मुग़ल-ए-आजम को खुश करने के लिए शायरी करता एक दरबारी कवि।
❌ क्या इसे स्कूल भेजने के लिए जैकी यादव अनिल यादव या अन्य किसी यादव ने पोस्ट किया आपने देखा ?
ये करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए ?
इतने दिन से तो आंदोलनकारियों और प्रदर्शनकारियों को सुन रहा है देश। अब जरा नीट की परीक्षा देने वाले असली स्टूडेंट्स को भी सुन लो।
"जब नीट के असली स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट करने गए तब उन्हें 10 दिन तक परमीशन नहीं मिली, फिर 4 बजे डंडे मार कर भगा दिया। और इन आतंकवादियों (जंतर मंतर पर बैठे प्रदर्शनकारी) को रात रात भर बैठने की अनुमति है।
आगे इस युवा स्टूडेंट्स ने जो कुछ कहा है उसे दिन कर अनोदनकारी इस छात्र को भी लोकतंत्र और संविधान का विरोधी बता देंगे।
पहली बार टेलीविज़न डिबेट में किसी
को आरक्षण पे इतना मुखर होके
बोलते देखा हु
चारों तरफ असंतोष है
सरकारों को 70 साल में ये समझ नहीं आया कि गरीबी जाती देख के नहीं आती
ये 5000 साल से पानी नहीं पीने दिया
हांडी मटकी बांध दिया
ये सारा नैरटिव भी झूठा है
इतना दौड़ा के मार रहा है अभी अगर RAF वाला दो तीन गोली पैर में ही मार देता,
तो धरना स्थल से लेके अस्पताल तक और इंटाग्राम से लेके रेडिट तक “फ* डेमोक्रेसी” का हैशटैग दौड़ रहा होता।
NEET Aspirant Harsh Dubey की बातें,
पूरे देश में तेजी से वायरल हो रही है।
>आरक्षण पर बात कब होगी?
>सरकार हमें आंदोलन की परमिशन नहीं देती।
>जाति और राज्य के नाम पर आरक्षण क्यों?
>90% सामान्य वर्ग के छात्रों ने आत्मह-त्या की है
>हम जातिगत-आरक्षण से पीड़ित हैं
‘दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे’ के उद्घोषक, महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।
उनका जीवन हम सभी को राष्ट्रहित में कर्तव्यपथ पर अग्रसर रहने की सदैव प्रेरणा प्रदान करता रहेगा।
इतने दिनों तक सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और शिक्षा व्यवस्था व पेपर लीक को लेकर, खासकर सोशल मीडिया पर बने माहौल के कारण अधिकांश नौजवान छात्र प्रदर्शन में पहुंचे थे। वे ऑर्गेनिक तरीके से आए थे।
प्रदर्शन में शामिल लोगों का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही चंद्रशेखर रावण की पार्टी, आम आदमी पार्टी और वामपंथी संगठनों द्वारा मोबिलाइज़ किया गया था। आंदोलन मूलतः स्वतःस्फूर्त था।
CJP के दो-तीन कथित नेतृत्वकर्ता जे.पी. नड्डा को ज्ञापन देने के नाम पर प्रोटेस्ट और मार्च छोड़कर चले गए।
प्रोटेस्ट लगभग नेतृत्वविहीन हो गया था, लेकिन उसके बाद भी युवाओं में खूब जोश था।
बड़ी संख्या में Gen Z युवा पहली बार किसी प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे थे। वे रचनात्मक तरीके से विरोध दर्ज करा रहे थे।
"बांग्लादेश बना देंगे ,नेपाल बना देंगे" जैसे नारे लगाने वाले दो-चार लोग रहे होंगे। उसके आधार पर पूरे आंदोलन को उसी नज़र से देखना या वैसा ठप्पा लगा देना उचित नहीं है।
भीड़ द्वारा पुलिस वाहनों में तोड़फोड़ और हिंसा की घटनाएं आंदोलन के बिल्कुल अंत में हुईं। उससे पहले पुलिस लगातार लाठीचार्ज करती रही और आंसू गैस के गोले छोड़ती रही।
