाइल का जमाना है और बच्चे का मन है, तो मोबाइल और कपड़ों के पैसे लेकर लाड साहब ननिहाल पहुँच गए और वहाँ से आने का नाम ही नहीं ले रहे।
एक महीने बाद वापसी हुई लाड साहब की ननिहाल से। घरवालों ने स्कूल जाने को कहा तो चुप्पी साधकर बैठ गए और स्कूल की तरफ जाने का नाम ही नहीं ले रहे।
राजस्थान अंधविश्वास और देवी-देवताओं पर ज्यादा विश्वास करने में अग्रिम भूमिका में है, तो पहले कई महीने देवी-देवताओं के ऊपर ठीकरा फोड़ा गया। पर थोड़े दिनों में एक भोपाजी ने बोल ही दिया— "देव बिचारे क्या करें, लाड़ साहब के पढ़ने की नीति ही नहीं है।"
आखिरकार घरवालों ने हाथ ऊपर कर दिए। उसकी दसवीं की हॉस्टल फीस और स्कूल फीस पानी में गई, साथ-साथ लाड़ साहब ने पढ़ाई को टाटा-बाय-बाय बोल दिया।
दो महीने बाद उसका काका छुट्टी आया। देखा तो लाड़ साहब के हाथ में दो-दो एंड्रॉयड मोबाइल और एक नंबर की ड्रेस। कहीं जाने की फिराक में थे।
पूछा तो बोले— "नोनोणे जाऊँ।"
उसी समय उनका जाना स्थगित करवाकर सवाल-जवाब की कड़ियाँ शुरू हुईं, पर भतीजे साहब कोई जवाब नहीं दे रहे। थक-हारकर काका श्री ने भी हाथ ऊपर कर दिए।
अब काका श्री के दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था कि आखिर ऐसी क्या वजह है, जिसके कारण यह स्कूल जाकर पढ़ना भी नहीं चाहता।
वजह कुछ ऐसी थी...
लाड़ साहब हॉस्टल के दौरान कुछ ऐसे सहपाठियों की संगत चढ़े, जिनका बड़ी-बड़ी गैंगों से ताल्लुकात था। गैंग को पहले काका फेमिन वाली गैंग ही समझते थे। बाद में उन्हें पता चला कि गैंग का मतलब—
एक ऐसा रोलिया ग्रुप, जिसमें—
एक-दो रईस घर की औलाद,
दो-चार चवन्ने,
दो-चार अपराधी प्रवृत्ति के,
और एक-दो पढ़ाई वाले भी।
इन सबके दिलो-दिमाग में बाहरी चकाचौंध की दुनिया का भूत ऐसा सवार हो रखा होता है कि उतारना मुश्किल हो जाता है।
इनका काम—
एक-दूसरे के गाँवों में पिनणा (बेवजह घूमना),
चवन्नापंती करना,
नए-नए संगठनों के पद प्राप्त करना,
हथियारों के साथ फोटो खिंचाना,
माँगी-मूंगी कर लाई तरह-तरह की गाड़ियों के साथ फोटो डालना,
नए-नए ब्रांड की दारू के साथ फोटो,
बढ़ी हुई खुटिया दाढ़ी,
कानों में चवन्नापंती वाली बाली,
हाथों की कलाइयों में बंधी ढेर सारी मौली,
गले में एक-आधा मंगलसूत्र,
फेसबुक पर पार्टी करते, गाड़ी चलाते लाइव दर्शन देना,
टिकटॉक वाले स्टंट,
तलवारों से केक काटना,
फैशन के फव्वारों के साथ सेल्फी।
पिछले एक साल से लाड़ साहब ने पढ़ाई की दुनिया छोड़कर इस दुनिया में अपने आप को मदमस्त कर रखा है।
ऐसे कई लाड़ साहब हैं, जिनके घर वाले परेशान रहते हैं और यह कलेक्टर साहब पढ़ाई की दुनिया से दूर वर्तमान की चकाचौंध भरी दुनिया में मटरगश्ती कर रहे होते हैं।
ऐसे कई युवा वर्तमान में अपनी राह भटक चुके हैं, जो पढ़ाई की दुनिया से दूर चकाचौंध भरी दुनिया में मस्त, नशेड़ी, अपराधिक और ऐसे ही रोते-फिरने वालों की दुनिया में मस्त फिरते रहते हैं। जिन्हें न तो आने वाले भविष्य की चिंता है और न ही उन्हें देखकर सीख ले रहे उनके छोटे भाइयों की चिंता है।
यह दुनिया देखने में तो बड़ी मस्त लगती है, पर इसकी हकीकत वाकई बहुत चिंतनीय और विचारणीय है। अपने भविष्य को एक अजीब से गर्क में डालकर वो अपने आप के साथ धोखा कर रहे हैं। 1/.
दादा और पोते का रिश्ता सिर्फ खून का रिश्ता नहीं होता,
यह समय के दो किनारों को जोड़ने वाला पुल होता है।
एक तरफ दादा होते हैं, जिनकी आंखों में जिंदगी की धूप, छांव, हार, जीत, संघर्ष और अनुभव जमा होता है।
दूसरी तरफ पोता होता है, जिसकी आंखों में मासूमियत, सपने, जिद और आने वाले कल की चमक होती है।
दादा जब पोते का हाथ पकड़ते हैं, तो सिर्फ उसे चलना नहीं सिखाते, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी का सहारा, कल्चर और हिम्मत उसके हाथों में रख देते हैं।
पोता दादा के लिए सिर्फ बच्चा नहीं होता। वह उनकी अधूरी इच्छाओं की मुस्कान, उनके बुढ़ापे की रौनक और उनके अस्तित्व की सबसे प्यारी निरंतरता होता है।
दादा की झुर्रियों में पोते के लिए दुआएं छिपी होती हैं, और पोते की हंसी में दादा की थकी हुई उम्र को फिर से जीने की ताकत मिलती है।
दादा वह जड़ हैं, जिनसे परिवार का पेड़ खड़ा रहता है, और पोता वह नई कोंपल है, जिसमें दादा अपना भविष्य मुस्कुराता हुआ देखते हैं।
इस रिश्ते की मजबूती यही है कि इसमें स्वार्थ नहीं होता। न कोई हिसाब होता है, न कोई दिखावा। यह रिश्ता सिर्फ दुलार, अपनापन और भावुकता की गहराई से बना होता है।
दादा पोते को विरासत में सिर्फ जमीन-जायदाद नहीं देते, बल्कि जीने का ढंग, सहने की ताकत, परिवार की पहचान और अपने खून की गरिमा देते हैं।