"खुशबू आती रहे दूर से ही सही, पास में हो चमन ये जरूरी नहीं"
यही हाल है कुछ हमारे भाई ध्रुव राठी जी का जो चाहते तो हैं देश में सत्ता परिवर्तन हो, नेतृत्व परिवर्तन हो देश की व्यवस्था में कुछ नया हो, युवा सड़कों पर उतरें, पुलिस से संघर्ष करें, पुलिस की लाठियां खाएं,वॉटर कैनल से भीगें पर मैं यहीं से आप लोगों को आशीर्वाद देता रहूंगा आप लोग मेरी महक हमेशा महसूस करेंगे।
हम भारतीयों की फितरत ही ऐसी है जब किसी को परेशानी या मुसीबत में देखते हैं तो अपनी जान की बाजी लगाकर भी, उनकी मदद करते हैं।
पुण्य सलिला भारत भूमि ऐसी वीर पुरुषों के योगदान से भरी पड़ी है।
समय-समय ऐसा कोई ना कोई वीर पुरुष आ ही जाता है जो अपने कार्यों से भारत और भारतीयों के मान को दुनिया भर में बड़ा देताहै।
वंदे मातरम्
सत्य की परीक्षा तभी होती है जब सारा जग उसके विरुद्ध खड़ा हो जाए उसकी आलोचना, परिहास, ��डयंत्र इत��े किए जाएं की सत्यवान के पैर भी डगमगा जाए लगने लगे कि अब तो अस्तित्व ही समाप्त होने वाला है, फिर भी अविचल, अडिग बना रहे और ब्रह्मांड में अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर दे सत्य वह शक्ति है।
गुरुदेव ये कलयुगी इंसान आप और आपकी महिमा को नहीं समझ सकते, जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को भी इस संसार ने नहीं छोड़ा तो आप हैं क्या.
आप तो श्रीजी के अंशावतार हैं, जिस तरह बादलों की छाया सूरज के तेज को नहीं छिपा सकती वैसे ही यह आरोप, प्रत्यारोप आपकी कीर्ति को ढक नहीं सकते आपकी कीर्ति अजर ,अमर अविनाशी है।
गुरु चरणों में शत शत नमन
आदरणीय प्रधानमंत्री जी वैसे तो आप जनमानस की नब्ज को बहुत बेहतरीन से जानते हैं, पर कभी-कभी पेशेवर खिलाड़ी भी चूक जाते हैं, और चूक का मतलब है, आपका खेल अब दूसरे खेलेंगे।
प्रधा��मंत्री जी बस आप इतना कर दीजिए इन नवयुवकों को रोजगार दे दीजिए सरकारी भर्तियों में बढ़ोतरी कर दीजिए, विश्वास करिए यह युवा दिल्ली नहीं आएंगे जंतर मंतर पर लानत मलानत करने करवाने के ��िए।
देश का विपक्ष कमजोर था नेतृत्व का अभाव था लेकिन शायद उस कमी को यह युवा पूरी कर रहे हैं।
@_YogendraYadav इस बूढ़े दमदमे में नहीं है, कोई दम। देख चुका है हिंदुस्तान कइयों दफा।
है इतिहास तुम्हारा आस्तीन के सांप बनने का, अब जब सब जगह दुत्कार मिली है तो कम्युनिस्टों की शरण में जा गिरे हैं महाशय।
@neha_aisa आप अपनी अंतरात्मा से बताना, क्या आपका संघर्ष लोकतंत्र को बचाने के लिए है,या वामपंथियों को राजिनीतिक आक्सीजन देने के लिए है।
वामपंथियों और लोकतांत्रिक शक्तियों के बीच हमेशा 36 का आंकड़ा रहा ह�� वामपंथी विचारधारा कब से लोकतंत्र को पसंद करने लगी।
पत्रकारिता की पहचान निर्भीक,निडरऔर साफगोई से आंकी जाती है, और आप इन मामलों में बिल्कुल खरे उतरे हैं देश को एक नई दिशा दिखाई जिससे अभी तक सारी पत्रकारिता बिरादरी दूर थी।
लक्ष्य की प्राप्ति में इतने निर्भीक बनो की एक महिला का उपयोग करने में भी कोई डर ना हो, झूठ और अफवाह को पूरी साफ गोई से फैलाओ की लोग भ्रमित हो जाए सत्य क्या है और झूठ क्या है?