तिलचट्टों का पूरा नेतृत्व:
१. वांगचुक चिकित्सालय से चिट्ठी लिख रहा था। वो चाहता भी तो नहीं आ पाता। तो उसका बनता है।
२. दीपके ने मार्च को पैदल लीड करने की जगह ट्रक की ट्राली में बैठ कर भागना उचित समझा ताकि डंडे न पड़े। यही दीपके वांगचुक को उठाए जाने के समय बहुत ही कन्वीनिएंटली ब्रश करने रैंडम मित्र के घर चला गया था।
३. विजेता दहिया रंग-बिरंगे कपड़ों में 4-5 घंटे एक रेस्तराँ में बैठ कर फोन देखता रहा। वहाँ किसी ने कुछ पूछा तो गरियाने लगा। फिर मेट्रो से बाहर निकल रहा था तो लोगों ने पूछा कि प्रदर्शन में क्यों नहीं हो? एक शब्द नहीं बोल पाया।
४. सौरव दास और आशुतोष ने दो बजे बुलाए जाने पर भी 11 बजे से नड्डा निवास की एसी का आनंद लेना उचित समझा और फिर चार बजे तक बैठा रहा ताकि प्रदर्शन खत्म हो और उनके पास यह कहने का अवसर हो कि वो तो ज्ञापन दे रहे थे।
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कुल मिला कर देखा जाए तो इन्होंने कुछ जेनुइन बच्चों को बुला लिया, उसमें भीम आर्मी, सपाई, आपाई बैकपैक में पत्थर ले कर सम्मिलित हुए। योजनानुसार पुलिस पर पत्थरबाजी हुई, जिस पर पुलिस ने सीमित बलप्रयोग और लाठीचार्ज से नियंत्रण किया।
भीड़ के हर चेहरे पर FIR तय है। सरकार चाहती तो आयोजकों को उठा लेती, पर वह किसी अन्य दिन होगा। कल, इनकी तीन माँगों में एक और माँग जुट जाएगी: दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए सारे FIR निरस्त हों और कमिश्नर क्षमा माँगे कि पुलिस ने लाठी से बच्चों का सर फोड़ा और शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पत्थरबाजी की।
बाकी, यह तो सत्य है कि सरकार ने प्रधान को फरवरी-मार्च में न हटा कर यह बवासीर तैयार किया है और अब ‘बैठता हूँ तो दर्द उठता है, दर्द उठता है बैठ जाता हूँ’ वाली स्थिति में पहुँच चुकी है।
मैथिली में एक लोकोक्ति है: बेसी तेज तीन खेप गूह माखै छै! भाजपा पर सटीक बैठती है, हर बार।
एक बेईमान नेता हटेगा दूसरा बेईमान उसकी जगह आएगा, एक बेईमान पार्टी हटेगी दूसरी बेईमान पार्टी उसकी जगह आएगी, एक का हटना दूसरे का आना कोई हल है ही नहीं,
●जहां भाजपा सरकार है वहाँ विपक्षी पार्टियां लोकतंत्र की दुहाई देते हुए छाती पीटती हैं,
●जहां विपक्षी पार्टियों की सरकार है वहाँ भाजपा लोकतंत्र की दुहाई देते हुए छाती पीटती हैं,
ऐसा एक राज्य बताइये जहां बेरोजगारी, महंगाई और पेपर लीक जैसी समस्याएं नहीं हैं? ऐसा राज्य बताइये जहां स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्थायें दुरुस्त हैं? राज्यों को आपस में कमपेयर करने पर आपको कुछ बेहतर उदाहरण मिल सकते हैं लेकिन जैसे ही आप उनको चीन, अमेरिका और यूरोपीय देशों से तुलना करेंगे आप शत प्रतिशत निराश होंगे,
जो पार्टी सत्ता में आती है दमनकारी नीतियां अपनाती है, किस पार्टी में अनपढ़, गुंडे, माफिया, अपराधी नहीं भरे हुए हैं? किस पार्टी में भाई भतीजा वाद नहीं है? किस पार्टी ने भ्रष्टाचार की नई परिभाषाएं नहीं लिखी हैं?
