सिगरेट पीती स्त्री मुझे
अच्छी लगती है
अच्छा लगता है
उसका मुंह से धुंआ उड़ाना
अच्छा लगता है मुझे उसका
दो उंगलियों के बीच
सिगरेट को उन्मुक्तता के साथ पकड़ना
मानो कश-ब-कश समाज को वो अपने
ठेंगे पर रखे हुए है
समाज की निगाह में
स्त्री का सिगरेट पीना जायज नहीं
किसे परवाह है इस समाज की
कवि ने कविता दिखाते हुए मुझसे कहा- "नहीं, यह मेरी कविता नहीं. एआई की कविता है! है न मस्त. हींग लगे न फिटकरी, कविता तैयार." नहीं, मैंने अपना माथा नहीं पकड़ा. बल्कि कवि महाराज को बधाई दी; 'मशीनी कविता' के लिए.
कवि और कविता उस दौर में आ पहुंचे हैं, जहां 'बपौती' अब मशीन की है.
अजनबी को पता बताना कभी व्यवहार में शामिल था.लोगों को जानकारी रहती थी,अपने करीब या दूर गली-मुहल्ले-सड़क की.जबसे हम गूगल मैप पर क्या निर्भर हुए,तब से पता और लोग अजनबी हो गए.छोटे शहरों में फिर भी सज्जन ठीक पता बता देतेहैं.मगर बड़े शहरों में लोगों को अपना ही पता-ठिकाना याद नहीं रहता!
अजनबी को पता बताना कभी व्यवहार में शामिल था.लोगों को जानकारी रहती थी,अपने करीब या दूर गली-मुहल्ले-सड़क की.जबसे हम गूगल मैप पर क्या निर्भर हुए,तब से पता और लोग अजनबी हो गए.छोटे शहरों में फिर भी सज्जन ठीक पता बता देतेहैं.मगर बड़े शहरों में लोगों को अपना ही पता-ठिकाना याद नहीं रहता!
कवि ने कविता दिखाते हुए मुझसे कहा- "नहीं, यह मेरी कविता नहीं. एआई की कविता है! है न मस्त. हींग लगे न फिटकरी, कविता तैयार." नहीं, मैंने अपना माथा नहीं पकड़ा. बल्कि कवि महाराज को बधाई दी; 'मशीनी कविता' के लिए.
कवि और कविता उस दौर में आ पहुंचे हैं, जहां 'बपौती' अब मशीन की है.
बड़की; शायद याद हो आपको."हम लोग" वाली.वो पढ़ना चाहती थी. करियर बनाना चाहती थी.अपने बंधे परों को पारिवारिक बंधनों से मुक्त करना चाहती थी.लेकिन परिवार उसकी शादी पर अड़ा था.कैसे भी वो किसी खूँटे से बांध दी जाए
आज स्त्री उस सामाजिक-पारिवारिक बंधनों के खिलाफ खड़ी हो रही है;स्वागत करें
@1ALOKJOSHI हर वक्त तो नहीं; हां कभी–कभार मैं समाजवाद में समाजवाद को खोजने की कोशिश करता हूं. और हर बार समाजवाद मुझे पूंजीवाद के घुटनों पर खड़ा मिलता है. पूंजीवाद जितना और जहां तक समाजवाद को चलाता है, वो उतना ही चल पाता है. विचारधारा पीछे चली जाती है. पूंजीवाद की धारा में बबुआ बह जाता है!
हर वक्त तो नहीं; हां कभी–कभार मैं समाजवाद में समाजवाद को खोजने की कोशिश करता हूं. और हर बार समाजवाद मुझे पूंजीवाद के घुटनों पर खड़ा मिलता है. पूंजीवाद जितना और जहां तक समाजवाद को चलाता है, वो उतना ही चल पाता है. विचारधारा पीछे चली जाती है. पूंजीवाद की धारा में बबुआ बह जाता है!