जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है मूर्खों को मारा नहीं जाता अपितु वे अपने आप स्वयं कि मृत्यु का निर्माण करते हैं जय श्री राम 🚩 https://t.co/vk2DqZPOoj
12वीं में 95%अंक लेकिन कॉलेज में एडमिशन नहीं मिला इसलिए बेटे ने आत्महत्या कर लिया
वोटजीवी नोटजीवी सत्ताजीवी नेता जाति भाषा मजहब का जहर घोलकर देश को बर्बाद कर रहे हैं
धन-धर्म, घर-परिवार, खेत-खलिहान, मकान-दुकान, उद्योग-व्यापार बचाना है तो दल गुलामी छोड़कर सत्य बोलिए और सत्य लिखिए
देवी-देवताओं के अपमान पर पुलिस को शिकायत की प्रतीक्षा नहीं करना है बल्कि स्वतः संज्ञान लेकर FIR दर्ज करना है लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है
Supreme Court of India
Order Date: 28.04.2023
Case No: WP(C) 943/2021
Ashwini Upadhyay vs. UOI
@HMOIndia@AmitShah@PMOIndia@narendramodi
जिसने माता सरस्वती और हमारे आराध्य का अपमान किया है,उस पर भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।अफसोस है कि आज हम अगड़ा-पिछड़ा और दलित के नाम पर इतने बंट गए हैं कि अपने मूल तत्व सनातन के अपमान को भी सहने लगे हैं।
याद रखिए जाति की पहचान यहीं रह जाएगी,अंततः हम सबको उसी सनातन में विलीन होना है।
सनातन का अपमान किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं।यह अक्षम्य है।
मैं आरक्षित सीट गया जी से दो बार लोकसभा चुनाव लड़ा और दोनों बार जीता।दो बार विधानसभा चुनाव लड़ा-एक बार जीता और एक बार हारा।
मुझे हर हिंदू का वोट मिला किसी ने वोट देते समय मेरी जाति नहीं पूछी।
जब जनता ने मुझसे भेदभाव नहीं किया तो मैं जनता के बीच भेदभाव कैसे कर सकता हूँ?
मेरी राजनीति जाति की दीवार खड़ी करने की नहीं, समाज को जोड़ने की है।
निशु का बाप संजय खुद वीडियो में यह कह रहा है कि स्वतंत्र भारद्वाज की पिटाई की गई और दिल्ली पुलिस के मौके पर पहुँचने के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी। दूसरी ओर स्वतंत्र भी यही कह रहा है कि उन्होंने जो किया, वह आत्मरक्षा में किया और यदि पुलिस समय पर नहीं पहुँच��ी तो मामला मॉब लिंचिंग तक पहुँच सकता था।
जब घटना में दोनों पक्षों के ऐसे परस्पर दावे और वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं, तो जांच और कार्रवाई एकतरफा कैसे हो सकती है?
20 कायर मिलकर स्वतंत्र भारद्वाज का लिंचिंग करने की फिराक में थे तभी स्वतंत्र भारद्वाज को BNS की धारा 34 से 44 याद आ जाता है - और अकेले शेर ने अपने कड़े से 20 कायरों की उन्मादी भीड़ से स्वयं के जान की रक्षा करी।
तुम कितने भी स्वतंत्र भारद्वाज पर फजी केस करवा लो चिरकुट जो खुस हो रहे है उन्हें यह पता होना चा���िए कि देश मे BN राउ जी के संविधान द्वारा कोर्ट भी चल रहा है कोर्ट में तुम्हारा फर्जी केस 2 तारीख भी नही झेल पाएगा!
सभी लोग लिखे👇
#WeStandWith_स्वतंत्र_भारद्वाज
माननीय @gupta_rekha जी
कब तक देवी देवताओ का अपमान सहेगा हिंदू समाज ?
इस लड़की पर कारवाई कब होगी ?
दिल्ली में निवास करते हिंदू समाज को संगठित होकर पुलिस स्टेशन का घेराव करना चाहिए और जब तक इस कन्वर्टेड नीली मुल्ली और उसके बाप की गिरफ्तारी नहीं होती तब तक आंदोलन होना चाहिए,
अगर हमारे गुजरात के किसी भी व्यक्ति ने ऐसे घटिया पोस्ट किया होता तो हम लोग ऐसा सबक सिखाते की सपने में भी देवी देवताओ का नाम सम्मान से लेती।
@DelhiPolice मर चुके हो या आत्मा जिंदा है ?