कल आप भी इसी हिंदुस्तान में रहेंगे और मैं भी रहूंगा देख लेते हैं जंतर मंतर पर जाकर तुम्हारी यह किन्नर फौज क्या गुल खिलाने वाली है एक धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लिया तो सोचते हो चौराहे पर खड़े होकर आप किसी का भी स्तीफा मांग लोगे आंदोलन को खड़ा करने में और सफल बनाने में मन की पवित्रता होनी चाहिए चुगलखोरी नहीं।
कॉकरोचों से भी मुझे बहुत आशा थी कि यह देश को नवीन दिशा दिखाएंगे लेकिन वह भी अब चौराहे पर खड़े होकर इस्तीफा मांगते हैं जन आंदोलन कैसे तैयार किए जाते हैं अगर आपको नहीं पता तो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास पढ़ लीजिए , पढ़ लीजिए महात्मा गांधी को तो अक्ल �� जाएगी आंदोलन करने की।
जय हिंद जय भारत
श्री गुरु चरणों में शत् शत् नमन,
वृंदावन के "श्री गुरु कृपा कुंज आश्रम" में प्रेमानंद महाराज जी के 25 वर्षीय शिष्य ' दीपक लोदी' उर्फ 'रसिक दुलारी शरण' द्वारा की गई आत्महत्या चर्चा का विषय है, पुलिस आत्महत्या के कारणों का हर एंगल से विवेचना कर रही है, लेकिन कुछ प्रोपेगेंडा फैलाने वालों ने यहां गुरु महाराज पर ही आरोप लगाना शुरू कर दिए जिसमें 'सीमा गोविंद' नाम की यह महिला भी है।
जो भी व्यक्ति गुरु महाराज के संपर्क में है या जिसने गुरु महाराज की उपदेशों, प्रवचनों को सुना है शायद ही ऐसे धृष्टता पूर्ण आरोप लगाने के कार्य करे।
प्रे���ानंद जी सिर्फ गुरु नहीं साक्षात् पर ब्रह्म है, उनकी वाणी ने लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन किए हैं, ब्रह्मचर्य पर दिए गए उनके ज्ञान व उपदेश को अगर हम ध्यान से सुनें तो स्वामी विवेकानंद जी ने भी ब्रह्मचर्य की यही महिमा बताई थी, कभी-कभी यह सुनने और समझने वाले पर भी निर्भर करता है कि वह ज्ञान को अपने जीवन में किस तरह आत्मसात् कर रहा है।
वर्तमान में प्रेमानंद जी जैसे गुरुओं की हमारे देश और समाज को नितांत ही जरूरत है, इस आपाधापी, मारामारी और जीवन में आए झंझावतों को श्री चरणों का सानिध्य और उपदेश ही आपको बचा सकता है।
जाने और अनजाने में हमारे मन, वचन ,कर्म से कोई ऐसा पाप ना हो जाए जिसे गुरु महाराज तो क्षमा कर दें,लेकिन हम परमेश्वर के दंड के भागी ना बन जाए।
क्या काबिलियत दिखाई दे रही है आपको इस लड़की में सिवाय 'वाचालता' के अलावा अभी तक कोई ढंग की बात तो इसने की नहीं।
��ोदी,योगी को गाली देना ही योग्यता की निशानी है तो तुम भी दैत्य गुरु 'शुक्राचार्य 'की भूमिका में दिखाई दे रहे हो जिसने अनीति का साथ देने के कारण आंख फुड़वाई थी।
सर्कस में एक जोकर होता है जिसकी कॉमेडी पर लोग खूब ठहाके लगाते हैं, तालियां बजाते हैं, लेकिन कोई भी उसे गंभीरता से नहीं लेता ।
यह भी भारतीय राजनीति के 'जोकर' हैं जो लोगों का खूब मनोरंजन करके तालियां बटोर रहे हैं लेकिन धरातल पर इन्हें अपनी औकात पता नहीं है।
बहिन आप एक बार अपनी यह इच्छा भी पूरी कर लो,कोई हसरत न रह जाए, देख लो जंतर मंतर पर बैठकर भी, ��क फैशन सा चल गया है जंतर मंतर पर बैठने की धौंस देने का।