इन सभी का हल सिस्टम को ट्रांसपैरेंट और अकाउंटेबल बना कर होगा, जब तक सिस्टम के मूलभूत ढांचों में सिस्टेमिक बदलाव नहीं होंगे तब तक भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से हमें निजात मिलना असंभव है,
•सिस्टम में समस्याओं के टेक बेस्ड हल,
•पॉवरफुल ट्रांसपैरेरेंसी टूल्स का निर्माण और एग्जिस्टिंग टूल्स को मजबूत करना
•नीचे से ऊपर तक की जवाबदेही फिक्स करने के रिफॉर्म
•स्ट्रॉन्ग, ट्रांसपेरेंट , इफेक्टिव , एक्सेसिबल और अफोर्डेबल ग्रीवैंस रीड्रेसल मैकेनिज्म
•कम्यूनिटी पार्टीसीपेशन ,
•जूडिशल रिफॉर्म
•पुलिस रिफॉर्म
•स्टॉप क्रिमिनलाईजेशन ऑफ पालिटिक्स
•स्ट्रॉन्ग विशिलब्लोअर कानून
•नौकरशाही और प्रशासनिक सेटअप में बदलाव
देश में आंदोलन होते रहे हैं और होते रहेंगे, लेकिन हर एक आंदोलन का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन होता है, हमारे सामने हमारे देश के ही कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय उदाहरण हैं, उसके बाद क्या बदलाव आए?
आंदोलन तब प्रभावशाली और ऑर्गेनिक होता है जब उसका नेतृत्व समझदार , लक्ष्य पर केंद्रित, अन्य पोलिटिकल पार्टीज से स्टेज साझा न करना, बेवकूफ़ी भरे नारों से दूरी बनाना और आगे की रणनीति समझदारी से बनाने पर होता है,
देश में आंदोलन आगे भी होते रहेंगे, लेकिन जब तक हम मूलभूत ढांचों के बदलावों पर चर्चा नहीं करेंगे तब तक देश में कोई भी बदलाव सम्भव नहीं है
अब मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि सरकार ने UGC पर इंगेज नहीं किया, CBSE/NEET पर जब बोलना था, तब एक शब्द नहीं बोला, आज कैसे थूक चाटने लगे?
यही बात तो पार्टी के समर्थक सात महीने से बोल रहे थे। पूरा कम्यूनिकेशन ब्लैकआउट किया, मीडिया में अपने प्रवक्ताओं को भेजना बंद किया, हाउस अरेस्ट कराया, सुप्रीम कोर्ट से स्टे के बाद से ऐसे जताया कि उपकार कर दिया हो, आज घुटनों पर आ गए?
यही इस सरकार का पैटर्न बन चुका है। फोड़े को बवासीर बनने देते हैं, फिर जब लगता है कि अब मामला हाथ से निकल गया, तब झुक कर बात मानने को तैयार हो जाते हैं।
सुबह के 11 बजे तक यह आंदोलन सरकार के हिसाब से चल रहा था, नियंत्रण में था। अब यह स्पष्ट है कि नड्डा के घर बुलाने और तीन माँगें सुनने के बाद, तिलचट्टों का विश्वास आकाश पर है और वो CAA, किसान आंदोलन की तरह, भारत को नया, फर्जी आंदोलन देने जा रहे हैं।
अब मुझे देखना है कि माँगों पर सरकार करती क्या है! आत्महत्या करने वालों के परिजनों को एक करोड़ की माँग उचित है, क्योंकि अधिकांश पेपर लीक के कारण ही ‘सॉरी’ लिख कर मरे। दो अन्य माँगों में से एक प्रधान के त्यागपत्र की है, जो होना तो जनवरी में ही था, पर ईगो के कारण आज तक खींच लाई सरकार।
प्रधान अब इनके गले की फाँस बन चुका है।ये हर वो चीज करते हैं, जिसका इन्होंने पहले विरोध किया पर वामपंथी इनसे करवाते हैं। ‘कास्ट सेंसस’ ये राहुल के कहने पर करा रहे हैं, और प्रधान अब तिलचट्टों के कहने से जाएगा।
इनकी पुलिस आज फिर पिटी है, जैसे लाल किला वाले आंदोलन में पिटी थी। आईटीसेलिए फिर से विक्टिम बने घूम रहे हैं और यह पूछ रहे हैं कि ‘क्या ऐसे लोग विद्यार्थी हैं’? फिर अपने मालिक से पूछो न कि क्यों नड्डा से मीटिंग को तैयार हो गए?
