जो उठा लाया था घर की मुँह-पोछनी से
माँ की याद में,
जिससे मिलो तो बदले पर्फ़्यूम के
तुम्हें दे,
आधी बची जवाँ-कुसुम तेल की वो शीशी
जिसे दादी लगाती थी
अपनी लम्बी चोटियों में तुम उसे ही प्रेमी चुनना!
वो लड़का जिसके पास देने के लिए
कोई बेशक़ीमती पत्थर नहीं हो,
जो सिर्फ़ तुम्हें दे सकता हो अपना वक़्त
अपनी नींद और कुछ टूटे सपने
आधी रात को लिखी कोई अधूरी कविता
पापा से सुनी डाँट का कोई खिस्सा
जो यूँ ही बातों-बातों में
दिखाए तुम्हें उस टूटी चूड़ी का टुकड़ा
बिहार में बदलाव के लिए न तो बीजेपी चाहिए नहीं आरजेडी और नीतीश कुमार की कोई पार्टी है तो उनकी भी पार्टी नहीं. तो बचा कौन है बताइए?
कौन होगा बिहार का अगला मुख्यमंती?
आप किसी देखना चाहते हैं बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में?
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