वैसे आपने दिन बहुत अच्छा चुना है 2 अक्टूबर "गांधी जयंती"पर शायद आपने ना तो गांधी को जाना है और ना ही पढ़ा है, गांधी जी ने कभी 'सिद्धांत विहीन' राजनीति की वकालत नहीं की, आपके जिस 'मुखारविंदु' से धुंआधार गालियों की बरसात होती है सोचना कभी गांधी जी ने इस तरह के शब्दों और वाणी का प्रयोग अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए जीवन में किया था कभी।
वैसे वा��पंथियों का गांधी जी की विचारधारा से क्या मेल है? जब आपकी विचारधारा देश ही नहीं दुनिया में खत्म हो रही है तो सोचा गांधी जी का नाम लेकर ही कुछ जन समर्थन मिल जाए।
गांधी जी और गांधीवाद सिर्फ तुम्हारी नहीं पूरी दुनिया की जरूरत है आज दुनिया में जब सब कुछ खत्म हो रहा है।तो दुनिया को रास्ता गांधीवाद ही दिखाएगा गांधी जी तब भी इतने प्रासंगिक थे आज भी उतने प्रासंगिक है और कल भी उतने प्रासंगिक रहेंगे गांधी जी का नाम लेकर ही लोगों को नोबेल पुरस्कार मिल जाते हैं, शर्म आती है कि उनके नाम ��र तुम जैसे लोग राजनीतिक रोटियां सेंकने चले हैं
लज्जा स्त्री का आभूषण है अपनी नहीं लेकिन नारी जाति की गरिमा बनाए रखने के लिए बहिन मुंह से इस तरह के वचन निकलना बंद कर दें।
मामा जी आप जैस��� कोई नहीं राजनीति के अजातशत्रु, सच्चे प्रजा पालक,जनहितैषी,
निष्काम कर्म योगी। इतनी लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के बाद अहम आपको छू न पाया जीवन में कभी नहीं देखा की फुर्सत के क्षणों में आप सुख सुविधाओं का आनंद ले रहे हैं आपने उस पल को भी अपने परिवार के साथ ही जिया। यही वजह थी कि आप हमेशा संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहे प्रजा के दुख दर्द, संवेदनाओं को हमेशा हृदय में लेकर चलने वाले ऐसे युगपुरुष को शत-शत नमन।
भाई आप जहां रहो प्रसन्न और महफूज रहो।
लेकिन आपकी जीवन की कहानी युवा पीढ़ी और तरुणों के लिए एक संदेश है जो दुनिया की आप��धापी और भौतिक चकाचौंध में ही अपना भविष्य देखते हैं ,जीवन वह नहीं होता जिसको हम देखते हैं जीवन वह होता है जिसकी अनुभूति हमारी आत्मा करती है।
वीआईपी कल्चर में ही अपना भविष्य देखना और भोग विलास को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लेना। जीवन में कोई नियम, संयम, सदाचार और अनुशासन का ना होना एक न एक दिन आपकी दुर्गति का कारण बनता है।
जीवन में अनुशासन और सदाचार का क्या महत्व है यह आपसे अधिक इस अवस्था में कोई नहीं समझ सकता विश्व के महान क्रिकेटर 'सचिन तेंदुलकर' और 'विनोद कांबली जी' आप दोनों के क्रिकेट जीवन की एक साथ शुरुआत होती है शुरुआती सफलता आपकी तेंदुलकर से ज्यादा बड़ी थी, आपको स्टारडम बहुत जल्द मिल गया लेकिन आपकी सफलता का नशा आपके सिर पर चढ़कर बोलने लगा आप दौलत की चकाचौंध में बेकाबू हो गए और अति शीघ्र आपका डाउन बाल शुरू हो गया जिसने आपको आज 'ओल्ड एज होम' तक पहुंचा दिया, संयमित और अनुशासित जीवन जीने वाले तेंदुलकर आज दुनिया के महानतम क्रिकेटरों में शुमार ही नहीं हैं वो 'भारत के रत्न' हैं।
@AamAadmiParty जनता के सवालों से आजिज बीजेपी के मंत्री सांसद झुनझुलाहट और खीज के मारे बेकाबू हो गए हैं।