जब सरकार अपने समर्थकों पर थूकती है तब उन्हें दूसरों का थूका चाटना ही पड़ता है।
@VoiceOfBrahmins अनिल लादव और दिलिप लंडल इन दोनों चादरमोदो को ये वीडियो देखना चाहिए, केवल ब्राह्मण होने की वजह से बहुत टारगेट किया था इन दोनों ने
रोहित के फिटनेस को लेकर
#Breakingnews CM योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाने की पाकिस्तानी साज़िश का पर्दाफाश!
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जान को बड़ा खतरा था। हमारी इंटेलिजेंस इंफॉर्मेशन के अनुसार, पाकिस्तान ने उनके ऑफिशियल सीक्रेट प्रोग्राम के दौरान उन्हें असेसिनेट (assassinate) करने का पूरा प्लान तैयार किया था।
तारीख और रूट: यह पूरा प्लान 7-8 मार्च (2019) के ऑफिशियल वीवीआईपी प्रोग्राम का था, जिसमें माननीय प्रधानमंत्री जी के साथ ये मुख्य कार्यक्रम शामिल थे
बनारस: काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन और दीनदयाल हस्तकला संकुल में 'नेशनल वीमेन लाइवलीहुड मीट-2019' का उद्घाटन।
कानपुर: निराला नगर रेलवे ग्राउंड में विभिन्न विकास परियोजनाओं का शिलान्यास/लोकार्पण।
गाजियाबाद: शहीद स्थल मेट्रो स्टेशन से मेट्रो सेवाओं का उद्घाटन।
हैंडलर की भूमिका: पाकिस्तान के एक हैंडलर, जिसका नाम शाहवीर अहमद काज़ी (उम्र 27 वर्ष) है, के पास इस पूरे रूट और मिनट-टू-मिनट सिक्योरिटी प्रोग्राम की जानकारी पहले से मौजूद थी।
इनसाइडर नेटवर्क: इस हैंडलर के 'इनसाइडर्स' भारत के कई सरकारी और डिफेंस विभागों में मौजूद हैं, जिन्होंने यह सीक्रेट डेटा लीक किया।
पाकिस्तान के सुसाइड बॉम्बर्स इस कड़े सुरक्षा घेरे को भेदने में पूरी तरह नाकाम रहे। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी और सख्त सिक्योरिटी रीजनों के कारण आतंकी मंसूबे धरे के धरे रह गए।
सरकारी विभागों में बैठे इन गद्दारों और पाकिस्तानी हैंडलर के इस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश होना बेहद ज़रूरी है!
Note: If any Indian media house requires concrete evidence of this entire Pakistani operation, they can contact me personally.
🇮🇳🙏
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मात्र एक धर्मेंद्र प्रधान जिसने UGC रूल्स के माध्यम से सामान्य वर्ग को दफनाने का प्लान बना दिया था उसकी वजह से आज संसद भवन के सामने हमे यह नजारे देखने को मिल रहे हैं
इन सबका जिम्मेदार जितना शिक्षा मंत्री है उससे अधिक दिलीप मंडल भी है।
बस 48 घंटे? जब आंदोलन का हर हिस्सा ‘नेता’ ने आउटसोर्स कर रखा हो क्योंकि स्वयं में न तो साहस हो, न धैर्य, न प्रतिभा, न कौशल, तब ऐसे आंदोलनों के नेता पर वास्तविक भार पड़ते ही उनका शीघ्रपतन हो जाता है।
अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अम्बेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अम्बेडकर
के नारों के साथ समाज सुधार का आंदोलन करते JNU की ढपली गैंग
ये आंदोलन अब छात्र आंदोलन नहीं बल्कि वामपंथ का वही घिसा पिटा आंदोलन रह गया है जो समय-समय पर होते रहे हैं।