डाक्टर साहेब पुरानी भाजपा के हैं.
नयी @BJP4India के लिए धर्म, संस्कृति की अपेक्षाएँ, मान्यताएँ, मर्यादाएँ भिन्न हैं.
धर्म और अधर्म का मर्म समझना सरल/कठिन है.
तीर्थ क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार चुनावी भ्रष्टाचार सा नहीं है लेकिन दण्ड बड़ा है.
साँप भी घर में सीधा घुसते हैं.
यह माइंड सेट सदैव से रहा है।तब सस्ती का ज़माना था। पुत्र के मायने गया श्राद्ध और पिंड पानी के हेतु था। संचार क्रांति नहीं आई थी। खेती और पारंपरिक श्रम साध्य कार्य ही रोजगार के मार्ग थे। लोग मृत्यु के बाद होने वाली यातना से डरते थे। नब्बे से दशक में सब बराबर हो गए।
गरुड़तीर्थं च संसार विषनाशनं ।
गरुडेशं समभ्यर्च्नं तत्र स्नात्वा न शोचति।।
स्थान -श्री गरुडेश्वर महादेव श्री काशी, रौद्र नामक मास -श्रावण ,संवत्सर , तीथी - द्वादशी सोमवार, को मनकोमन्ना हेतु रुद्राभिषेक हेतु आचार्य @RajanThakar3@Bharatvidya1 व समस्त पुरोहितों को दण्डवत आभार
प्रेमचंद कभी भी गरीब नहीं थे.
प्रति माह तनख्वाह:-
1899-₹23
1900-₹25
1921- ₹150
1934-₹800
1899 में 1 ₹ आज के 1500 के बीच था.
महफिलबाज, दारुबाज शौकीन थे, पैसे उड़ाते थे.
हरिशंकर परसाई खुद बड़े दारूबाज थे.
गरीबी का नाटक था.
गांधी ने गरीबी का चोला पहनकर बकरी को बादाम खिलाया.
@PunyaPrakop_ Four Prominent leaders with "shatru hanta yog '"...1) Yogi Adityanath 2) Next BJP president 3)Narendra Modi 4) Vasundhara raje 5) Y S yedurappa (Now retired) Strong in same manner..
And his name is Pandit Bagha Jatin, Jatindranath Mukherjee.
When Pandit Bagha Jatin was engaged in his final gun battle at Balasore on September 9, 1915, Mahatma Gandhi and B.R. Ambedkar were enjoying the support and hospitality of the colonial masters.
@PunchTantrum हां, है प्रमाण ! अध्यात्म रामायण में है। किन्तु 14 नहीं, बारह वर्ष की ही चर्चा है। वैसे चतुर्व्यूह में विश्वावस्था के (जागृति) स्वरूप होने से लक्ष्मण जी स्वयं ही निद्राविजयी हैं। अकाराक्षरसम्भूतः सौमित्रिर्विश्वभावनः।
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प्रेमचंद उर्फ नवाब राय आज होते तो अवार्ड वापसी गिरोह के सरगना होते. प्रोपेगेंडा के उस्ताद थे.
अब गोस्वामी तुलसीदास जी ने बताया कि:-
संजीवनी बूटी तहँ लै हनुमान उबारी।
मृतक कोटि जिए सकल जो मारे रावनारी॥
लाखों सैनिक भी लखनजी के साथ जी उठे. किन्तु इस गिरोह को फर्जीवाड़ा करना है.
संविधान सभा के अधिकाँश सदस्य किसी ना किसी प्रकार से भ्रष्टाचार अनैतिक कार्यों अंग्रेजों से सांठ-गांठ तथा सत्ता के दुरुपयोग से जुड़े हुए थे.
हमें घुट्टी पिलाई गई कि संविधान सभा पुण्यात्माओं की सभा थी.
जैसे आज संसद विधानसभा में भ्रष्ट अपराधी अनैतिक भरे हैं वहाँ भी भरे थे.
स्त्री हो या पुरुष, सामाजिक नैतिक मूल्यों को तोड़नेवाले सम्मान की अपेक्षा क्यों करते हैं?
पश्चिमी कानूनों के आधार पर मर्यादाहीन आचरण करनेवाले अपराधी ना हो किन्तु नैतिक दृष्टि से तो ऐसे लोग पतित माने भी जायेंगे और कहें भी जायेंगे, इसमें आपत्ति क्यों होनी चाहिए?