पहले 'श्रीमंत' और अब 'श्रीमान'उस जनता जनार्दन पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं जिसने उन्हें सिंहासन पर बैठाया।
"सिंहासन खाली करो कीजनता आती है"
पत्रकार महोदय जी आप इंटरव्यू इस तरीके से ले रहे हैं की नकारात्मकता फैलाने का काम कर रही है आपकी भाषा शैली ,यह लड़की तो मानसिक दिवालियापन की शिकार है, मतभेद कितना भीहो, शिकायत कितनी भी हो यदि आप लोकतांत्रिक प्रणाली के जीवंत होने की बात करते हैं तो आपको उसकी गरिमा भी बनाए रखना चाहिए । एक निर्वाचित और राज्य के मुखिया से आप इस तरह की भाषा बोलती है तो यह लगता है कि आप किस मानसिकता की शिकार हैं।
पत्रकार महोदय जो इस भाषा शैली को लेकर प्रसन्न हो रहे हैं, कल जब इनके लिए भी कोई भड़ुवे ,दलाल और बिकाऊ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करेगा तो यह छाती पीठ पीठ का रो-रो कर लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई देंगें।
इन वामपंथियों की सोच ही अराजकतावादी है ,ये परिवर्तन के लिए ��मेशा खून खराबे का ही समर्थन करते हैं देश को नक्सलवाद की आग में झोंकने वाली यह विचार धारा जिसने 60 साल में देश लाखों लोगों की निर्मम हत्या कीहै, जब नक्सलवाद को कुचला जाने लगा तो ऐसे वामपंथियों की,जुबान बेकाबू हो गई है, वामपंथी उसे वक्त भी देश देश की पीठ में खंजर भौंख रहे थे जब चीन भारत पर हमला करता है, यह चीन के पक्ष में खड़े होते हैं ना कि भारत में यह दोगले, बेईमान, देशद्रोही लोग क्या देश का भला करे��गे जिन्होंने आज तक के इतिहास में कभी भारत को अपना देश समझा ही नहीं।
वामपंथियों को देश की जनता ने तो नकार ही दिया है इनका अस्तित्व देश में अब खत्म हो चुका है तो यह बिलबिलाते, छटपटाते, व्यवस्था को ही गालियां देने लगे हैं।
पत्रकार महोदय अभी आप स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता क्या होती है इसके बारे में और अनुभव इकट्ठा करिए तब शायद आप एक बेहतर इंटरव्यू ले सकें किसी का।
जय हिंद जय भारत
देश के राजनीतिक फलक पर दो महापुरुषों की मौत एक मिस्ट्री बन के रह गई है,'एकात्म मानववाद'के पुरोधा पंडित दीनदयाल उपाध्याय और "जय जवान जय किसान" के प्रणेता 'गुदणी के लाल' लालबहादुर शास्त्री ��ी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत।
मजबूत सरकार से यह आशा है कि इन दोनों मौतों के वास्तविक कारणो का राज फास होना बहुत जरूरी है आप यह पुण्य कार्य करदें,तो शायद इन महापुरुषों की आत्मा को शांति मिल जाए।
जय हिंद जय भारत
मतलब बीजेपी यह मान के चल रही है कि 2047 तक उसकी ही सत्ता बरकरार रहेगी लेकिन 2047 में आपके पास दिखाने के लिए क्या रहेगा किसान फटेहाल ,कर्मचारी ब���हाल , युवा परेशान , मजदूर मुफलिसी में,
न्याय और अधिकार की मांग बीते समय की बात रह जाएगी हम देशवासी भूल जाएंगे कि हम लोकतांत्रिक युग में रह रहे हैं,या किसी तानाशाह की जागीर में,
अरे आपको कुछ करना है तो 2047 का इंतजार क्यों आप अभी से करिए देश की बुनियादी संस्थाओं और संरचनाओं को इतना मजबूत करिए, युवाओं को इतना शक्तिशाली बनाइए की हमारे भविष्य की बुनियाद युवाओं के द्वारा रखी जाए'न' कि सरकार के द्वारा।
जय हिंद जय भारत