अपनी आखिरी सांस तक अंग्रेज़ों से लड़ने वाले, अपनी आखिरी सांस तक भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी के किरदार पर यूपी के मुख्यमंत्री ने कुंठा का प्रदर्शन किया है। सवाल यह नहीं है कि उस मुख्यमंत्री ने ऐसा किया है, विडंबना यह है कि उस मुख्यमंत्री के सामने बैठे लोग जहालत के प्रदर्शन पर तालियाँ पीट रहे थे। जिस ‘वीर’ ने अंग्रेज़ों से ‘वज़ीफा’ लिया वही ‘वीर’ विभाजन का भी पैरोकार था, अब ऐसे ‘वीरों’ को ‘आदर्श’ मानने वाले जौहर को कहाँ बर्दाश्त करेंगे।
केशव मौर्य सिर्फ़ मदरसों पर हमला कर सकते हैं, क्योंकि उनकी कुर्सी दरअसल एक स्टूल है।
जिन्हें अंग्रेज़ों से मोहब्बत हो, उन्हें मदरसे कैसे पसंद आएँगे? मदरसे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ साज़िशों और आज़ादी की जद्दोजहद के मरकज़ थे। उन्होंने बेशुमार मुजाहिदीन-ए-आज़ादी पैदा किए, जबकि सावरकर अंग्रेज़ों को माफ़ीनामे लिख रहे थे।
आज़ाद भारत का पहला दहशतगर्द गोडसे किसी मदरसे का तालीब-ए-इल्म नहीं था। लेकिन भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मदरसे में पढ़े थे। मुंशी प्रेमचंद और राजा राम मोहन राय ने भी मदरसे में तालीम हासिल की थी।
दस्तूर का आर्टिकल 30 हर अक़ल्लियती बिरादरी को अपने तालीमी इदारे क़ायम करने और चलाने का हक़ देता है। ये बेहद शर्मनाक है कि एक दस्तूरी ओहदे पर बैठा शख़्स ऐसी ज़हरीली ज़बान इस्तेमाल करे।
मगर जब कुर्सियाँ कम हों, तो स्टूल वालों को अपनी सियासी अहमियत बनाए रखने के लिए ज़हर उगलना ही पड़ता है।
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
I STAND WITH IRAN!
“And never will the Jews or the Christians be pleased with you until you follow their religion. Say, ‘Indeed, the guidance of Allah is the [only] guidance.’” — (Qur’an 2:120)
وہ پاکستانی مسلمان جو ایمان رکھتے ہیں اور انصاف پر یقین رکھتے ہیں افغانستان کے ساتھ کھڑے ہیں، اور وہ جو ایمان سے خالی ہیں اور انصاف پر یقین نہیں رکھتے، نا۔پاک فوج کے ساتھ ہیں، ایک ایسی فوج جو پاکستانی مسلم بہنوں کو فرو۔ خت کر چکی ہے، ہزاروں معصوم پشتون اور بلوچوں کو شہید کر چکی ہے، حماس کو غیر مسلح کرنا چاہتی ہے، اردن میں ہزاروں فلسطینیوں کو شہید کیا، تحریک لبیک اسلامی پارٹی کو تبا۔ہ کیا، اور اپنے ہی عوام پر ظلم ڈھایا، جسے عمران خان کی پارٹی کے لوگوں پر کیا۔
“वंदे मातरम्” को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और आयोजनों में इसकी समस्त पंक्तियों को अनिवार्य करना केंद्र सरकार का न केवल एक पक्षपाती और ज़बरदस्ती थोपा गया फैसला है, बल्कि यह संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला और अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने का निंदनीय प्रयास है। मुसलमान किसी को वंदे मातरम् पढ़ने या उसकी धुन बजाने से नहीं रोकते, मगर क्योंकि उसकी कुछ पंक्तियाँ बहुदेववादी आस्था पर आधारित हैं और मातृभूमि को ईश्वर के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जो एकेश्वरवादी धर्म की आस्था से टकराती हैं, इसलिए मुसलमान, जो केवल एक अल्लाह की वंदना करता है, उसको इसे पढ़ने पर विवश करना संविधान की धारा 25 और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का खुला उल्लंघन है।
आज इस गीत को अनिवार्य कर देना और नागरिकों पर थोपने का प्रयास वास्तव में देशप्रेम नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति, सांप्रदायिक एजेंडे और जनता का ध्यान मूल समस्याओं से हटाने की सोची-समझी चाल है। मातृभूमि से प्रेम का आधार नारे नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान हैं, जिनका उज्ज्वल उदाहरण मुसलमानों और जमीयत उलमा-ए-हिंद का अभूतपूर्व संघर्ष है। इस प्रकार के फ़ैसले देश की शांति, एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमज़ोर करने के साथ-साथ संविधान का भी उल्लंघन हैं।
याद रखिए! मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है। हम सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, मगर अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना कभी स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिए वंदे मातरम् को अनिवार्य कर देना संविधान की आत्मा, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खुला हमला है।
#ArshadMadani
#vandematram
यह नीच व्यक्ति असम का मुख्यमंत्री है,
जो कह रहा है कि मुसलमान को तकलीफ पहुंचाओ अगर । रिक्शा वाला ₹5 मांगे तो ₹4 दो।
हिमंता बिस्वा मुसलमान के खिलाफ है
संवैधानिक पद पर होते हुए जो बयान दे रहा है क्या इसके लिए कोई सजा नहीं है