अगर इस लड़की और इसके बाप पर एक्शन नहीं लिया तो भीड़ हमे भी एकत्रित करनी आती है।
निशु आजाद के एक-एक ट्वीट पर हर जिले में ईशनिंदा कानून के तहत BNS 299/IPC 295A में केस होना चाहिए। ‘हिन्दू लीगल फंड’ को इसमें मोबिलाइज किया जाए।
इ���के बाप पर काउंटर FIR होनी चाहिए। उसको बहुत ‘दो मिनट पुलिस नहीं आती’ करना है न, क्या @DelhiPolice इतनी नकारी है कि कोई भी गुंडा प्रवृत्ति का व्यक्ति खुलेआम वीडियो बना कर धमकी देगा?
जब इनको FIR-FIR ही खेलना है, तो यही सही। फिर देखते हैं कि रावण और राहुल कितने थाने घेर लेता है। नरेन्द्र मोदी ने जो बवासीर बना दिया है, वह अब हिन्दू समाज हर दिन झेल रहा है। दुर्भाग्य यह है कि जो इसका प्रयोग कर रहे हैं वो मोदी के वोटर हैं ही नहीं।
विकास दिव्य��ीर्ति जी का दावा है कि 3000 साल तक भारत में 10% ब्राह्मणों का 100% शिक्षा पर कब्जा रहा।
सुनने में यह लाइन बहुत प्रभावशाली लगती है। समस्या केवल इतनी है कि इतिहास इस तरह सीधी लाइन में नहीं चलता।
3000 साल में भारत ने वैदिक व्यवस्था देखी, बौद्ध और जैन परंपराएं देखीं, मौर्य और गुप्त देखे, चोल, चालुक्य, राष्ट्रकूट देखे, अलग-अलग जातियों और समुदायों के शासक देखे, लगभग छह-सात सौ साल विभिन्न मुस्लिम राजसत्ताएं देखीं और फिर ब्रिटिश शासन देखा। राजसत्ता बदली, सामाजिक व्यवस्था बदली और शिक्षा की व्यवस्था भी बदली। ऐसे में यह कहना कि पूरे 3000 साल तक एक ही 10% समुदाय ने पूरे देश की 100% शिक्षा नियंत्रित की, इतिहास कम और नारा ज्यादा लगता है।
एक दूसरी गलती भी बार-बार होती है। वैदिक शिक्षा को पूरी शिक्षा मान लिया जाता है। वेदों के अध्ययन पर सामाजिक प्रतिबंध थे, इस तथ्य को नकारने की आवश्यकता नहीं ह��। लेकिन भारत में ज्ञान केवल वेद नहीं था। खेती कौन सिखाता था? शिल्प कौन सिखाता था?
धातुकर्म, निर्माण, व्यापार, चिकित्सा, युद्धकला, पशुपालन और हजारों प्रकार के व्यावसायिक कौशल किसके पास थे? यह ज्ञान सदियों तक अलग-अलग समुदायों के भीतर चलता रहा।
अब 19वीं सदी की शुरुआत के वास्तविक आंकड़े देखिए।
मद्रास प्रेसीडेंसी के 1822 से 1825 के सर्वे, जिन्हें धर्मपाल ने The Beautiful Tree में संकलित किया, बताते हैं कि स्कूलों में ब्राह्मण छात्र कहीं से भी 100% नहीं थे। कई क्षेत्रों में शूद्र छात्र सबसे बड़ा समूह थे। तमिल क्षेत्रों के कुछ जिलों में शूद्र और अन्य जातियों के छात्र मिलाकर 70 से 80 प्रतिशत से अधिक तक थे।
बंगाल और बिहार में विलियम एडम के 1830 के दशक के सर्वे भी यही तस्वीर दिखाते हैं। वहां भी शिक्षा केवल ब्राह्मणों के पास नहीं थी। अलग-अलग जातियों के छात्र थे और अलग-अलग ज���तियों के शिक्षक भी थे।
अब मेरा साधारण सा सवाल है जो @ajeetbharti
जी के अपने लाइव में भी पूछा था। अगर 3000 साल तक 90% लोगों को शिक्षा से पूरी तरह बाहर रखा गया था, तो 1820 और 1830 में अंग्रेजों को गांवों की स्थानीय पाठशालाओं में इतनी बड़ी संख्या में गैर-ब्राह्मण छात्र और शिक्षक कहां से मिल गए?
और “100% सीटों” वाली बात तो और भी दिलचस्प है। उस समय आज जैसा CBSE, विश्वविद्यालय प्रवेश, सीट मैट्रिक्�� और केंद्रीकृत शिक्षा मंत्रालय नहीं था। शिक्षा गांव, पाठशाला, गुरुकुल, मठ, परिवार और पेशे के माध्यम से चलती थी। आज की “सीट” वाली भाषा को हजार साल पुराने समाज पर चिपका देना अपने आप में गलत फ्रेमिंग है।
जाति व्यवस्था में भेदभाव हुआ। कुछ ज्ञान पर सामाजिक प्रतिबंध थे। कुछ समुदायों के साथ अन्याय भी हुआ। इन तथ्यों को स्वीकार करना चाहिए।
लेकिन अन्याय सिद्ध करने के लिए इतिहास को काल्पनिक बनाने क��� जरूरत नहीं है।
“3000 साल तक 10% ब्राह्मणों का 100% शिक्षा पर कब्जा था” एक शानदार राजनीतिक वाक्य हो सकता है किन्तु सटीक इतिहास नहीं।
https://t.co/nZbCo1nIH3
ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद, ब्राह्मणवाद हो बर्बाद - गोल्डन दास।
ये नारा बिहार में लगाया जा रहा है जहां मुख्यमंत्री @samrat4bjp जी किसी भी समाज के साथ भेदभाव नहीं किए जाने का दावा करते हैं, कोई कार्यवाही नहीं की जा��गी गोल्डन दास पर क्योंकि ये साहब की जाति से जो हैं...🤔
#Bihar
महामहोपाध्यायाचार्या डॉ. पुष्पा दीक्षित जी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी एक शास्त्र के प्रति दशकों की तपस्या क्या कर सकती है।
1 जुलाई 1942 को जबलपु�� में जन्मी डॉ. दीक्षित ने संस्कृत में M.A. के दौरान तीन स्वर्ण पदक प्राप्त किए, Ph.D. की, संस्कृत विभागाध्यक्ष एवं प्राध्यापक रहीं, और उनकी वेबसाइट के अनुसार वे छह दशकों से अधिक समय से निरन्तर अध्यापन कर रही हैं।
लेकिन उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान पाणिनीय व्याकरण में है।
��गभग चार दशकों के गहन अध्ययन और चिन्तन के बाद उन्होंने "पाणिनीया पौष्पी प्रक्रिया" विकसित की, जिसका उद्देश्य अष्टाध्यायी की शब्द-सिद्धि और प्रक्रियाविज्ञान को उसके अन्तर्निहित क्रम और गणितीय संरचना के आधार पर समझाना है।
इसी पद्धति के आधार पर उन्होंने अनेक ग्रन्थ तैयार किए हैं और पाणिनीय व्याकरण के अध्ययन की एक स्वतंत्र शिक्षण-परम्परा विकसित की है।
सन् 2000 में स्थापित पाणिनीय शोध संस्���ान, बिलासपुर में देश-विदेश से आने वाले विद्यार्थियों और अध्यापकों को पाणिनीय व्याकरण पढ़ाया जाता है।
विशेष बात यह है कि संस्थान की पाठशाला में शिक्षा, भोजन और आवास तक निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। ऑनलाइन अध्यापन भी 2020 से चल रहा है और लगभग 500 विद्यार्थी उससे जुड़ चुके हैं।
उन्होंने सौ से अधिक राष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोधपत्र प्रस्तुत किए, विश्व संस्कृत सम्मेलन, Edinburgh में भारत से चयनित संस्कृत कवियों में स्थान पाया, लगभग 10,000 संस्कृत पुस्तकों का अपना पुस्तकालय शोधार्थियों के लिए उपलब्ध कराया और स्थानीय लोगों को गीता, स्तोत्र तथा शुद्ध संस्कृत उच्चारण तक निःशुल्क सिखाती रही हैं।
उनके सम्मान भी उनके कार्य की व्यापकता बताते हैं:
• वेद-वेदाङ्ग सम्मान
• राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा Certificate of Honour
• छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण
• वाचस्पति
• महामहोपाध्याय
• महारा��्ट्र राज्य महाकवि कालिदास संस्कृत साधना पुरस्कार
• मानद D.Litt. सहित अनेक सम्मान।
ऐसे समय में जब हम अपने ही शास्त्रों के बारे में अक्सर secondary translations, ideological summaries और social-media quotations से मत बना लेते हैं, डॉ. पुष्पा दीक्षित जैसी विदुषी हमें एक बिल्कुल दूसरी दिशा दिखाती हैं:
मूल भाषा सीखिए।
व्याकरण सीखिए।
सूत्र का क्रम समझिए।
परम्परा पढ़िए।
फिर ग्रन्थ पर मत बनाइए।
संस्कृत की रक्षा केवल उसके गौरव की बातें करने से नहीं होगी।
उसके शास्त्रों को उसी कठोरता से पढ़ने वाले आचार्य और अगली पीढ़ी के शास्त्रज्ञ तैयार करने से होगी।
डॉ. पुष्पा दीक्षित जी ने अपना जीवन इसी कार्य में लगा दिया।
भारत को अपने ऐसे जीवित विद्वानों को केवल सम्मानित ही नहीं करना चाहिए, उनके ज्ञान को व्यवस्थित रूप से record, digitise, publish और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहिए।
ऐसी विदुषियों की जीवित ज्ञान-परम्परा स्वयं हमारी राष्���्रीय बौद्धिक धरोहर है।
https://t.co/cRFnwmRbTr